जगतसिंहपुर: ओडिशा के Jagatsinghpur में नौकरी के नाम पर चल रहे एक संगठित फर्जीवाड़े का बड़ा खुलासा हुआ है, जहां 26 युवक-युवतियों को एक इमारत में बंधक बनाकर रखा गया था। इस रैकेट का भंडाफोड़ होने के बाद सामने आया कि आरोपी बेरोजगार युवाओं को केंद्रीय सरकारी नौकरी का झांसा देकर ठगी कर रहे थे और उन्हें जबरन एक तरह की मार्केटिंग गतिविधियों में लगा रहे थे।
पुलिस कार्रवाई के दौरान एक तीन मंजिला इमारत से 26 लोगों को मुक्त कराया गया, जिनमें तीन युवतियां भी शामिल हैं। इनकी उम्र 18 से 20 वर्ष के बीच बताई गई है। पीड़ितों में West Bengal, Odisha और Chhattisgarh के युवा शामिल हैं। शुरुआती जांच में यह भी सामने आया है कि इनमें से दो नाबालिग हैं, जिससे मामले की गंभीरता और बढ़ गई है।
जांच में खुलासा हुआ कि यह गिरोह बेरोजगार युवाओं को Krishi Vigyan Kendra समेत अन्य केंद्रीय संस्थानों में नौकरी दिलाने का दावा करता था। इसके अलावा पारादीप स्थित कंपनियों में डेटा एंट्री ऑपरेटर की नौकरी का भी लालच दिया जाता था। युवाओं को भरोसा दिलाने के लिए उन्हें ट्रेनिंग, नियुक्ति और वेतन से जुड़े कई झूठे वादे किए जाते थे।
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इस मामले में मुख्य आरोपी के रूप में मदन घनेई का नाम सामने आया है, जबकि अन्य गिरफ्तार आरोपियों में पुरंदर बाग, सिबा कुमार बेहरा, रजत कांत मैती और शशांकर करण शामिल हैं। सभी आरोपी अलग-अलग जगहों से जुड़े हैं और एक संगठित नेटवर्क के तहत इस रैकेट को चला रहे थे। जांच में यह भी सामने आया है कि इस गिरोह का संबंध त्रिपुरा के एक कथित सरगना से हो सकता है, जिसकी भूमिका की जांच जारी है।
पूरे रैकेट का तरीका बेहद सुनियोजित था। युवाओं से नौकरी दिलाने के नाम पर पहले ₹20,000 की राशि ली जाती थी। इसमें से ₹8,000 को मेंटेनेंस चार्ज बताया जाता था। इसके बाद उन्हें एक तथाकथित ट्रेनिंग प्रोग्राम में शामिल किया जाता था। ट्रेनिंग पूरी होने पर उन्हें करीब ₹12,000 के प्रोडक्ट—जैसे तेल और स्टेशनरी—दिए जाते थे और उन्हें इन्हें बेचने के लिए मजबूर किया जाता था।
पीड़ितों के मुताबिक, उन्हें बाहर जाने की अनुमति नहीं दी जाती थी और परिवार से संपर्क भी सीमित कर दिया गया था। कई युवाओं को मानसिक दबाव में रखा गया और उन्हें बताया गया कि अगर वे काम नहीं करेंगे तो उनका पैसा वापस नहीं मिलेगा। इस तरह उन्हें एक तरह से कैद करके काम करवाया जा रहा था।
इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब एक पीड़ित, प्रभिर खातुआ, किसी तरह अपने भाई से संपर्क करने में सफल हुआ। इसके बाद मामला अधिकारियों तक पहुंचा और छापेमारी की योजना बनाई गई। कार्रवाई के दौरान सभी 26 युवाओं को सुरक्षित बाहर निकाला गया।
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि इस रैकेट ने करीब 200 युवाओं को अपने जाल में फंसाया और उनसे ₹40 लाख से ₹50 लाख तक की रकम वसूली। इस तरह यह मामला केवल धोखाधड़ी तक सीमित नहीं, बल्कि मानव तस्करी, अवैध बंधक बनाकर रखने और मनी सर्कुलेशन जैसे गंभीर अपराधों से भी जुड़ा हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के फर्जी जॉब रैकेट देशभर में तेजी से फैल रहे हैं, जहां बेरोजगारी का फायदा उठाकर युवाओं को निशाना बनाया जाता है। खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के युवा ऐसे जाल में आसानी से फंस जाते हैं, जहां उन्हें बड़े सपने दिखाकर आर्थिक और मानसिक रूप से शोषण किया जाता है।
फिलहाल, सभी आरोपियों के खिलाफ संबंधित धाराओं में मामला दर्ज कर लिया गया है और जांच जारी है। अधिकारियों का कहना है कि इस नेटवर्क के अन्य सदस्यों और संभावित पीड़ितों की पहचान के लिए जांच का दायरा बढ़ाया जा रहा है। आने वाले दिनों में इस मामले में और खुलासे होने की संभावना है, जो इस पूरे रैकेट की जड़ तक पहुंचने में अहम साबित हो सकते हैं
