Noida। साइबर अपराधियों ने ठगी का एक नया और बेहद खतरनाक तरीका अपनाते हुए एक सेवानिवृत्त बैंक मैनेजर को “डिजिटल अरेस्ट” के नाम पर 1.29 करोड़ रुपये का चूना लगा दिया। यह घटना साइबर अपराधों के बढ़ते खतरे को उजागर करती है और यह भी दिखाती है कि कैसे ठग खासतौर पर बुजुर्गों को निशाना बना रहे हैं।
पीड़ित 72 वर्षीय बुजुर्ग Bank of Maharashtra में मैनेजर रह चुके हैं और Greater Noida के निवासी हैं। उनकी शिकायत के आधार पर साइबर क्राइम थाने में प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है।
कैसे शुरू हुआ पूरा मामला
घटना की शुरुआत 6 फरवरी 2026 को एक संदिग्ध फोन कॉल से हुई। कॉल करने वाले ने खुद को Telecom Regulatory Authority of India का अधिकारी बताया और कहा कि पीड़ित के नाम पर एक सिम कार्ड जारी हुआ है, जिसका इस्तेमाल गैरकानूनी गतिविधियों में हो रहा है। इस जानकारी से बुजुर्ग घबरा गए और ठगों ने इसी का फायदा उठाया।
FutureCrime Summit 2026 Calls for Speakers From Government, Industry and Academia
कुछ ही देर बाद उन्हें वीडियो कॉल किया गया, जिसमें सामने कोर्ट जैसा माहौल दिखाया गया। ठगों ने दावा किया कि उन्हें “डिजिटल अरेस्ट” कर लिया गया है। उन्होंने खुद को पुलिस और जांच एजेंसियों से जुड़ा बताया और चेतावनी दी कि सहयोग नहीं करने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा।
मनोवैज्ञानिक दबाव बनाकर ठगी
जालसाजों ने पीड़ित को लगभग दो दिन तक लगातार वीडियो कॉल पर रखा। उन्हें घर से बाहर न जाने और कॉल चालू रखने के निर्देश दिए गए। इस दौरान बार-बार कहा गया कि उनके बैंक खातों की जांच चल रही है और सत्यापन के लिए पैसे ट्रांसफर करने होंगे।
डर और मानसिक दबाव में आकर पीड़ित ने कई किस्तों में पैसे ट्रांसफर कर दिए। 13 फरवरी को 51.95 लाख रुपये, 19 फरवरी को 48.95 लाख रुपये, 21 फरवरी को 10.95 लाख रुपये, 25 फरवरी को 17.20 लाख रुपये और 26 फरवरी को 56,962 रुपये भेजे गए। इस तरह कुल 1 करोड़ 29 लाख 61 हजार 962 रुपये ठगों के खातों में चले गए।
फर्जी दस्तावेजों से भरोसा
ठगी को विश्वसनीय बनाने के लिए आरोपियों ने बाद में Supreme Court of India और Mumbai Police के नाम से फर्जी पत्र भी भेजे। इन पत्रों में दावा किया गया कि जांच पूरी हो चुकी है और उन्हें “नो ड्यूज सर्टिफिकेट” जारी कर दिया गया है। साथ ही यह भरोसा दिलाया गया कि पैसा जल्द वापस कर दिया जाएगा।
जब काफी समय बीतने के बाद भी पैसा वापस नहीं मिला, तब पीड़ित को ठगी का एहसास हुआ। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय साइबर क्राइम पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई।
विशेषज्ञ की राय
साइबर अपराध के बढ़ते मामलों पर Shikha Singh, सीनियर रिसर्च एसोसिएट, सेंटर फॉर पुलिस टेक्नोलॉजी, कहती हैं,
“डिजिटल अरेस्ट जैसे फ्रॉड पूरी तरह मनोवैज्ञानिक हेरफेर पर आधारित होते हैं। अपराधी पहले डर पैदा करते हैं, फिर व्यक्ति को अलग-थलग कर देते हैं, जिससे वह किसी से सलाह न ले सके।”
वह आगे कहती हैं,
“वीडियो कॉल, फर्जी पहचान और आधिकारिक माहौल बनाकर लोगों को भ्रमित किया जाता है। खासकर बुजुर्ग और तकनीकी रूप से कम जागरूक लोग इनके आसान शिकार बनते हैं।”
पुलिस की जांच जारी
पुलिस के अनुसार, यह मामला एक संगठित साइबर गिरोह का प्रतीत होता है, जो तकनीक और मनोवैज्ञानिक दबाव का इस्तेमाल कर लोगों को फंसाता है। फिलहाल आरोपियों की पहचान और पैसों के लेन-देन की जांच की जा रही है।
‘डिजिटल अरेस्ट’ क्या है?
“डिजिटल अरेस्ट” कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि ठगों द्वारा बनाया गया एक फर्जी तरीका है। इसमें वीडियो कॉल के जरिए व्यक्ति को यह विश्वास दिलाया जाता है कि वह कानून की गिरफ्त में है, जबकि भारत में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
कैसे बचें ऐसे साइबर फ्रॉड से
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी अनजान कॉल पर अपनी व्यक्तिगत या बैंकिंग जानकारी साझा न करें। यदि कोई खुद को सरकारी अधिकारी बताकर पैसे मांगता है, तो उसकी पहचान की पुष्टि आधिकारिक माध्यमों से करें।
इसके अलावा, डर या दबाव में आकर कोई भी आर्थिक निर्णय लेना नुकसानदायक हो सकता है। सतर्कता, जागरूकता और जानकारी की पुष्टि ही ऐसे साइबर अपराधों से बचने का सबसे प्रभावी तरीका है।
यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि साइबर अपराधी लगातार नए तरीके अपना रहे हैं, और आम लोगों को अपनी मेहनत की कमाई सुरक्षित रखने के लिए सतर्क रहना बेहद जरूरी है।
