रुद्रपुर: उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर जिले के रुद्रपुर में एक शिक्षिका साइबर ठगी का शिकार हो गईं, जहां जियो कस्टमर केयर अधिकारी बनकर ठगों ने उनसे ₹1.99 लाख की रकम हड़प ली। यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि कैसे छोटी सी तकनीकी समस्या का समाधान ढूंढते समय लोग बड़े साइबर जाल में फंस जाते हैं।
जानकारी के अनुसार, पीड़िता एक प्रतिष्ठित विद्यालय में शिक्षिका हैं और स्टाफ आवास में रहती हैं। उन्होंने 15 अप्रैल को अपने मोबाइल नंबर पर ₹899 का तीन महीने का रिचार्ज कराया था, जो सफल नहीं हुआ। रिचार्ज फेल होने के बाद उन्होंने समाधान के लिए गूगल पर कस्टमर केयर नंबर खोजा—यहीं से ठगों ने उन्हें अपने जाल में फंसा लिया।
बताया गया कि 18 अप्रैल की रात उन्हें एक अज्ञात व्यक्ति का फोन आया, जिसने खुद को जियो के हेड ऑफिस का अधिकारी बताया। उसने भरोसा दिलाया कि वह लंबित रिचार्ज को तुरंत ठीक कर देगा। बातचीत के दौरान आरोपी ने पीड़िता को कुछ मोबाइल सेटिंग्स बदलने के निर्देश दिए और गूगल पे ऐप खोलने को कहा।
ठग ने बेहद चालाकी से पीड़िता को विश्वास में लेकर गूगल पे का पिन दर्ज करवाया। जैसे ही उन्होंने निर्देशों का पालन किया, उनके इंडियन बैंक खाते से दो अलग-अलग ट्रांजैक्शन में पैसे कट गए—पहले ₹99,000 और फिर ₹1,00,000। इस तरह कुल ₹1.99 लाख की ठगी कुछ ही मिनटों में अंजाम दे दी गई।
घटना के तुरंत बाद पीड़िता को धोखाधड़ी का एहसास हुआ। उन्होंने बिना देर किए राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत दर्ज कराई और स्थानीय साइबर क्राइम थाने में भी लिखित तहरीर दी। फिलहाल मामले की जांच जारी है और डिजिटल ट्रांजैक्शन के जरिए आरोपियों तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है।
जांच से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस तरह के मामलों में ठग पहले भरोसा जीतते हैं और फिर तकनीकी सहायता के नाम पर पीड़ित से संवेदनशील जानकारी हासिल करते हैं। खासतौर पर गूगल सर्च के जरिए फर्जी कस्टमर केयर नंबर सामने आना एक बड़ी समस्या बन चुका है, जिसे आम लोग पहचान नहीं पाते।
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साइबर अपराध के जानकारों के अनुसार, इस तरह की ठगी में सोशल इंजीनियरिंग का इस्तेमाल किया जाता है, जहां पीड़ित को मानसिक रूप से इस तरह प्रभावित किया जाता है कि वह खुद ही अपनी गोपनीय जानकारी साझा कर देता है।
प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है, “ऐसे मामलों में अपराधी तकनीक से ज्यादा इंसानी मनोविज्ञान का इस्तेमाल करते हैं। पहले समस्या का समाधान देने का भरोसा पैदा किया जाता है, फिर धीरे-धीरे पीड़ित को ऐसी स्थिति में ले जाया जाता है जहां वह बिना सोचे-समझे अपने बैंकिंग डिटेल्स साझा कर देता है। गूगल सर्च के जरिए फर्जी नंबर दिखाना आज साइबर अपराधियों का बड़ा हथियार बन चुका है।”
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि किसी भी परिस्थिति में मोबाइल ऐप का पिन, ओटीपी या स्क्रीन शेयरिंग की अनुमति किसी अज्ञात व्यक्ति को नहीं देनी चाहिए। “बैंक या टेलीकॉम कंपनियां कभी भी कॉल पर ऐसी जानकारी नहीं मांगतीं,” उन्होंने स्पष्ट किया।
यह घटना एक बड़े खतरे की ओर इशारा करती है, जहां डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन सेवाओं के बढ़ते इस्तेमाल के साथ साइबर ठग भी अपनी तकनीकें लगातार अपडेट कर रहे हैं। खासतौर पर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में ऐसे मामलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जहां डिजिटल जागरूकता अभी भी सीमित है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए केवल कानून प्रवर्तन ही नहीं, बल्कि आम लोगों में जागरूकता बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है। उपयोगकर्ताओं को चाहिए कि वे केवल आधिकारिक वेबसाइट या ऐप से ही कस्टमर केयर नंबर लें और किसी भी अनजान कॉल या लिंक पर भरोसा करने से पहले सत्यापन जरूर करें।
फिलहाल इस मामले में जांच जारी है और उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही आरोपियों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तार किया जाएगा। वहीं, यह घटना आम लोगों के लिए एक चेतावनी है कि डिजिटल दुनिया में छोटी सी लापरवाही भी भारी आर्थिक नुकसान में बदल सकती है।
