डिलीवरी एजेंट बनकर शहरों में करते थे रेकी, मदरबोर्ड से डेटा निकालकर साइबर ठगी नेटवर्क तक पहुंचाते थे फोन और जानकारी

देशभर से फोन चोरी कर बना ‘डेटा सिंडिकेट’: 11,600 मोबाइल बरामद, जामताड़ा तक जुड़ा तार

Team The420
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में साइबर अपराध के एक संगठित और बहुस्तरीय नेटवर्क का खुलासा हुआ है, जहां एक इंटरस्टेट गिरोह देशभर से मोबाइल फोन चोरी कर उन्हें साइबर ठगी के बड़े नेटवर्क तक पहुंचा रहा था। इस मामले में आठ आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है और उनके कब्जे से 11,605 मोबाइल फोन बरामद किए गए हैं, जिनकी कीमत करीब ₹1 करोड़ आंकी गई है।

जांच में सामने आया है कि यह गिरोह सिर्फ चोरी तक सीमित नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित “डेटा सिंडिकेट” के रूप में काम कर रहा था। गिरफ्तार आरोपियों की पहचान मोहम्मद अनारुल, मोहम्मद दिल फराज, सिताबुल, हसीबुर रहमान, साबिर आलम, मोहम्मद अहमद, मोहम्मद हसन और मोहम्मद शफीक के रूप में हुई है। सभी आरोपी बिहार के कटिहार और पूर्णिया जिलों के रहने वाले बताए जा रहे हैं।

सूचना के आधार पर की गई कार्रवाई के दौरान एक ट्रक को टोल प्लाजा के पास रोका गया, जहां से भारी मात्रा में मोबाइल फोन बरामद हुए। इस बरामदगी के बाद पूरे नेटवर्क का खुलासा हुआ। शुरुआती जांच में पता चला है कि यह गिरोह देश के कई बड़े शहरों में फैला हुआ था और चोरी किए गए मोबाइल फोन को एकत्र कर आगे सप्लाई करता था।

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गिरोह की कार्यप्रणाली बेहद चौंकाने वाली रही। इसके सदस्य हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई और मुंबई जैसे शहरों में किराए पर कमरे लेकर रहते थे और खुद को ई-कॉमर्स कंपनियों के डिलीवरी एजेंट के रूप में पेश करते थे। इस पहचान के जरिए वे रिहायशी इलाकों में बिना किसी शक के आवाजाही करते और लोगों की दिनचर्या पर नजर रखते थे। मौका मिलते ही वे मोबाइल फोन चोरी या छीन लेते थे।

जांच में यह भी सामने आया है कि चोरी किए गए मोबाइल फोन को बिहार ले जाकर उनके मदरबोर्ड से डेटा निकाला जाता था। यह प्रक्रिया इतनी उन्नत थी कि खराब या बंद पड़े फोन से भी महत्वपूर्ण जानकारी हासिल कर ली जाती थी। इसमें कॉन्टैक्ट लिस्ट, निजी संदेश, ओटीपी और बैंकिंग से जुड़ी संवेदनशील जानकारियां शामिल होती थीं।

इस डेटा का इस्तेमाल आगे साइबर ठगी में किया जाता था या इसे अन्य साइबर अपराधियों को बेच दिया जाता था। जांच एजेंसियों को इस नेटवर्क के झारखंड के जामताड़ा स्थित कुख्यात साइबर ठगी गिरोहों से जुड़े होने के संकेत भी मिले हैं। आशंका है कि यह गिरोह चोरी किए गए फोन और निकाले गए डेटा को फिशिंग और बैंकिंग फ्रॉड करने वाले नेटवर्क तक पहुंचाता था, जिससे देशभर के लोगों को निशाना बनाया जाता था।

मामले में यह भी स्पष्ट हुआ है कि गिरोह के सदस्य तकनीकी रूप से प्रशिक्षित थे और मोबाइल हार्डवेयर से डेटा निकालने की विशेष जानकारी रखते थे। यही वजह रही कि यह नेटवर्क पारंपरिक चोरी से आगे बढ़कर एक बड़े साइबर फ्रॉड इकोसिस्टम का हिस्सा बन गया।

इस कार्रवाई के बाद अब जांच एजेंसियां गिरोह के अन्य सदस्यों और उनके संपर्कों की तलाश में जुट गई हैं। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि अब तक इस नेटवर्क के जरिए कितने लोगों को ठगी का शिकार बनाया गया और चोरी किए गए डेटा का किस स्तर पर दुरुपयोग हुआ।

प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रोफेसर त्रिवेणी सिंह के मुताबिक, ऐसे मामलों में अपराधी “सोशल इंजीनियरिंग” और “फिजिकल एक्सेस” का संयुक्त इस्तेमाल करते हैं। उनका कहना है कि मोबाइल फोन आज व्यक्ति की पूरी डिजिटल पहचान का केंद्र बन चुका है। ऐसे में डिवाइस चोरी होने के बाद उससे निकाला गया डेटा बड़े पैमाने पर वित्तीय और पहचान से जुड़े अपराधों में इस्तेमाल किया जा सकता है।

फिलहाल जांच जारी है और माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे हो सकते हैं, जिससे देशभर में फैले साइबर अपराध के नेटवर्क की कई और परतें सामने आ सकती हैं

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