वाराणसी। क्रेडिट कार्ड धारकों को निशाना बनाकर साइबर ठगी का बड़ा नेटवर्क सामने आया है। वाराणसी में पिछले तीन वर्षों के दौरान क्रेडिट कार्ड से जुड़े मामलों में साइबर ठगों ने करीब ₹1.20 करोड़ की रकम पार कर दी। इनमें से करीब 85 प्रतिशत मामलों में दो साल बीतने के बाद भी पीड़ितों को ठगी गई रकम वापस नहीं मिल सकी। कई मामलों में धोखाधड़ी का असर केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि क्रेडिट कार्ड का बिल समय पर जमा नहीं होने से पीड़ितों का CIBIL स्कोर भी प्रभावित हुआ।
साइबर क्राइम सेल के आंकड़ों के मुताबिक, अधिकांश पीड़ितों को ठगी की जानकारी उस समय हुई, जब उनके क्रेडिट कार्ड का बिल जनरेट हुआ। कई मामलों में कार्डधारकों ने उस दौरान कोई लेनदेन नहीं किया था, लेकिन बिल में ऐसी ऑनलाइन खरीदारी दर्ज थी, जिसके बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी। जांच में सामने आया कि कई ट्रांजेक्शन मूल बैंक खाते में रकम ट्रांसफर करने के बजाय ऑनलाइन थर्ड-पार्टी ऐप और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर खरीदारी के जरिए किए गए।
पुलिस के मुताबिक, साइबर ठगों का सबसे आम तरीका बीमा एक्टिवेशन के नाम पर कार्डधारकों को फोन करना था। इसके अलावा KYC अपडेट, कार्ड एक्टिवेशन, कार्ड वेरिफिकेशन और क्रेडिट लिमिट बढ़ाने का झांसा देकर भी लोगों को निशाना बनाया गया। ठग खुद को बैंक अधिकारी या कस्टमर केयर एग्जीक्यूटिव बताकर बातचीत शुरू करते हैं और कार्ड से संबंधित पहले से मौजूद जानकारी बताकर पीड़ित का भरोसा जीतने की कोशिश करते हैं।
जांच में यह भी सामने आया कि कुछ मामलों में कार्ड की डिलीवरी के कुछ घंटों के भीतर ही पीड़ितों को फोन किया गया। ठगों के पास कार्डधारक की व्यक्तिगत जानकारी होने के कारण उन्हें विश्वास दिलाना आसान हो जाता है कि फोन बैंक या कार्ड कंपनी की ओर से ही आया है। बातचीत के दौरान कार्ड एक्टिवेशन या KYC की प्रक्रिया पूरी करने के नाम पर OTP हासिल किया जाता है। इसके बाद कुछ ही समय में कार्ड से ऑनलाइन लेनदेन शुरू हो जाता है।
पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि कार्डधारकों की गोपनीय जानकारी साइबर अपराधियों तक कैसे पहुंच रही है। आशंका है कि इसके पीछे संगठित नेटवर्क हो सकता है, जिसे कार्ड डिलीवरी, ग्राहक विवरण या अन्य निजी डेटा तक पहुंच हासिल है। साइबर क्राइम इकाइयां यह भी जांच रही हैं कि अलग-अलग मामलों में इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबर, बैंकिंग विवरण, IP addresses और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के बीच कोई कनेक्शन है या नहीं।
साइबर ठगी के बाद शिकायत दर्ज कराने में देरी भी पीड़ितों के लिए बड़ी समस्या बन रही है। साइबर क्राइम सेल के अनुसार, अधिकांश शिकायतें घटना के एक से दो महीने बाद पुलिस तक पहुंचीं। इतनी देर होने पर रकम कई खातों और डिजिटल माध्यमों से आगे ट्रांसफर या खर्च हो चुकी होती है। इससे उसे रोकना और रिकवर करना मुश्किल हो जाता है।
इसके विपरीत, जिन मामलों में ठगी के तुरंत बाद शिकायत दर्ज कराई गई, उनमें रकम रोकने की संभावना अधिक रही। साइबर सेल के आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो वर्षों में ऐसे मामलों में करीब ₹11 लाख की रकम को होल्ड कराया गया। पुलिस के मुताबिक, शिकायत जितनी जल्दी मिलती है, उतनी ही जल्दी संबंधित बैंक, पेमेंट गेटवे और अन्य वित्तीय संस्थानों से संपर्क कर रकम को होल्ड या फ्रीज कराने का प्रयास किया जा सकता है।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, साइबर ठगी के बाद शुरुआती दो घंटे बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। पीड़ित को तत्काल क्रेडिट कार्ड ब्लॉक कराना चाहिए और National Cyber Crime Helpline 1930 पर शिकायत दर्ज करनी चाहिए। इसके साथ ही National Cyber Crime Reporting Portal पर भी शिकायत की जा सकती है। समय पर सूचना मिलने से ठगी की रकम को आगे के खातों या डिजिटल प्लेटफॉर्म तक पहुंचने से रोकने की संभावना बढ़ जाती है।
ठगी के बाद कई पीड़ितों ने यह सोचकर क्रेडिट कार्ड का बकाया बिल जमा नहीं किया कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद रकम वापस मिल जाएगी। लेकिन रकम की रिकवरी नहीं होने पर उनका बकाया बढ़ता गया और भुगतान में देरी का असर CIBIL स्कोर पर पड़ा। कुछ मामलों में बैंक ने कार्ड से हुए लेनदेन की जिम्मेदारी ग्राहक पर डाल दी, जिसके कारण पीड़ितों को विवादित रकम का भुगतान भी करना पड़ा।
एडीसीपी साइबर क्राइम नृपेंद्र कुमार ने लोगों से सतर्क रहने की अपील की है। उन्होंने कहा कि बैंक या अधिकृत संस्थाएं OTP, CVV या PIN साझा करने के लिए फोन नहीं करतीं। उन्होंने सलाह दी कि कस्टमर केयर के नाम से फोन आने पर घबराने के बजाय बैंक की आधिकारिक शाखा या आधिकारिक हेल्पलाइन से इसकी पुष्टि करें। संदिग्ध लिंक पर क्लिक करने से भी बचना चाहिए।
साइबर क्राइम सेल के अनुसार, क्रेडिट कार्ड धारकों को विशेष रूप से कार्ड डिलीवरी के बाद आने वाली अनजान कॉल को लेकर सावधान रहना चाहिए। कार्ड नंबर, CVV, OTP, PIN, नेट बैंकिंग पासवर्ड या अन्य authentication details किसी व्यक्ति के साथ साझा नहीं करनी चाहिए। किसी भी संदिग्ध लेनदेन का SMS या notification मिलते ही कार्ड को ब्लॉक कराकर बैंक और 1930 पर सूचना देनी चाहिए।
मामले की जांच अब केवल ठगी की रकम की रिकवरी तक सीमित नहीं है। पुलिस ग्राहक डेटा के संभावित स्रोत, कार्ड डिलीवरी प्रक्रिया और ऑनलाइन खरीदारी में इस्तेमाल किए गए खातों व प्लेटफॉर्म की भी पड़ताल कर रही है। यदि डेटा लीक या संगठित साइबर नेटवर्क की पुष्टि होती है, तो जांच का दायरा और बढ़ सकता है।
