नई दिल्ली: देश में तेजी से बढ़ते साइबर अपराध के बीच भारत की राष्ट्रीय साइबर अपराध प्रतिक्रिया प्रणाली ने डिजिटल ठगी के खिलाफ बड़ी और ठोस सफलता दर्ज की है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 से 31 दिसंबर 2025 के बीच ₹8,189 करोड़ से अधिक की संभावित साइबर ठगी को समय रहते रोका गया, जिससे लाखों नागरिकों को भारी वित्तीय नुकसान से बचाया जा सका।
यह उपलब्धि Citizen Financial Cyber Fraud Reporting and Management System (CFCFRMS) के माध्यम से संभव हुई, जिसके तहत अब तक 23.61 लाख से अधिक वित्तीय साइबर ठगी की शिकायतें दर्ज की गई हैं। यह प्रणाली त्वरित रिपोर्टिंग और तत्काल हस्तक्षेप के उद्देश्य से विकसित की गई है, ताकि संदिग्ध लेन-देन को शुरुआती चरण में ही रोका जा सके और धन की निकासी से पहले कार्रवाई संभव हो।
संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत ‘पुलिस’ और ‘लोक व्यवस्था’ राज्य विषय हैं और साइबर अपराध की रोकथाम, जांच और अभियोजन की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की होती है। इसके बावजूद, केंद्र सरकार ने राज्यों के प्रयासों को मज़बूती देने के लिए एक राष्ट्रीय स्तर का समन्वित ढांचा तैयार किया है, जिससे साइबर अपराध से अधिक संगठित और प्रभावी ढंग से निपटा जा सके।
इस राष्ट्रीय ढांचे के केंद्र में Indian Cyber Crime Coordination Centre है, जिसकी स्थापना वर्ष 2018 में देश में साइबर अपराध की रोकथाम, जांच और अभियोजन के लिए एक समग्र तंत्र विकसित करने के उद्देश्य से की गई थी। जुलाई 2024 से इसे Ministry of Home Affairs का संबद्ध कार्यालय बनाया गया, जिससे इसकी भूमिका और संचालन क्षमता में उल्लेखनीय विस्तार हुआ।
यह केंद्र अंतर-एजेंसी समन्वय, क्षमता निर्माण, तकनीकी सहायता और जन-जागरूकता जैसे कई मोर्चों पर काम कर रहा है। नागरिकों के लिए इसका सबसे प्रत्यक्ष और प्रभावी कदम 1930 टोल-फ्री हेल्पलाइन है, जिसके माध्यम से साइबर ठगी की घटनाओं की तुरंत रिपोर्टिंग की जा सकती है। यह हेल्पलाइन सीधे CFCFRMS प्लेटफॉर्म से जुड़ी है, जिससे बैंकों और वित्तीय संस्थानों को संदिग्ध लेन-देन को तत्काल फ्रीज करने में मदद मिलती है।
वित्तीय ठगी की रिपोर्टिंग तक सीमित न रहते हुए, राष्ट्रीय साइबर तंत्र ने साइबर अपराधियों के डिजिटल ढांचे को तोड़ने पर भी जोर दिया है। 31 दिसंबर 2025 तक, पुलिस और जांच एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार पर 12.21 लाख से अधिक सिम कार्ड और 3.03 लाख मोबाइल डिवाइस के IMEI नंबर ब्लॉक किए गए। इससे साइबर अपराधियों द्वारा बार-बार संचार माध्यम बदलकर ठगी को अंजाम देने की क्षमता पर बड़ी रोक लगी है।
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इस ढांचे का एक अहम नया हिस्सा Suspect Registry है, जिसे सितंबर 2024 में बैंकों और वित्तीय संस्थानों के सहयोग से शुरू किया गया। इस रजिस्ट्री में साइबर अपराधियों और मनी-म्यूल नेटवर्क से जुड़े संदिग्ध पहचानकर्ताओं का डेटाबेस तैयार किया गया है। अब तक 21.65 लाख से अधिक संदिग्ध पहचानकर्ता और 26.48 लाख लेयर-1 म्यूल खाते साझा किए जा चुके हैं। इसके परिणामस्वरूप ₹9,055.27 करोड़ के संदिग्ध लेन-देन को समय रहते खारिज किया गया।
जांच और खुफिया जानकारी के आदान-प्रदान को और मजबूत करने के लिए Samanvaya प्लेटफॉर्म को भी लागू किया गया है। यह एक प्रबंधन सूचना प्रणाली, साइबर अपराध डेटा भंडार और समन्वय मंच के रूप में कार्य करता है, जो विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के बीच साइबर अपराध से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण करता है। इससे अंतरराज्यीय अपराध नेटवर्क और बार-बार अपराध करने वाले गिरोहों की पहचान संभव हो सकी है।
इस प्लेटफॉर्म के अंतर्गत विकसित Pratibimb मॉड्यूल साइबर अपराध से जुड़े व्यक्तियों और बुनियादी ढांचे की भौगोलिक मैपिंग करता है। इससे क्षेत्रीय अधिकारियों को अपराध नेटवर्क की स्पष्ट तस्वीर मिलती है और राज्यों के बीच समन्वित कार्रवाई आसान होती है। प्लेटफॉर्म के माध्यम से तकनीकी और कानूनी सहायता के लिए भी अनुरोध भेजे और प्राप्त किए जाते हैं।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, Samanvaya प्लेटफॉर्म की मदद से अब तक 20,853 आरोपियों की गिरफ्तारी हुई है और 1,35,074 साइबर जांच सहायता अनुरोधों का निपटारा किया गया है। इससे जटिल और सीमा-पार साइबर अपराध मामलों की जांच में उल्लेखनीय तेजी आई है।
न्याय तक आसान पहुंच के उद्देश्य से साइबर ठगी मामलों में ई-एफआईआर दर्ज करने की व्यवस्था भी शुरू की गई है। यह सुविधा फिलहाल दिल्ली, राजस्थान, चंडीगढ़, मध्य प्रदेश और गोवा में लागू की गई है, जिससे पीड़ितों को पुलिस थाने गए बिना औपचारिक शिकायत दर्ज कराने की सुविधा मिल रही है।
केंद्र सरकार राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को साइबर अपराध इकाइयों के उन्नयन, कर्मियों के प्रशिक्षण और उन्नत फॉरेंसिक व विश्लेषणात्मक उपकरणों की उपलब्धता के लिए वित्तीय सहायता और परामर्श भी प्रदान कर रही है। इसके साथ-साथ जन-जागरूकता अभियानों के जरिए नागरिकों को समय पर शिकायत दर्ज कराने और संवेदनशील जानकारी साझा न करने की लगातार सलाह दी जा रही है।
तेजी से बदलते और अधिक संगठित होते साइबर अपराध के परिदृश्य में, आने वाले समय में डेटा एकीकरण, त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र और बैंकों, टेलीकॉम कंपनियों तथा कानून-प्रवर्तन एजेंसियों के बीच और मजबूत तालमेल पर जोर दिया जाएगा। अधिकारियों का मानना है कि राष्ट्रीय साइबर तंत्र की बढ़ती क्षमता ने डिजिटल अपराधियों के लिए जोखिम और लागत दोनों को काफी हद तक बढ़ा दिया है।
