राजस्थान ACB ने जल जीवन मिशन टेंडर मामले में पूर्व IAS अधिकारी Subodh Agarwal को नई दिल्ली से गिरफ्तार किया, जहां फर्जी दस्तावेजों और टेंडर अनियमितताओं की जांच जारी है।

₹20,000 करोड़ घोटाला: महीनों से फरार IAS अधिकारी Subodh Agarwal गिरफ्तार—टेंडर सिस्टम पर गंभीर सवाल

Team The420
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जयपुर/नई दिल्ली: राजस्थान में जल जीवन मिशन से जुड़े कथित ₹20,000 करोड़ के घोटाले में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। महीनों से गिरफ्तारी से बच रहे पूर्व आईएएस अधिकारी Subodh Agarwal को व्यापक बहु-शहर तलाश अभियान के बाद आखिरकार गिरफ्तार कर लिया गया। सूत्रों के अनुसार, आरोपी लगातार अपनी लोकेशन बदलकर जांच एजेंसियों से बचने की कोशिश कर रहा था।

जांच से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, इस मामले में पहले ही अदालत द्वारा गिरफ्तारी वारंट जारी किया जा चुका था। इसके बावजूद आरोपी लंबे समय तक गिरफ्तारी से बचता रहा। अधिकारियों ने बताया कि कई राज्यों में समन्वित छापेमारी की गई और तकनीकी निगरानी के जरिए उसकी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी। अंततः उसे नई दिल्ली के एक सार्वजनिक स्थान से हिरासत में लिया गया।

जांच में सामने आया है कि जल जीवन मिशन के तहत ठेके हासिल करने के लिए बड़े पैमाने पर फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। आरोप है कि कुछ निजी कंपनियों ने अपने टेंडर आवेदन में फर्जी ‘पूर्णता प्रमाणपत्र’ और अन्य दस्तावेज जमा किए, जिनके आधार पर उन्हें करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट्स आवंटित कर दिए गए। बाद में जब इन दस्तावेजों की जांच की गई, तो संबंधित एजेंसी ने उन्हें फर्जी घोषित कर दिया।

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सूत्रों के अनुसार, इस पूरे मामले में विभाग के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में है। आरोप है कि टेंडर प्रक्रिया में जानबूझकर ऐसे प्रावधान जोड़े गए, जो पारदर्शिता के विपरीत थे। उदाहरण के तौर पर, बड़े प्रोजेक्ट्स में ‘साइट विजिट प्रमाणपत्र’ को अनिवार्य बना दिया गया, जिससे बोली लगाने वालों की पहचान उजागर हो जाती थी। इससे निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा प्रभावित हुई और हेरफेर की संभावना बढ़ गई।

जांच एजेंसियों का कहना है कि इन अनियमितताओं के कारण टेंडर की लागत में 30 से 40 प्रतिशत तक असामान्य वृद्धि देखी गई। यानी जिन परियोजनाओं की वास्तविक लागत कम हो सकती थी, उन्हें अधिक कीमत पर मंजूरी दी गई, जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ। शुरुआती आकलन के अनुसार, यह घोटाला हजारों करोड़ रुपये तक फैला हुआ है।

इस मामले में अब तक 10 अन्य आरोपियों को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है, जिनमें सरकारी इंजीनियर और विभागीय अधिकारी शामिल हैं। इसके अलावा एक निजी व्यक्ति की भूमिका भी सामने आई है, जो इस पूरे नेटवर्क में मध्यस्थ के रूप में कार्य कर रहा था। सभी आरोपी फिलहाल न्यायिक हिरासत में हैं और उनसे पूछताछ जारी है।

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि आरोपी अधिकारी को पकड़ने के लिए विशेष टीमें गठित की गई थीं। इन टीमों ने देशभर में 100 से अधिक संभावित ठिकानों पर छापेमारी की और 50 से ज्यादा लोगों से पूछताछ की, जिनमें आरोपी के रिश्तेदार, करीबी संपर्क और अन्य जानकार शामिल थे। कई बार एजेंसियां उसके बेहद करीब पहुंचीं, लेकिन वह हर बार बच निकलने में सफल रहा।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों से टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता और निगरानी तंत्र को और मजबूत करने की आवश्यकता उजागर होती है। सरकारी परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर धन के लेनदेन को देखते हुए प्रशासनिक और तकनीकी स्तर पर सख्ती बेहद जरूरी है।

फिलहाल, जांच एजेंसियां इस घोटाले से जुड़े व्यापक नेटवर्क की कड़ियों को जोड़ने में जुटी हैं। यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि इसमें और कौन-कौन शामिल थे और किन-किन परियोजनाओं में अनियमितताएं हुईं। अधिकारियों का कहना है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे हो सकते हैं।

इस गिरफ्तारी को जल जीवन मिशन घोटाले की जांच में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। उम्मीद है कि इससे न केवल इस मामले की परतें खुलेंगी, बल्कि भविष्य में सरकारी परियोजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में भी यह एक अहम कदम साबित होगा।

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