सहारनपुर। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कॉलेजों में फ्रेशर्स को निशाना बनाकर आतंकी संगठन ISIS अपने डिजिटल नेटवर्क के जरिए युवाओं को कट्टरपंथ की ओर मोड़ने की कोशिश कर रहा है। हाल ही में सहारनपुर निवासी हारिस अली की गिरफ्तारी के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने इस खामोश लेकिन खतरनाक ऑनलाइन तंत्र पर फोकस बढ़ा दिया है। एजेंसियों का कहना है कि अब नेटवर्क पारंपरिक तरीकों से हटकर पूरी तरह डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय है, जहां सोशल मीडिया, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स और क्लोज्ड ग्रुप्स के माध्यम से फ्रेशर्स तक पहुँच बनाई जा रही है।
जांच में सामने आया है कि सबसे ज्यादा संवेदनशील छात्र कॉलेज के पहले और दूसरे वर्ष के होते हैं। नई जगह और माहौल में खुद को स्थापित करने की कोशिश में ये छात्र डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अधिक सक्रिय रहते हैं। यही वजह है कि इन्हें आसानी से नेटवर्क में जोड़ना और विचारधारा से प्रभावित करना संभव होता है। विशेष रूप से मेडिकल, इंजीनियरिंग और आईटी जैसे प्रोफेशनल कोर्स के छात्र हाई-रिस्क कैटेगरी में रखे गए हैं, क्योंकि तकनीकी समझ होने के कारण उन्हें ऑनलाइन ग्रुप्स में शामिल करना आसान होता है।
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पश्चिमी यूपी के कॉलेज फ्रेशर्स को सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड ऐप्स के जरिए निशाना बनाने वाले ISIS के नए ऑनलाइन रैडिकलाइजेशन मॉडल पर सुरक्षा एजेंसियां सतर्क।
‘3-स्टेप रैडिकलाइजेशन मॉडल’
सुरक्षा एजेंसियों ने जांच में एक पैटर्न चिन्हित किया है, जिसे ‘3-स्टेप रैडिकलाइजेशन मॉडल’ कहा जा रहा है।
- पहला चरण – कनेक्ट: फर्जी सोशल मीडिया प्रोफाइल के जरिए दोस्ती की जाती है। मोटिवेशनल या धार्मिक कंटेंट साझा कर छात्रों का भरोसा जीतना इसका लक्ष्य होता है।
- दूसरा चरण – इन्फ्लुएंस: धीरे-धीरे विचारधारा से जुड़े वीडियो, मैसेज और पीड़ित नैरेटिव साझा किए जाते हैं, जिससे छात्र मानसिक रूप से प्रभावित हो।
- तीसरा चरण – एंगेजमेंट: एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म पर छोटे-छोटे क्लोज्ड ग्रुप्स में जोड़ना, जहां कट्टरपंथी सामग्री और निर्देश साझा किए जाते हैं।
जांच में यह भी सामने आया कि हारिस अली इसी मॉडल के जरिए कई युवाओं को नेटवर्क से जोड़ने की कोशिश कर रहा था।
‘लोन वुल्फ’ रणनीति पर नेटवर्क:
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि अब बड़े समूहों की जगह नेटवर्क ‘लोन वुल्फ’ रणनीति पर काम कर रहा है। इसमें किसी एक व्यक्ति को मानसिक रूप से तैयार कर अकेले ही घटना को अंजाम देने के लिए प्रेरित किया जाता है। इस मॉडल में नेटवर्क का आकार छोटा होता है, जिससे ट्रेस करना कठिन हो जाता है और खतरा बढ़ जाता है।
वेस्ट यूपी में ‘साइलेंट ऑनलाइन मॉड्यूल’
सूत्रों के अनुसार, पिछले 8–10 वर्षों में वेस्ट यूपी में एक साइलेंट डिजिटल मॉड्यूल सक्रिय हुआ है। यह किसी एक व्यक्ति या स्थान पर निर्भर नहीं करता, बल्कि डिजिटल रूप से जुड़े छोटे समूहों के माध्यम से काम करता है। यही कारण है कि नेटवर्क की पहचान और ट्रैकिंग बेहद चुनौतीपूर्ण बन गई है।
कैंपस और ऑनलाइन निगरानी:
सुरक्षा एजेंसियों ने वेस्ट यूपी के कॉलेज परिसरों में सतर्कता बढ़ा दी है। कॉलेज प्रशासन को अलर्ट जारी किए गए हैं और छात्रों की संदिग्ध ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। साइबर सेल की सक्रियता बढ़ाई गई है और पुराने कनेक्शनों की पुनः जांच शुरू कर दी गई है।
संवेदनशील जिलों में चौकसी:
सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और मेरठ समेत कई जिलों को हाई-रिस्क जोन घोषित किया गया है। एजेंसियां इन जिलों में पुराने मामलों और संभावित नेटवर्क की गहन जांच कर रही हैं।
जांच अधिकारियों का कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर तेजी से बदलती रणनीतियों के चलते खतरा और जटिल हो गया है। कॉलेजों, अभिभावकों और छात्रों को सतर्क रहने की आवश्यकता है, ताकि किसी भी संदिग्ध गतिविधि की समय रहते पहचान की जा सके और बड़े खतरे को टाला जा सके।
