नई दिल्ली। यस बैंक के ₹8,415 करोड़ के अतिरिक्त टियर-1 (AT-1) बॉन्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर 2026 को निवेशकों के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें मार्च 2020 में बैंक के AT-1 बॉन्ड की पूरी रकम घटाने की कार्रवाई रद्द कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने यस बैंक, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और केंद्र सरकार की अपीलें खारिज कर दीं। हालांकि, निवेशकों को भुगतान की प्रक्रिया और समयसीमा के बारे में आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।
अदालत के फैसले के दिन शेयर बाजार में यस बैंक के शेयरों में भारी गिरावट दर्ज की गई। बैंक का शेयर 14.53 प्रतिशत टूटकर ₹18.12 पर बंद हुआ। इस तरह बॉन्डधारकों को कानूनी राहत मिलने के बावजूद शेयरधारकों को बाजार में नुकसान का सामना करना पड़ा। बॉन्डधारकों और शेयरधारकों के हित अलग-अलग होने के कारण फैसले का असर दोनों पर अलग रूप में दिखाई दिया।
क्या हैं ₹8,415 करोड़ के AT-1 बॉन्ड?
यस बैंक ने दिसंबर 2016 में ₹3,000 करोड़ और अक्टूबर 2017 में ₹5,415 करोड़ के AT-1 बॉन्ड जारी किए थे। इनकी कुल रकम ₹8,415 करोड़ थी। बॉन्डधारकों के हितों का प्रतिनिधित्व एक्सिस ट्रस्टी सर्विसेज लिमिटेड कर रही थी।
AT-1 बॉन्ड बैंकों के लिए पूंजी जुटाने का एक माध्यम हैं। सामान्य बॉन्ड की तुलना में इनमें जोखिम अधिक होता है। बैंक की वित्तीय स्थिति गंभीर होने या निर्धारित नियामकीय शर्तें पूरी होने पर इनकी रकम घटाई जा सकती है। कुछ परिस्थितियों में निवेशकों को अपनी पूरी रकम गंवानी पड़ सकती है। इस व्यवस्था का उद्देश्य संकट के दौरान बैंक की पूंजी को मजबूत बनाए रखना है।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में ‘राइट डाउन’ और ‘राइट ऑफ’ के बीच अंतर भी स्पष्ट किया। राइट डाउन का अर्थ बॉन्ड की रकम को घटाना है, जबकि राइट ऑफ का अर्थ संबंधित रकम को पूरी तरह समाप्त करना हो सकता है। अदालत ने 14 मार्च 2020 के प्रशासक के पत्र में इस्तेमाल किए गए ‘राइट डाउन’ शब्द का ही उल्लेख किया।
मार्च 2020 में कैसे शुरू हुआ विवाद?
यस बैंक की वित्तीय स्थिति बिगड़ने के बाद 5 मार्च 2020 को केंद्र सरकार ने बैंक पर मोराटोरियम लगाया था। यह व्यवस्था 3 अप्रैल 2020 तक प्रभावी रहनी थी। इसी दौरान आरबीआई ने बैंक का बोर्ड हटाकर प्रशासक नियुक्त किया। बैंक को संकट से निकालने के लिए पुनर्गठन योजना तैयार की गई।
6 मार्च को जारी प्रारंभिक योजना में AT-1 बॉन्ड की पूरी रकम घटाने का प्रस्ताव था। बॉन्डधारकों ने इसका विरोध किया। एक्सिस ट्रस्टी ने सुझाव दिया कि बॉन्ड समाप्त करने के बजाय उन्हें बैंक के शेयरों में बदला जाए। इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस ने भी प्रस्ताव पर आपत्ति जताई और बॉन्डधारकों के हितों की रक्षा की मांग की।
एक्सिस ट्रस्टी ने 9 मार्च को बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर कर योजना लागू करने से पहले अपना पक्ष सुनने की मांग की। उसने आरबीआई को भी पत्र लिखकर बॉन्ड को शेयरों में बदलने का विकल्प अपनाने का सुझाव दिया।
आरबीआई के एक नोट में बताया गया था कि बॉन्डधारकों के तीन-चौथाई बहुमत ने बॉन्ड को शेयरों में बदलने के प्रस्ताव का समर्थन किया था। इसके तहत ₹10 लाख के प्रत्येक बॉन्ड के बदले ₹2 मूल्य के 19,551 शेयर देने का प्रस्ताव था।
हालांकि, 13 मार्च 2020 को जारी अंतिम पुनर्गठन योजना में न बॉन्ड की रकम घटाने का प्रावधान रखा गया और न ही उन्हें शेयरों में बदलने की व्यवस्था शामिल की गई। इसके बावजूद 14 मार्च को प्रशासक ने ₹3,000 करोड़ और ₹5,415 करोड़ के दोनों बॉन्ड की पूरी रकम राइट डाउन कर दी। इसी कार्रवाई को अदालत में चुनौती दी गई।
प्रशासक के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
बैंक और सरकार की ओर से दलील दी गई कि पुनर्गठन से पहले बॉन्ड पर कार्रवाई की जा सकती थी और पुनर्गठन की प्रक्रिया लंबी चल सकती थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस व्याख्या को स्वीकार नहीं किया। अदालत के अनुसार, ‘पुनर्गठन से पहले’ का अर्थ योजना लागू होने से पहले है, न कि योजना लागू होने के बाद किसी भी समय बॉन्ड की रकम घटाना।
अदालत ने लक्ष्मी विलास बैंक का उदाहरण भी दिया, जहां ₹318.20 करोड़ के बॉन्ड पुनर्गठन योजना लागू होने से एक दिन पहले राइट डाउन किए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यस बैंक के मामले में ऐसा समय क्यों नहीं चुना गया, इसका जवाब नहीं दिया गया।
फैसले में स्पष्ट किया गया कि प्रशासक बैंक के बोर्ड की जगह काम कर सकता है, लेकिन आरबीआई की नियामकीय शक्तियों का इस्तेमाल नहीं कर सकता। यदि बैंक के अस्तित्व पर गंभीर संकट के कारण ‘पॉइंट ऑफ नॉन-वायबिलिटी’ ट्रिगर सक्रिय होता है, तो बॉन्ड राइट डाउन करने का निर्णय आरबीआई को लेना था। इस मामले में कार्रवाई प्रशासक ने की थी।
पूंजी संकट और निवेशकों की सुरक्षा पर भी सवाल
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, 31 दिसंबर 2019 को यस बैंक का कॉमन इक्विटी टियर-1 यानी CET1 पूंजी अनुपात केवल 0.6 प्रतिशत था, जबकि फैसले में उस समय लागू पूंजी आवश्यकता 7.375 प्रतिशत बताई गई। बैंक के पास पूंजी जुटाने और बॉन्ड पर कार्रवाई करने के विकल्प थे, लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी कदम का जरूरी होना और उसका नियमों के मुताबिक होना अलग-अलग बातें हैं।
अदालत ने व्यक्तिगत निवेशकों को AT-1 बॉन्ड बेचे जाने पर भी चिंता जताई। ऐसे जोखिमपूर्ण निवेशों में संभावित नुकसान की स्पष्ट जानकारी देना और उचित निगरानी रखना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बॉन्ड पर तय वार्षिक कूपन भुगतान बॉन्ड के दस्तावेजों के अनुसार किया जाना चाहिए। अदालत की टिप्पणियां इसी मामले की अपील तक सीमित रहेंगी और अन्य लंबित कार्यवाहियां अपने तथ्यों के आधार पर आगे बढ़ सकती हैं।
