नई दिल्ली: कथित निवेश धोखाधड़ी से जुड़े VPVV टेक्नो कंस्ट्रक्शन मामले में जांच आगे बढ़ने के साथ ऐसे कई आरोप सामने आए हैं, जिनमें कंपनी पर फर्जी दस्तावेजों, काल्पनिक रक्षा परियोजनाओं और सरकारी संस्थानों से जुड़ी छवि का इस्तेमाल कर सैकड़ों निवेशकों को गुमराह करने का आरोप लगाया गया है। विभिन्न जांच एजेंसियां इस मामले में आर्थिक अपराध, मनी लॉन्ड्रिंग और संभावित राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी पहलुओं की भी जांच कर रही हैं। हालांकि, मामले में लगाए गए सभी आरोप अभी जांच और न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं तथा किसी भी आरोपी के खिलाफ अदालत द्वारा अंतिम दोष सिद्ध नहीं हुआ है।
जांच से जुड़े दस्तावेजों और शिकायतों के अनुसार, कंपनी ने कई वर्षों तक दावा किया कि उसे अमेरिका के रक्षा विभाग (Pentagon) के लिए सैन्य उपकरण निर्माण का बड़ा अनुबंध मिला है, जिसका आधार कथित “इंडो-यूएस पैसिफिक पीस ट्रीटी” था। बाद में सूचना के अधिकार (RTI) के तहत भारतीय दूतावास, वाशिंगटन से प्राप्त उत्तर में बताया गया कि ऐसा कोई समझौता अस्तित्व में नहीं है। इसके बाद निवेशकों के बीच चिंता बढ़ी और कई लोगों ने अपनी राशि वापस मांगनी शुरू कर दी।
जांचकर्ताओं का आरोप है कि इसके बाद कंपनी ने अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए विभिन्न सार्वजनिक आयोजनों और आधिकारिक प्रतीत होने वाली गतिविधियों का सहारा लिया। आरोप है कि एक निजी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी को मिले नेवी डे आयोजन के अनुबंध का लाभ उठाकर VPVV ने स्वयं को कार्यक्रम से जुड़ा प्रदर्शित किया, जिससे निवेशकों में यह धारणा बनी कि कंपनी का सरकारी संस्थानों और रक्षा प्रतिष्ठानों से सीधा संबंध है।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि कंपनी ने समय-समय पर राजनयिकों, सेवानिवृत्त अधिकारियों और सार्वजनिक हस्तियों की मौजूदगी वाले कार्यक्रम आयोजित किए। जांच एजेंसियों के अनुसार इन आयोजनों की तस्वीरों और वीडियो का व्यापक प्रचार कर संभावित निवेशकों का विश्वास हासिल किया गया। आरोप है कि कई लोगों ने इन्हीं गतिविधियों को देखकर अपनी जीवनभर की बचत निवेश कर दी।
मामले की जांच में यह भी आरोप सामने आया है कि पूर्व सैनिकों और अन्य लोगों को कथित रक्षा परियोजनाओं में रोजगार दिलाने का झांसा दिया गया। शिकायतों के अनुसार अभ्यर्थियों से प्रशिक्षण और अन्य शुल्क लिए गए, लेकिन उन्हें न तो वादा किया गया रोजगार मिला और न ही नियमित भुगतान। जांच एजेंसियां इन आरोपों की भी पड़ताल कर रही हैं।
जांचकर्ताओं के अनुसार कंपनी ने कथित तौर पर फर्जी रक्षा अनुबंध, कूटनीतिक पत्राचार, न्यायिक प्रमाणपत्र और अन्य आधिकारिक दिखने वाले दस्तावेज तैयार कर निवेशकों के सामने प्रस्तुत किए। इसके अलावा विशाखापट्टनम में कथित रूप से “समृद्ध यूरेनियम” (Enriched Uranium) के प्रदर्शन जैसे कार्यक्रम आयोजित कर यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया गया कि कंपनी किसी अत्यंत गोपनीय रक्षा परियोजना का हिस्सा है। इन सभी दावों की सत्यता की जांच जारी है।
वित्तीय जांच में भी कई महत्वपूर्ण पहलुओं की पड़ताल की जा रही है। जांच एजेंसियों के अनुसार कंपनी के घोषित वित्तीय संसाधन सीमित थे, लेकिन उसके खातों से कथित तौर पर बड़ी धनराशि का लेनदेन हुआ। आरोप है कि नकदी संग्रह, हवाला नेटवर्क, शेल कंपनियों और विदेशी खातों के माध्यम से धन के प्रवाह की जांच की जा रही है। कुछ अंतरराष्ट्रीय कड़ियों की भी जांच एजेंसियां पड़ताल कर रही हैं, हालांकि इन दावों की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि बड़े निवेश घोटालों में अपराधी केवल फर्जी दस्तावेजों का सहारा नहीं लेते, बल्कि सरकारी संस्थानों, राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रतिष्ठित आयोजनों और प्रभावशाली व्यक्तियों की छवि का उपयोग कर भरोसे का माहौल तैयार करते हैं। उन्होंने कहा कि निवेश से पहले किसी भी परियोजना, सरकारी अनुबंध या विदेशी साझेदारी के दावों का स्वतंत्र सत्यापन करना अत्यंत आवश्यक है। उनके अनुसार वित्तीय खुफिया एजेंसियों, प्रवर्तन एजेंसियों, साइबर जांच इकाइयों और नियामक संस्थाओं के बीच रीयल-टाइम सूचना साझाकरण तथा डिजिटल वित्तीय निगरानी ऐसे संगठित आर्थिक अपराधों पर प्रभावी अंकुश लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
फिलहाल मामले की जांच विभिन्न एजेंसियों द्वारा जारी है। अदालतों ने भी शिकायतों की गहन जांच के निर्देश दिए हैं। जांच पूरी होने और न्यायिक प्रक्रिया समाप्त होने के बाद ही आरोपों की सत्यता तथा संबंधित व्यक्तियों की कानूनी जिम्मेदारी पर अंतिम निर्णय होगा।
