साइबर अपराध के बढ़ते खतरे पर गंभीर टिप्पणी करते हुए एक मजिस्ट्रेट अदालत ने कहा कि ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामले पारंपरिक डकैती और लूट से भी अधिक गंभीर प्रकृति के होते हैं। अदालत ने ₹3.74 करोड़ की साइबर ठगी से जुड़े मामले में तीन आरोपियों—19 वर्षीय छात्र यश ठाकुर, साहिल जैन और हैदर सईद—की जमानत याचिका खारिज कर दी। यह मामला केंद्रीय जांच एजेंसी की आर्थिक अपराध शाखा द्वारा दर्ज किया गया था, जिसमें कुल छह लोगों पर धोखाधड़ी का आरोप है।
अदालत का सख्त रुख: डिजिटल ठगी से मानसिक क्षति
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि डिजिटल माध्यम से की गई ठगी केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह पीड़ितों के मानसिक और सामाजिक विश्वास पर भी गहरा प्रभाव डालती है। आदेश में उल्लेख किया गया कि एक ही दिन यानी 2 जुलाई 2025 को आरोपियों ने कई घटनाओं को अंजाम दिया और करीब दस पीड़ितों को निशाना बनाया गया। जांच के दौरान सामने आया कि आरोपियों ने फर्जी डिजिटल गिरफ्तारी, ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी और कस्टम विभाग से जुड़े झूठे दावों का सहारा लेकर लोगों को ठगा।
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साइबर अपराध की जटिलता पर कोर्ट की चेतावनी
अदालत ने जमानत याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि साइबर अपराध की तकनीकी प्रकृति और संगठित तरीके से किए जाने वाले संचालन को देखते हुए इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। न्यायालय ने टिप्पणी की कि डिजिटल धोखाधड़ी में अपराधी कई राज्यों या देशों में बैठकर भी अपराध को अंजाम दे सकते हैं, जिससे जांच और रोकथाम की प्रक्रिया जटिल हो जाती है। इसलिए ऐसे मामलों में जमानत देते समय विशेष सावधानी बरतना आवश्यक है।
जांच एजेंसियों के अनुसार इस मामले में आरोपियों ने सोशल इंजीनियरिंग तकनीक का इस्तेमाल कर लोगों को विश्वास में लिया और फिर अलग-अलग चरणों में धन ट्रांसफर करवा लिया। आरोप है कि पीड़ितों से फोन कॉल और ऑनलाइन संदेशों के माध्यम से संपर्क किया गया और खुद को सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर डराया गया। इसके बाद डिजिटल गिरफ्तारी का भय दिखाकर पैसे जमा कराने के लिए दबाव बनाया गया।
डिजिटल गिरफ्तारी का डर दिखाकर ठगी का modus operandi
अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि साइबर अपराध केवल आर्थिक अपराध नहीं बल्कि आधुनिक समय की एक बड़ी सामाजिक चुनौती बन चुका है। डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन सेवाओं के विस्तार के साथ ही साइबर ठगों के तरीके भी लगातार बदल रहे हैं। न्यायालय ने संकेत दिया कि ऐसे अपराधों में आरोपियों को जमानत देना जांच प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है, विशेषकर जब मामले में बड़ी राशि और कई पीड़ित शामिल हों।
इस मामले में कुल छह आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है। आरोपियों पर फर्जी पहचान का उपयोग कर ऑनलाइन धोखाधड़ी करने और निवेश तथा सरकारी कार्रवाई के नाम पर लोगों से रकम ऐंठने का आरोप है। जांच अधिकारियों के अनुसार गिरोह संगठित तरीके से काम करता था और ठगी की रकम को विभिन्न खातों में घुमाकर उसे ट्रेस करना कठिन बनाया जाता था।
अदालत के आदेश को साइबर अपराध मामलों में सख्ती के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल युग में अपराध की प्रकृति बदल गई है और कानून व्यवस्था को भी उसी अनुसार मजबूत करना होगा। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश में ऑनलाइन धोखाधड़ी और डिजिटल गिरफ्तारी जैसे मामलों में तेजी से वृद्धि दर्ज की जा रही है।
