हाईकोर्ट के आदेश की गलत व्याख्या पर फटकार; कहा—एक आरोपी को मिली राहत सभी पर लागू नहीं हो सकती

नोएडा भूमि घोटाला: सह-आरोपियों पर चलेगा केस, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश किया रद्द

Team The420
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नई दिल्ली। Supreme Court of India ने नोएडा भूमि घोटाले से जुड़े मामले में अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश केवल उसी आरोपी तक सीमित रहेगा, जिसने अदालत में याचिका दायर की थी। कोर्ट ने कहा कि अन्य सह-आरोपी इस आदेश का स्वतः लाभ नहीं ले सकते। इसी के साथ शीर्ष अदालत ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें हाईकोर्ट के आदेश की गलत व्याख्या करते हुए सभी आरोपियों को राहत दे दी गई थी।

न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा आदेश की गलत समझ से न्यायिक प्रक्रिया में भ्रम पैदा हुआ। अदालत ने साफ किया कि “किसी एक आरोपी को दी गई राहत को सभी पर लागू मान लेना कानून की सही व्याख्या नहीं है।”

300 बीघा जमीन से जुड़ा है मामला

यह मामला गौतम बुद्ध नगर के चिटहेरा गांव की करीब 300 बीघा जमीन से जुड़े कथित घोटाले का है। आरोप है कि किसानों पर दबाव डालकर उनकी जमीन बेहद कम कीमत पर खरीद ली गई। वर्ष 2022 में दर्ज एफआईआर में धोखाधड़ी, जालसाजी, उगाही और आपराधिक साजिश जैसी गंभीर धाराएं लगाई गई थीं। साथ ही अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत भी मामला दर्ज किया गया।

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याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता धनंजय जैन ने दलील दी कि यह मामला किसानों के अधिकारों से जुड़ा है। उन्होंने कहा, “किसानों की जमीन कौड़ियों के दाम पर ली गई, जो न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।”

हाईकोर्ट के आदेश को लेकर बना भ्रम

दिसंबर 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर, चार्जशीट और आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया था। इसके बाद अन्य सह-आरोपियों ने ट्रायल कोर्ट में यह दलील दी कि जब एक आरोपी को राहत मिल चुकी है, तो उन्हें भी वही लाभ मिलना चाहिए।

ट्रायल कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार कर सभी आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही पर रोक लगा दी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को गलत करार देते हुए कहा कि हाईकोर्ट का आदेश केवल उस आरोपी तक सीमित था, जिसने अदालत का रुख किया था। अन्य आरोपी बिना अलग याचिका दायर किए इस राहत के पात्र नहीं हो सकते।

सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश

शीर्ष अदालत ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए बाकी सभी आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही फिर से शुरू करने का निर्देश दिया। साथ ही यह भी कहा गया कि सह-आरोपियों द्वारा हाईकोर्ट में दायर याचिकाओं को किसी अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध कर तीन महीने के भीतर निपटाया जाए।

अदालत ने ट्रायल कोर्ट को भी आगाह किया कि अनावश्यक व्याख्या से बचना चाहिए, क्योंकि इससे न्यायिक प्रक्रिया में देरी और भ्रम की स्थिति पैदा होती है।

सरकार से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से यह भी पूछा है कि किसानों से कथित रूप से ली गई जमीन के मामले में अब तक क्या कार्रवाई की गई है। अदालत ने जानना चाहा कि क्या विवादित बिक्री विलेखों को रद्द करने या प्रभावित किसानों को राहत देने के लिए कोई ठोस कदम उठाए गए हैं।

कानूनी तौर पर अहम फैसला

यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया की स्पष्टता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने साफ कर दिया है कि किसी एक आरोपी को मिली राहत का लाभ सभी को नहीं दिया जा सकता, जब तक वे स्वयं अदालत में जाकर राहत न मांगें।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में मार्गदर्शक साबित होगा, जहां सह-आरोपी समान आधार पर राहत पाने की कोशिश करते हैं। फिलहाल, इस मामले में आगे की कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं

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