दुश्मन के हथियारों को रास्ता भुलाने वाली टेक्नोलॉजी बनी नई चुनौती; आम नागरिक भी असर से अछूते नहीं

सिग्नल से जंग: GPS जैमिंग से भटक रहे ड्रोन-मिसाइल, युद्ध का बदला चेहरा

Team The420
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नई दिल्ली। वैश्विक स्तर पर बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अब युद्ध का स्वरूप तेजी से बदलता नजर आ रहा है। परंपरागत हथियारों के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक तकनीकें भी निर्णायक भूमिका निभा रही हैं। हाल के घटनाक्रमों में ‘GPS जैमिंग’ नाम की एक ऐसी तकनीक सुर्खियों में है, जिसने युद्ध की रणनीति को नई दिशा दे दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस तकनीक के इस्तेमाल से ड्रोन और मिसाइलें अपने तय लक्ष्य से भटक रही हैं, जिससे दुश्मन की सैन्य क्षमता को बिना सीधे हमले के कमजोर किया जा रहा है।

क्या है GPS जैमिंग और क्यों है अहम

GPS जैमिंग एक इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप तकनीक है, जिसका मुख्य उद्देश्य ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) के सिग्नल को बाधित करना होता है। इसके जरिए किसी भी GPS आधारित डिवाइस—जैसे मोबाइल फोन, कार नेविगेशन सिस्टम, ड्रोन या सैन्य उपकरण—को गलत लोकेशन दिखाने या पूरी तरह सिग्नल खत्म करने की क्षमता होती है।

सरल शब्दों में कहें तो यह तकनीक डिवाइस को भ्रमित कर देती है, जिससे वह सही दिशा में काम नहीं कर पाता। यही वजह है कि आधुनिक युद्ध में इसे एक ‘साइलेंट वेपन’ के तौर पर देखा जा रहा है, जो बिना विस्फोट के भी दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।

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कैसे काम करती है GPS जैमिंग तकनीक

इस तकनीक में हाई-फ्रीक्वेंसी रेडियो सिग्नल का इस्तेमाल किया जाता है, जो असली GPS सिग्नल को दबा देते हैं। आमतौर पर GPS सैटेलाइट से आने वाले सिग्नल काफी कमजोर होते हैं, जिन्हें डिवाइस रिसीव करता है। लेकिन जब जैमिंग डिवाइस ज्यादा ताकतवर नकली सिग्नल भेजता है, तो असली सिग्नल दब जाते हैं।

इसके बाद डिवाइस गलत डेटा पढ़ने लगता है और उसकी दिशा बदल जाती है। यही कारण है कि ड्रोन या मिसाइल अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं या पूरी तरह नियंत्रण खो देते हैं। युद्ध के दौरान यह तकनीक दुश्मन की रणनीति को निष्क्रिय करने में अहम भूमिका निभाती है।

युद्ध में बढ़ता उपयोग, सस्ता और प्रभावी विकल्प

विशेषज्ञों का मानना है कि GPS जैमिंग पारंपरिक सैन्य हमलों की तुलना में कहीं अधिक सस्ता और असरदार विकल्प बनकर उभरा है। इसके जरिए बिना सीधे टकराव के दुश्मन के अत्याधुनिक हथियारों को बेअसर किया जा सकता है।

हाल के संघर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां मिसाइल और ड्रोन अपने लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही रास्ता भटक गए और कई किलोमीटर दूर गिर गए। इन घटनाओं के पीछे GPS सिग्नल में गड़बड़ी को प्रमुख कारण माना जा रहा है। इससे साफ है कि आने वाले समय में इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर युद्ध का अहम हिस्सा बनने वाला है।

आम लोगों पर भी दिख सकता है असर

GPS जैमिंग का प्रभाव सिर्फ युद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आम नागरिकों की दैनिक जिंदगी को भी प्रभावित कर सकता है। यदि किसी क्षेत्र में GPS सिग्नल बाधित होते हैं, तो मोबाइल फोन में गलत लोकेशन दिखाई दे सकती है। कैब सेवाएं, ऑनलाइन डिलीवरी और मैप्स जैसे प्लेटफॉर्म भी इससे प्रभावित हो सकते हैं।

इतना ही नहीं, विमानन और समुद्री नेविगेशन सिस्टम पर भी इसका असर पड़ सकता है, जिससे सुरक्षा से जुड़े जोखिम बढ़ जाते हैं। यही कारण है कि कई देशों में इस तकनीक के इस्तेमाल को लेकर सख्त निगरानी और नियम लागू किए गए हैं।

भविष्य में और गहराएगा खतरा

तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार, जैसे-जैसे दुनिया सैटेलाइट और डिजिटल सिस्टम पर निर्भर होती जा रही है, वैसे-वैसे GPS जैमिंग जैसी तकनीकों का खतरा भी बढ़ता जाएगा। यह केवल युद्ध तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि साइबर और इलेक्ट्रॉनिक हमलों के नए रूप में सामने आ सकता है।

ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों और तकनीकी कंपनियों के सामने बड़ी चुनौती यह है कि वे ऐसे सिस्टम विकसित करें, जो जैमिंग के बावजूद सटीक और सुरक्षित तरीके से काम कर सकें। फिलहाल, इतना साफ है कि आने वाले दौर में युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि सिग्नल और तकनीक के दम पर भी लड़े जाएंगे।

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