शाहजहांपुर: उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में साइबर ठगों ने एक युवक को दिल्ली बम ब्लास्ट का आरोपी बताकर भय का ऐसा माहौल बनाया कि उसने 6.48 लाख रुपये तक गंवा दिए। ठगों ने खुद को एटीएस अधिकारी बताकर व्हाट्सऐप कॉल के जरिए धमकाया और मामले को “निपटाने” के नाम पर बार-बार पैसे वसूलते रहे। यह मामला साइबर अपराध के बदलते स्वरूप और मनोवैज्ञानिक दबाव के खतरनाक इस्तेमाल को उजागर करता है।
पीड़ित आरिफ हसन खान, जो शहर के चौक कोतवाली क्षेत्र के मोहल्ला मानूजई के निवासी हैं, ने साइबर थाने में शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत के आधार पर अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, घटना की शुरुआत 9 अप्रैल को हुई, जब आरिफ के पास एक व्हाट्सऐप कॉल आया।
कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को दिल्ली से एटीएस विभाग का अधिकारी बताया और सीधे तौर पर आरिफ को हाल ही में हुए एक बम विस्फोट का आरोपी बता दिया। इस अचानक लगे गंभीर आरोप से आरिफ घबरा गए। ठग ने स्थिति को और गंभीर बताते हुए कहा कि यदि वह तुरंत सहयोग नहीं करेंगे तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
इसके बाद आरोपी ने “मामले को रफा-दफा” करने के लिए पहले 40,000 रुपये की मांग की। डर के कारण आरिफ ने फोनपे के माध्यम से यह रकम ट्रांसफर कर दी। लेकिन यहीं पर ठगी का सिलसिला खत्म नहीं हुआ। इसके बाद अलग-अलग नंबरों से लगातार कॉल कर उनसे और पैसे मांगे जाते रहे।
जांच में सामने आया है कि 9 अप्रैल से 21 अप्रैल के बीच ठगों ने कुल मिलाकर ₹6.48 लाख रुपये अलग-अलग किश्तों में ट्रांसफर करा लिए। आरोपी चार अलग-अलग मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल कर रहे थे, जिससे उनकी पहचान करना और भी मुश्किल हो गया। हर बार नई कहानी और बढ़ते खतरे का हवाला देकर पीड़ित को मानसिक दबाव में रखा गया।
इस पूरे मामले में यह साफ है कि ठगों ने तकनीकी हैकिंग से ज्यादा मनोवैज्ञानिक रणनीति का इस्तेमाल किया। खुद को कानून प्रवर्तन एजेंसी का अधिकारी बताकर उन्होंने पीड़ित के मन में डर पैदा किया और उसी का फायदा उठाते हुए रकम ऐंठते रहे। इस तरह की ठगी को ‘डर आधारित साइबर फ्रॉड’ की श्रेणी में रखा जाता है, जो हाल के समय में तेजी से बढ़ रहा है।
FutureCrime Summit 2026: Registrations to Open Soon for India’s Biggest Cybercrime Conference
साइबर अपराध विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में ठग पहले पीड़ित को अपराध या कानूनी कार्रवाई का डर दिखाते हैं, फिर “समाधान” के नाम पर पैसे मांगते हैं। प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी Prof. Triveni Singh कहते हैं, “इस तरह के मामलों में अपराधी तकनीकी हैकिंग से ज्यादा इंसानी दिमाग को निशाना बनाते हैं। व्यक्ति को पहले इतना डरा दिया जाता है कि वह बिना सत्यापन के हर निर्देश का पालन करने लगता है। कानून प्रवर्तन एजेंसियां कभी भी व्हाट्सऐप कॉल पर पैसे नहीं मांगतीं—यह समझना बेहद जरूरी है।”
मामले की जांच के दौरान यह भी सामने आया कि पीड़ित के करीब ₹3 लाख रुपये को समय रहते होल्ड करा लिया गया है, जिससे उसके वापस मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि बाकी रकम का पता लगाने के लिए बैंक ट्रांजैक्शन और कॉल डिटेल्स का विश्लेषण किया जा रहा है।
यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब साइबर अपराध को लेकर लगातार जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। इसके बावजूद लोग ठगों के जाल में फंस रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी जांच एजेंसी द्वारा व्हाट्सऐप कॉल या निजी नंबरों से इस तरह की धमकी देना और पैसे मांगना पूरी तरह फर्जी होता है।
विशेषज्ञों ने लोगों को सलाह दी है कि किसी भी अनजान कॉल पर घबराने के बजाय पहले जानकारी की पुष्टि करें। यदि कोई खुद को अधिकारी बताकर पैसे मांगता है, तो तुरंत नजदीकी थाने या साइबर हेल्पलाइन 1930 पर संपर्क करें।
फिलहाल इस मामले में जांच जारी है और अधिकारियों को उम्मीद है कि जल्द ही आरोपियों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तार किया जाएगा। यह घटना एक बार फिर चेतावनी देती है कि डिजिटल युग में डर और लालच—दोनों ही साइबर अपराधियों के सबसे बड़े हथियार बन चुके हैं।
