करिमनगर: तेलंगाना के करिमनगर में ₹138 करोड़ के म्यूल अकाउंट रैकेट का खुलासा करते हुए जांच एजेंसियों ने एक ऐसे संगठित साइबर नेटवर्क का पर्दाफाश किया है, जो शेल कंपनियों, रिमोट OTP एक्सेस और सिम कार्ड कंट्रोल के जरिए देशभर में अवैध ट्रांजैक्शन को अंजाम दे रहा था। इस मामले में 13 और आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद जांच का दायरा और बढ़ गया है।
जांच में सामने आया है कि इस गिरोह ने फर्जी कारोबारी इकाइयों के नाम पर शेल कंपनियां बनाकर कॉर्पोरेट बैंक अकाउंट खुलवाए। इन कंपनियों का कोई वास्तविक कारोबार नहीं था, लेकिन इन्हें वैध दिखाने के लिए अस्थायी दुकानें, साइनबोर्ड और बेसिक सेटअप तैयार किया जाता था। इन लोकेशनों को जियो-टैगिंग और बैंक वेरिफिकेशन के दौरान इस्तेमाल किया जाता था, ताकि सिस्टम को धोखा दिया जा सके।
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अधिकारियों के मुताबिक, कई कंपनियां एक ही पते पर कुछ ही दिनों के भीतर रजिस्टर की गईं, जिससे संदेह पैदा हुआ और जांच की दिशा इस बड़े नेटवर्क की ओर मुड़ गई। यह पूरा ऑपरेशन बेहद सुनियोजित तरीके से संचालित किया जा रहा था, जिसमें स्थानीय स्तर पर समन्वय करने वाले और विदेश में बैठे हैंडलर दोनों शामिल थे।
जांच में एक अहम खुलासा यह भी हुआ कि गिरोह का एक स्थानीय कोऑर्डिनेटर हाल ही में गोवा ले जाया गया था, जहां उसे करीब चार दिनों तक रखा गया। वहां उससे पूछताछ कर यह सुनिश्चित किया गया कि वह किसी जांच एजेंसी का मुखबिर नहीं है। इस तथाकथित “लॉयल्टी टेस्ट” के बाद ही उसके नेटवर्क के जरिए ट्रांजैक्शन दोबारा शुरू किए गए। अधिकारियों का अनुमान है कि इस व्यक्ति ने पिछले डेढ़ साल में कमीशन के रूप में ₹1 करोड़ से ज्यादा कमाए।
इस रैकेट की सबसे खतरनाक कड़ी थी—सिम कार्ड और OTP का नियंत्रण। जांच के अनुसार, जिन लोगों के नाम पर बैंक खाते खोले गए, उनसे नए जारी किए गए सिम कार्ड और आधार विवरण लिए जाते थे। इन सिम कार्ड्स को सक्रिय रखा जाता था, ताकि OTP को रिमोट तरीके से एक्सेस किया जा सके। इसके जरिए बैंकिंग सुरक्षा को दरकिनार करते हुए पैसे को तेजी से एक खाते से दूसरे खाते में ट्रांसफर किया जाता था।
अधिकारियों ने बताया कि एक ट्रांजैक्शन में रकम को 30 या उससे अधिक खातों में घुमाया जाता था, जिससे मनी ट्रेल को ट्रैक करना बेहद मुश्किल हो जाता था। अंततः यह पैसा हवाला चैनलों या अंतरराष्ट्रीय डिजिटल वॉलेट्स में भेज दिया जाता था, जिससे उसका पता लगाना और भी जटिल हो जाता था।
गिरोह की कार्यप्रणाली में स्थानीय युवाओं को शामिल करना भी एक अहम हिस्सा था। उन्हें करीब ₹50,000 की अग्रिम राशि दी जाती थी और ट्रांजैक्शन का 2 प्रतिशत हिस्सा देने का वादा किया जाता था। कई लोग बिना पूरी जानकारी के इस नेटवर्क का हिस्सा बन गए, लेकिन अब जांच एजेंसियों ने साफ कर दिया है कि ऐसे सभी खाताधारकों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
इस तरह के मामलों पर टिप्पणी करते हुए, प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह कहते हैं, “आज साइबर अपराधी केवल तकनीकी सिस्टम को ही नहीं, बल्कि पूरी वित्तीय संरचना को निशाना बना रहे हैं। म्यूल अकाउंट, रिमोट OTP एक्सेस और शेल कंपनियों का संयोजन एक खतरनाक ट्रेंड बन चुका है, जो संगठित अपराध का नया चेहरा है।”
जांच एजेंसियां अब इस पूरे नेटवर्क के अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन खंगाल रही हैं। यह भी पता लगाया जा रहा है कि अब तक कुल कितनी रकम इस रैकेट के जरिए ट्रांसफर की गई और इसमें किन-किन लोगों की भूमिका रही।
यह मामला एक बार फिर इस बात की चेतावनी देता है कि साइबर अपराध अब केवल ऑनलाइन ठगी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक संगठित आर्थिक अपराध का रूप ले चुका है। विशेषज्ञों की सलाह है कि अपने बैंक खातों, सिम कार्ड और व्यक्तिगत दस्तावेज किसी भी अनजान व्यक्ति या संस्था को साझा न करें, क्योंकि छोटी सी लापरवाही भी बड़े अपराध का हिस्सा बना सकती है।
