नई दिल्ली। भारत के खिलाफ कथित आतंकी गतिविधियों की साजिश से जुड़े एक बड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का खुलासा हुआ है। इस मामले में छह यूक्रेनी और एक अमेरिकी नागरिक को अदालत ने 11 दिन की हिरासत में भेज दिया है। बंद कमरे में हुई सुनवाई के दौरान जांच एजेंसी ने लंबी कस्टडी की मांग की थी, लेकिन अदालत ने सीमित अवधि के लिए ही अनुमति दी। मामले की अगली सुनवाई 27 मार्च तक तय की गई है।
जांच में सामने आया है कि ये सभी विदेशी नागरिक वैध वीजा के जरिए भारत पहुंचे थे, लेकिन इसके बाद उन्होंने तय नियमों का उल्लंघन करते हुए पूर्वोत्तर भारत के संवेदनशील और प्रतिबंधित क्षेत्रों में प्रवेश किया। बताया जा रहा है कि बिना अनुमति मिजोरम के संरक्षित इलाकों में जाने के बाद ये लोग म्यांमार की सीमा पार कर गए, जहां उन्होंने कथित तौर पर उग्रवादी समूहों को सैन्य प्रशिक्षण दिया।
प्राथमिक जांच के अनुसार, इन लोगों की गतिविधियां केवल सीमित ट्रेनिंग तक नहीं थीं, बल्कि इसमें ड्रोन संचालन, हथियारों के इस्तेमाल और संभावित हमलों की रणनीति तैयार करना भी शामिल था। एजेंसियों को संदेह है कि यह नेटवर्क भारत के पूर्वोत्तर में सक्रिय उग्रवादी संगठनों को तकनीकी और सामरिक सहायता प्रदान कर रहा था।
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गिरफ्तारी की प्रक्रिया भी कई शहरों में फैली रही। अमेरिकी नागरिक को कोलकाता एयरपोर्ट पर रोका गया, जबकि तीन यूक्रेनी नागरिकों को लखनऊ एयरपोर्ट से हिरासत में लिया गया। बाकी तीन आरोपियों को दिल्ली एयरपोर्ट पर पकड़ा गया। इन सभी को अलग-अलग स्थानों से पकड़कर एक साथ पूछताछ के लिए लाया गया, जिसके बाद कोर्ट में पेश किया गया।
जांच एजेंसियों का दावा है कि आरोपियों के पास से मिले डिजिटल उपकरणों और दस्तावेजों में कई महत्वपूर्ण सुराग मिले हैं। इनमें विदेशी संपर्कों, फंडिंग चैनल्स और ड्रोन सप्लाई से जुड़े नेटवर्क की जानकारी शामिल है। शुरुआती संकेतों के अनुसार, यूरोप से ड्रोन और अन्य उपकरणों की खेप भारत के रास्ते मंगवाने की कोशिश की गई थी, जिसे बाद में उग्रवादी गतिविधियों में इस्तेमाल किया जाना था।
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अदालत में सुनवाई बंद कमरे में की गई। सूत्रों के मुताबिक, जांच एजेंसियों ने अदालत को बताया कि यह केवल सात लोगों का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय मॉड्यूल सक्रिय हो सकता है। ऐसे में विस्तृत पूछताछ और डिजिटल फॉरेंसिक जांच बेहद जरूरी है।
यह भी सामने आया है कि आरोपी म्यांमार में सक्रिय कुछ एथनिक आर्म्ड ग्रुप्स के संपर्क में थे। इन समूहों को ट्रेनिंग देने के अलावा, भारत में संभावित गतिविधियों के लिए नेटवर्क तैयार करने की भी कोशिश की जा रही थी। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि भारत के भीतर इनका कोई लोकल सपोर्ट सिस्टम या सहयोगी मौजूद था या नहीं।
सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह मामला इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि इसमें विदेशी नागरिकों की प्रत्यक्ष संलिप्तता सामने आई है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत विरोधी गतिविधियों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वय बढ़ रहा है। ऐसे मामलों में तकनीकी संसाधनों, खासकर ड्रोन और डिजिटल कम्युनिकेशन का इस्तेमाल नई चुनौती बनकर उभर रहा है।
फिलहाल सभी आरोपियों से गहन पूछताछ जारी है। जांच का फोकस उनके नेटवर्क, फंडिंग सोर्स और भारत में संभावित टारगेट्स की पहचान पर है। आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है, जिससे देश की सुरक्षा से जुड़े अहम पहलुओं पर नई जानकारी सामने आ सकती है।
