केंद्रीय मंत्री की बेटी की याचिका पर अंतरिम राहत; एक्स, गूगल, मेटा समेत कई प्लेटफॉर्म्स को निर्देश, ₹10 करोड़ हर्जाने की भी मांग

सोशल मीडिया पर ‘एपस्टीन लिंक’ पोस्ट पर सख्ती: दिल्ली हाईकोर्ट ने 24 घंटे में कंटेंट हटाने का दिया आदेश

Team The420
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नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर फैलाए गए कथित मानहानिकारक कंटेंट को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को 24 घंटे के भीतर संबंधित पोस्ट और लेख हटाने का निर्देश दिया है। यह आदेश केंद्रीय मंत्री Hardeep Singh Puri की बेटी Himayani Puri द्वारा दायर मानहानि याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया गया।

मामले की सुनवाई करते हुए Delhi High Court की एकल पीठ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स—एक्स, गूगल, मेटा (फेसबुक), यूट्यूब और लिंक्डइन—को स्पष्ट निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता से जुड़े सभी कथित आपत्तिजनक और झूठे कंटेंट को तत्काल हटाया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि यदि कंटेंट अपलोड करने वाले इसे नहीं हटाते हैं, तो संबंधित प्लेटफॉर्म्स भारत में इसकी पहुंच को ब्लॉक करने के लिए बाध्य होंगे।

अदालत ने अपने आदेश में फिलहाल वैश्विक स्तर पर कंटेंट ब्लॉक करने का निर्देश नहीं दिया है। यह मुद्दा पहले से ही एक बड़ी पीठ के समक्ष लंबित है, जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कंटेंट हटाने को लेकर विभिन्न तकनीकी कंपनियों ने आपत्ति जताई है। ऐसे में अदालत ने सीमित दायरे में अंतरिम राहत देते हुए केवल भारत में कंटेंट ब्लॉक करने की व्यवस्था लागू करने को कहा।

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याचिकाकर्ता Himayani Puri ने अपनी अर्जी में आरोप लगाया कि 22 फरवरी 2026 से सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ एक सुनियोजित और दुर्भावनापूर्ण अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान के तहत उन्हें अमेरिकी दोषसिद्ध यौन अपराधी Jeffrey Epstein से जोड़ने की कोशिश की गई, जिसमें वित्तीय, व्यावसायिक और व्यक्तिगत संबंधों के झूठे दावे किए गए।

याचिका में यह भी कहा गया कि कुछ पोस्ट्स में यह आरोप लगाया गया कि जहां वह कार्यरत थीं, वहां एपस्टीन या उनके सहयोगियों से जुड़े संदिग्ध धन का लेन-देन हुआ था। इसके अलावा, एक अन्य दावा यह भी किया गया कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था लेहमन ब्रदर्स के पतन में भूमिका निभाई थी। याचिकाकर्ता ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह झूठा, भ्रामक और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला बताया है।

याचिका के माध्यम से न केवल इन पोस्ट्स को हटाने की मांग की गई, बल्कि संबंधित प्लेटफॉर्म्स और अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा की भी अपील की गई है। साथ ही, प्रतिष्ठा को हुए नुकसान के लिए ₹10 करोड़ के हर्जाने की मांग भी अदालत के समक्ष रखी गई है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी है कि वे ऐसे कंटेंट को समय पर हटाएं, जो प्रथम दृष्टया मानहानिकारक प्रतीत होता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

प्रारंभिक तौर पर अदालत के इस आदेश को याचिकाकर्ता के लिए बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि सोशल मीडिया पर तेजी से फैलते ऐसे कंटेंट से व्यक्तिगत और पेशेवर छवि को गंभीर नुकसान हो सकता है। वहीं, तकनीकी कंपनियों के लिए यह आदेश एक बार फिर कंटेंट मॉडरेशन और कानूनी जिम्मेदारियों के संतुलन की चुनौती को रेखांकित करता है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला आने वाले समय में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर मानहानि से जुड़े मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। फिलहाल, सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित प्लेटफॉर्म्स अदालत के आदेश का कितनी तेजी और प्रभावी तरीके से पालन करते हैं

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