NMC ने विदेश में मेडिकल शिक्षा लेने वाले भारतीय छात्रों को आगाह किया है कि English medium, proper clinical training और FMGL compliance के बिना भारत में medical registration प्रभावित हो सकता है।

विदेश में मेडिकल पढ़ाई पर सख्ती: अंग्रेजी माध्यम अनिवार्य, रूसी-चीनी भाषा में डिग्री अब भारत में अमान्य

Team The420
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नई दिल्ली: विदेशों में मेडिकल शिक्षा हासिल करने वाले भारतीय छात्रों के लिए बड़ा झटका देते हुए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल अंग्रेजी माध्यम में की गई पढ़ाई ही भारत में मान्य होगी। आयोग के नए मानकों के अनुसार, जो छात्र रूस, चीन या अन्य देशों में स्थानीय भाषाओं—जैसे रूसी या चीनी—में मेडिकल की पढ़ाई करते हैं, उनकी डिग्री भारत में मान्य नहीं मानी जाएगी।

एनएमसी के इस फैसले का सीधा असर उन हजारों छात्रों पर पड़ेगा, जो हर साल कम खर्च में मेडिकल की पढ़ाई के लिए विदेशों का रुख करते हैं। एक अनुमान के मुताबिक, पूर्व सोवियत देशों और चीन में हर साल करीब 8 से 10 हजार भारतीय छात्र मेडिकल की पढ़ाई के लिए जाते हैं। इनमें से लगभग 70 से 80 प्रतिशत छात्र वहां की स्थानीय भाषाओं में पढ़ाई करते हैं, जो अब नए नियमों के तहत बड़ी बाधा बन सकती है।

आयोग ने अपने ताजा आदेश में कहा है कि विदेशों में मेडिकल कोर्स के दौरान शिक्षण का माध्यम अंग्रेजी होना अनिवार्य है। इसके साथ ही छात्रों को यह प्रमाणित करना होगा कि जिस विश्वविद्यालय या कॉलेज से उन्होंने डिग्री ली है, वहां पढ़ाई अंग्रेजी में ही कराई जाती है। यदि ऐसा नहीं है, तो उन्हें भारत में प्रैक्टिस की अनुमति नहीं मिलेगी।

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एनएमसी के नियमों के अनुसार, विदेश से मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर भारत लौटने वाले छात्रों को प्रैक्टिस शुरू करने से पहले राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा (NEET) पास करनी होती है। हालांकि, नए आदेश के बाद गैर-अंग्रेजी माध्यम से पढ़े छात्रों को इस परीक्षा में बैठने की अनुमति भी नहीं दी जाएगी। इसका मतलब यह है कि ऐसे छात्रों के लिए डॉक्टर बनने का रास्ता लगभग बंद हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला छात्रों को भविष्य में होने वाली समस्याओं से बचाने के लिए लिया गया है। दरअसल, कई छात्र विदेशों में कम खर्च और आसान एडमिशन के कारण मेडिकल की पढ़ाई तो शुरू कर देते हैं, लेकिन भाषा की बाधा और भारत में मान्यता से जुड़े नियमों के कारण उन्हें बाद में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

जानकारी के अनुसार, एनएमसी ने विदेशों में मेडिकल शिक्षा देने वाले संस्थानों पर भी नजर रखनी शुरू कर दी है। हाल ही में उजबेकिस्तान के चार विश्वविद्यालयों को ब्लैकलिस्ट किया गया है, जहां शिक्षा की गुणवत्ता और मानकों को लेकर सवाल उठे थे। आयोग ने छात्रों को सलाह दी है कि वे विदेश में एडमिशन लेने से पहले संबंधित कॉलेज की मान्यता और पढ़ाई के माध्यम की पूरी जांच कर लें।

भारत में मेडिकल शिक्षा की लागत लगातार बढ़ती जा रही है। वर्तमान में देश में एमबीबीएस की कुल सीटें करीब 1.29 लाख तक पहुंच चुकी हैं, लेकिन निजी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाई बेहद महंगी है। एक छात्र को पूरे कोर्स के दौरान एक करोड़ रुपये या उससे अधिक खर्च करना पड़ सकता है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में छात्र विदेशों का रुख करते हैं।

इसके उलट, रूस, चीन और अन्य देशों में मेडिकल की पढ़ाई भारत की तुलना में काफी सस्ती है। वहां यह कोर्स करीब 20 से 25 लाख रुपये में पूरा हो जाता है, जो भारत के मुकाबले लगभग एक चौथाई खर्च है। हालांकि, सस्ती पढ़ाई के इस विकल्प के साथ अब सख्त नियम भी जुड़ गए हैं।

विदेश जाने वाले अधिकांश छात्रों को पहले एक साल तक स्थानीय भाषा सीखनी पड़ती है, जिसके बाद वे मेडिकल कोर्स शुरू करते हैं। लेकिन अब यह मॉडल भारतीय छात्रों के लिए जोखिम भरा साबित हो सकता है। ऐसे में विशेषज्ञ सलाह दे रहे हैं कि छात्र जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय पूरी जानकारी जुटाकर ही विदेश में दाखिला लें।

एनएमसी के इस नए निर्देश से साफ है कि आने वाले समय में विदेशी मेडिकल शिक्षा को लेकर नियम और सख्त हो सकते हैं। ऐसे में छात्रों और अभिभावकों के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे किसी भी विदेशी विश्वविद्यालय में एडमिशन लेने से पहले उसकी मान्यता, शिक्षण माध्यम और भारत में उसकी वैधता की पूरी जांच-पड़ताल करें, ताकि भविष्य में करियर पर कोई संकट न आए।

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