प्रयागराज: उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद (यूपी बोर्ड) की फर्जी वेबसाइट बनाकर मार्कशीट और डिग्री बेचने वाले संगठित साइबर गिरोह का जाल धीरे-धीरे खुलता जा रहा है। इस मामले में साइबर क्राइम टीम ने दो और आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। इससे पहले पांच दिन पूर्व दो अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है। ताजा कार्रवाई के बाद अब तक इस गिरोह के चार सदस्य सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं, जबकि जांच में और लोगों के नाम सामने आने की संभावना जताई जा रही है।
जांच एजेंसियों के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों की पहचान सत्येंद्र बरनवाल और मोनू गुप्ता के रूप में हुई है। दोनों अलग-अलग राज्यों से जुड़े हैं और लंबे समय से इस फर्जीवाड़े के नेटवर्क का हिस्सा थे। गिरफ्तारी के दौरान इनके कब्जे से तीन मोबाइल फोन, तीन सिम कार्ड, दो लैपटॉप, 24 फर्जी अंकपत्र, डिप्लोमा और प्रव्रजन प्रमाण पत्र के साथ चार नकली मोहरें बरामद की गई हैं। बरामद दस्तावेजों की गुणवत्ता इतनी सटीक बताई जा रही है कि सामान्य जांच में असली-नकली का फर्क कर पाना मुश्किल हो जाता था।
इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब यूपी बोर्ड के उपसचिव की ओर से साइबर थाने में एक शिकायत दर्ज कराई गई। शिकायत में बताया गया था कि बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट जैसी दिखने वाली एक फर्जी साइट तैयार की गई है, जिसके जरिए छात्रों और संस्थानों को नकली शैक्षणिक दस्तावेज उपलब्ध कराए जा रहे हैं। मामला दर्ज होने के बाद साइबर टीम ने तकनीकी जांच शुरू की और डिजिटल ट्रेल के आधार पर गिरोह तक पहुंच बनाई।
जांच के दौरान 25 मार्च को पहले चरण में आजमगढ़ के रहने वाले शशि प्रकाश राय उर्फ राजन और मनीष कुमार राय को गिरफ्तार किया गया था। इन दोनों से पूछताछ में गिरोह के अन्य सदस्यों की जानकारी मिली, जिसके आधार पर पुलिस ने छापेमारी कर सत्येंद्र बरनवाल और मोनू गुप्ता को दबोच लिया। पूछताछ में दोनों आरोपियों ने कबूल किया कि वे फर्जी वेबसाइट बनाकर उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों के विश्वविद्यालयों और बोर्ड के नाम पर नकली अंकपत्र, डिग्री, डिप्लोमा और प्रव्रजन प्रमाण पत्र तैयार करते थे।
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आरोपियों ने बताया कि वे पहले असली वेबसाइट की हूबहू कॉपी तैयार करते थे, जिसमें डिजाइन, लोगो और लेआउट तक को बिल्कुल समान रखा जाता था। इसके बाद ग्राहकों को भरोसा दिलाने के लिए उसी वेबसाइट के माध्यम से आवेदन लेने का दिखावा किया जाता था। जब कोई छात्र या संस्थान संपर्क करता, तो उनसे मोटी रकम लेकर फर्जी दस्तावेज तैयार कर दिए जाते थे। तैयार दस्तावेजों को रंगीन प्रिंट निकालकर उन पर नकली मोहर लगाई जाती थी, जिससे वे असली जैसे प्रतीत हों।
जांच में यह भी सामने आया है कि गिरोह सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए अपने “सेवाओं” का प्रचार करता था। बेरोजगारी और प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव का फायदा उठाकर यह गिरोह उन युवाओं को निशाना बनाता था, जो जल्दी नौकरी पाने के लिए शॉर्टकट तलाशते हैं। कई शिक्षण संस्थानों तक भी ये फर्जी दस्तावेज पहुंचाए गए, जिससे इस नेटवर्क की पहुंच और गहराई का अंदाजा लगाया जा सकता है।
फिलहाल साइबर टीम पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने में जुटी है। बरामद लैपटॉप और मोबाइल फोन से डेटा रिकवर कर अन्य संदिग्धों की पहचान की जा रही है। अधिकारियों का मानना है कि यह गिरोह लंबे समय से सक्रिय था और इसके तार कई राज्यों तक फैले हो सकते हैं। आने वाले दिनों में इस मामले में और गिरफ्तारियां होने की संभावना जताई जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के साइबर फ्रॉड शिक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सीधा असर डालते हैं। छात्रों और संस्थानों को सलाह दी गई है कि वे किसी भी वेबसाइट या ऑनलाइन सेवा का उपयोग करने से पहले उसकी प्रामाणिकता की अच्छी तरह जांच कर लें, ताकि इस तरह के फर्जीवाड़े से बचा जा सके।
