नई दिल्ली: भारत के बैंकिंग सेक्टर के सबसे बड़े डिफॉल्ट मामलों में से एक में State Bank of India (SBI) के नेतृत्व वाले बैंकिंग कंसोर्टियम को एक महत्वपूर्ण कानूनी सफलता मिली है। Videocon Group से जुड़े Venugopal Nandlal Dhoot के खिलाफ ₹61,000 करोड़ के भारी-भरकम एक्सपोजर को लेकर व्यक्तिगत दिवालिया (personal insolvency) प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू कर दी गई है। इस कार्रवाई के साथ ही वर्षों से लंबित वसूली मामला अब निर्णायक प्रवर्तन चरण में पहुंच गया है।
National Company Law Tribunal (NCLT) द्वारा जारी किए गए आदेश के तहत क्रेडिटर्स से दावे (claims) आमंत्रित किए गए हैं, जिसके लिए सार्वजनिक नोटिस जारी किया गया है। यह कदम केवल एक प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं माना जा रहा, बल्कि यह संकेत है कि अब मामला मुकदमेबाजी से आगे बढ़कर संरचित इनसॉल्वेंसी समाधान ढांचे में प्रवेश कर चुका है, जहां समयबद्ध कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई होगी।
यह पूरा विवाद उन ऋणों से जुड़ा है जो कई Videocon Group कंपनियों को विभिन्न चरणों में दिए गए थे। इन ऋणों के लिए Dhoot ने व्यक्तिगत गारंटी (personal guarantee) प्रदान की थी। वर्ष 2018 में जब समूह की कंपनियां डिफॉल्ट करने लगीं, तो SBI के नेतृत्व वाले बैंकों ने इन गारंटियों को लागू किया। लेकिन भारी-भरकम बकाया राशि की अदायगी नहीं हो सकी, जिसके बाद बैंकों ने कॉरपोरेट और व्यक्तिगत दोनों स्तरों पर कानूनी वसूली की दिशा में कदम बढ़ाए।
हालांकि Videocon Group की कंपनियों के खिलाफ कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी थी, लेकिन व्यक्तिगत गारंटर के खिलाफ कार्रवाई लंबे समय तक कानूनी चुनौतियों में उलझी रही। वर्ष 2020 में दायर याचिका में सीमा अवधि (limitation) और प्रक्रिया से जुड़े कई सवाल उठाए गए थे। लेकिन ट्रिब्यूनल ने हालिया निर्णय में स्पष्ट किया कि गारंटर की देनदारी तब सक्रिय होती है जब गारंटी लागू होने के बावजूद भुगतान नहीं किया जाता, जिससे बैंकों की स्थिति मजबूत हो गई।
इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया के औपचारिक रूप से स्वीकार होने के बाद Dhoot की संपत्तियों पर मोरेटोरियम लागू कर दिया गया है। इसके तहत वे किसी भी संपत्ति की बिक्री, हस्तांतरण या निपटान नहीं कर सकते। साथ ही, सभी प्रकार की व्यक्तिगत वसूली कार्रवाइयों पर भी अस्थायी रोक लगा दी गई है, जिससे पूरा मामला अब एक केंद्रीकृत कानूनी ढांचे के तहत आ गया है।
Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) की धारा 102 के तहत जारी नोटिस में सभी लेनदारों से निर्धारित समयसीमा के भीतर अपने दावे प्रस्तुत करने को कहा गया है। इन दावों के सत्यापन के बाद एक विस्तृत समाधान योजना तैयार की जाएगी, जिसमें संपत्तियों का मूल्यांकन, पुनर्गठन या समझौता आधारित निपटान जैसे विकल्प शामिल हो सकते हैं। पूरी प्रक्रिया की निगरानी एक नियुक्त रेज़ोल्यूशन प्रोफेशनल द्वारा की जाएगी।
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₹61,000 करोड़ से अधिक का यह मामला भारत के इतिहास में व्यक्तिगत गारंटी आधारित सबसे बड़े इनसॉल्वेंसी मामलों में से एक माना जा रहा है। यह एक्सपोजर लंबे समय तक Videocon Group को दिए गए ऋणों से उत्पन्न हुआ है, जिसमें बैंकों ने जोखिम सुरक्षा के रूप में व्यक्तिगत गारंटी को शामिल किया था।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भारत के इनसॉल्वेंसी ढांचे में एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है, क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि कॉरपोरेट डिफॉल्ट की स्थिति में व्यक्तिगत गारंटर भी समान रूप से उत्तरदायी हो सकते हैं। इससे पहले ऐसे मामलों में प्रवर्तन अपेक्षाकृत सीमित रहा है, लेकिन IBC के तहत अब व्यक्तिगत देनदारी को भी गंभीरता से लागू किया जा रहा है।
वसूली प्रक्रिया के इस चरण में अब लेनदारों द्वारा दावों की तीव्र प्रस्तुति और सत्यापन किया जाएगा, जिसके बाद समाधान योजना को अंतिम रूप दिया जाएगा। मोरेटोरियम का उद्देश्य सभी दावों को एकीकृत कर एक सुव्यवस्थित वसूली ढांचा तैयार करना है, जिससे अलग-अलग कानूनी कार्रवाइयों से बचा जा सके।
बैंकों के लिए यह कदम बकाया राशि की वसूली की दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है, जबकि Dhoot के लिए यह कॉरपोरेट और व्यक्तिगत देनदारियों के बीच की कानूनी सीमा के टूटने जैसा है।
आने वाले हफ्तों में इस मामले में दावों के सत्यापन और समाधान योजना तैयार करने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। हालांकि अंतिम परिणाम अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन इस इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया की शुरुआत ने ₹61,000 करोड़ के इस बहुचर्चित बैंकिंग डिफॉल्ट केस में एक निर्णायक मोड़ ला दिया है।
