चंडीगढ़: हरियाणा सरकार में सामने आए बड़े बैंकिंग वित्तीय घोटाले के मामलों की जांच अब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दी गई है। यह मामला राज्य सरकार के विभिन्न विभागों और नगर निकायों के फिक्स्ड डिपॉजिट से जुड़ा है, जिसमें कुल मिलाकर लगभग ₹750 करोड़ की अनियमितताओं का आरोप सामने आया है। मामले में अब तक दो IAS अधिकारियों को निलंबित किया जा चुका है और Kotak Mahindra Bank को डि-एम्पैनल कर दिया गया है।
हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने शुक्रवार को इस मामले पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकार ने शुरुआती जांच के आधार पर कड़ी कार्रवाई की है और किसी भी दोषी व्यक्ति—चाहे वह अधिकारी हो या अन्य कोई जिम्मेदार व्यक्ति—को बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने कहा कि जांच प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए अब मामले को CBI को सौंप दिया गया है।
FutureCrime Summit 2026: Registrations to Open Soon for India’s Biggest Cybercrime Conference
यह मामला दो अलग-अलग बैंकिंग संस्थानों से जुड़ा बताया जा रहा है। पहले प्रकरण में IDFC FIRST Bank से संबंधित लगभग ₹590 करोड़ के फिक्स्ड डिपॉजिट में कथित अनियमितताओं का खुलासा हुआ, जो विभिन्न सरकारी विभागों द्वारा रखे गए थे। दूसरे मामले में पंचकूला नगर निगम के लगभग ₹160 करोड़ के फिक्स्ड डिपॉजिट में कथित गड़बड़ियों की जांच की जा रही है, जो Kotak Mahindra Bank से संबंधित है।
सरकारी स्तर पर हुई कार्रवाई के तहत दोनों मामलों की प्रारंभिक जांच एंटी करप्शन ब्यूरो द्वारा की जा रही थी। जांच रिपोर्ट के आधार पर राज्य सरकार ने दो वरिष्ठ भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारियों को निलंबित करने का निर्णय लिया। इसके अलावा, Kotak Mahindra Bank को सरकारी निकायों के साथ लेन-देन से अस्थायी रूप से बाहर कर दिया गया है।
मुख्यमंत्री सैनी ने कहा कि सरकार ने पहले ही संबंधित राशि की रिकवरी की दिशा में कदम उठाए हैं और कई मामलों में धन वापस भी प्राप्त किया गया है। उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल दोषियों की पहचान करना ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है।
उन्होंने विधानसभा में उठाए गए सवालों का जिक्र करते हुए कहा कि विपक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लिया और एक विशेष समिति गठित की गई थी। इसके साथ ही एंटी करप्शन ब्यूरो की जांच के बाद अब निष्कर्षों को देखते हुए CBI जांच की सिफारिश की गई है।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कहा कि यह एक गंभीर वित्तीय अनियमितता का मामला है और इसकी पूरी सच्चाई सामने लाने के लिए व्यापक जांच जरूरी है। उन्होंने कहा कि जांच एजेंसियों को पूरी स्वतंत्रता दी गई है और कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पद पर क्यों न हो, जांच के दायरे से बाहर नहीं होगा।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, इस मामले में बैंकिंग प्रक्रियाओं, निवेश निर्णयों और प्रशासनिक स्वीकृतियों की भूमिका की भी गहन जांच की जा रही है। प्रारंभिक संकेतों के अनुसार, यह गड़बड़ियां लंबे समय से चली आ रही प्रक्रियागत खामियों और निगरानी में कमी के कारण हुईं।
सरकार ने कहा है कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट और सरकारी निवेश प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और डिजिटल ट्रैकिंग को मजबूत किया जाएगा। साथ ही, सभी संबंधित विभागों को वित्तीय लेन-देन में सख्त अनुपालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
यह मामला अब राज्य स्तर से आगे बढ़कर केंद्रीय जांच एजेंसी के दायरे में पहुंच चुका है, जिससे इसके और व्यापक स्तर पर खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।
