भोपाल: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने वर्ष 1998 में सांवेर जनपद पंचायत में हुई शिक्षक कर्मी ग्रेड-III भर्ती से जुड़े कथित घोटाले में आठ लोगों की दोषसिद्धि और सजा रद्द कर दी है। अदालत ने कहा कि अभियोजन का मामला महत्वपूर्ण कड़ियों के अभाव, प्रमुख गवाहों के मुकरने और कमजोर दस्तावेजी साक्ष्यों से घिरा हुआ था। इन परिस्थितियों ने अभियोजन की पूरी कहानी को संदेहास्पद बना दिया और आरोपियों को भ्रष्टाचार के आपराधिक मामले में दोषी ठहराना कानूनी रूप से उचित नहीं था।
न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई ने आपराधिक अपीलों को मंजूर करते हुए प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एवं भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के विशेष न्यायाधीश की 12 अगस्त 2010 की सजा को रद्द कर दिया। निचली अदालत ने आठों आरोपियों को दो-दो वर्ष के कठोर कारावास और 10-10 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। जुर्माना नहीं देने पर छह महीने का अतिरिक्त कठोर कारावास भुगतने का आदेश भी दिया गया था।
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यह मामला 1998 में सांवेर जनपद पंचायत में 207 शिक्षक कर्मी ग्रेड-III पदों पर हुई भर्ती से जुड़ा था। भर्ती के लिए 2,539 आवेदन आए थे, जबकि 1,796 उम्मीदवारों ने 27 जून से 18 जुलाई 1998 के बीच आयोजित साक्षात्कार में हिस्सा लिया। इसके बाद 207 उम्मीदवारों का चयन किया गया।
बाद में लोकायुक्त की विशेष पुलिस स्थापना को भर्ती प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की शिकायत मिली। अभियोजन ने आरोप लगाया कि चयन समिति के कुछ सदस्यों ने अपने रिश्तेदारों को साक्षात्कार में अधिकतम अंक दिए। आरोप यह भी था कि समिति के अन्य सदस्यों के साथ तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी और ब्लॉक शिक्षा अधिकारी ने कथित अनियमितताओं में सहयोग किया।
हालांकि हाईकोर्ट ने पाया कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान लगभग सभी प्रमुख शिकायतकर्ता और उम्मीदवार अपने पूर्व कथनों से मुकर गए। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ताओं ने शिकायत करने से इनकार किया या बयान दिया कि लोकायुक्त पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर उनके हस्ताक्षर लिए गए थे। कोर्ट के अनुसार, जब शिकायत के मूल लेखक ही उन दस्तावेजों से इनकार कर दें, तो अभियोजन के मामले की बुनियाद ही संदिग्ध हो जाती है।
प्रशासनिक गलती को आपराधिक अपराध से जोड़ना गलत
हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने आरोपियों को मुख्य रूप से इसलिए दोषी माना था क्योंकि उन्होंने चयनित उम्मीदवारों के साथ अपने रिश्तों की जानकारी घोषित नहीं की थी। लेकिन किसी रिश्तेदार को लाभ पहुंचाना और भ्रष्टाचार का आपराधिक अपराध साबित होना दो अलग-अलग बातें हैं।
अदालत ने कहा कि यदि कोई पंचायत सदस्य अपने पद का इस्तेमाल रिश्तेदार को नौकरी दिलाने के लिए करता है, तो पंचायत कानून के तहत उसके खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई या पद से हटाने की कार्रवाई हो सकती है। लेकिन इसे अपने आप भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। आपराधिक दोषसिद्धि के लिए अभियोजन को बेईमान मंशा के साथ रिश्वत मांगने या आर्थिक लाभ हासिल करने का प्रमाण देना जरूरी है। इस मामले में आरोपियों द्वारा पैसा मांगने या किसी आर्थिक लाभ को स्वीकार करने का कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया।
कोर्ट ने साक्षात्कार में दिए गए अंकों को चयन समिति के सदस्यों के व्यक्तिगत आकलन का विषय माना। अभियोजन यह भी साबित नहीं कर सका कि चयनित उम्मीदवार नौकरी के लिए अयोग्य थे या उनमें आवश्यक मेरिट नहीं थी।
फोटोकॉपी दस्तावेजों पर भी उठे सवाल
पुलिस ने आरोपियों और चयनित उम्मीदवारों के बीच पारिवारिक संबंध साबित करने के लिए मतदाता सूचियों और परिवार रजिस्टरों का इस्तेमाल किया था। हाईकोर्ट ने इन दस्तावेजों को भी कमजोर साक्ष्य माना। सुनवाई के दौरान तहसीलदार ने बताया कि पुलिस ने मूल रिकॉर्ड के बजाय केवल फोटोकॉपी दिखाई थी, इसलिए वह दस्तावेजों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं कर सके।
अदालत ने कहा कि मुख्य गवाहों के मुकरने की स्थिति में अप्रमाणित फोटोकॉपी के आधार पर दोषसिद्धि करना सुरक्षित नहीं है। कोर्ट ने अभियोजन की स्वीकृति प्रक्रिया पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि संबंधित लोक सेवकों के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति देते समय उपलब्ध साक्ष्यों पर स्वतंत्र रूप से विचार नहीं किया गया।
मुख्य कार्यपालन अधिकारी और ब्लॉक शिक्षा अधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर अदालत ने कहा कि चयन समिति के अन्य सदस्यों द्वारा स्वतंत्र रूप से दिए गए अंकों के लिए अधिकारियों पर अप्रत्यक्ष आपराधिक जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।
कोर्ट ने यह भी कहा कि समिति में शामिल स्वतंत्र विशेषज्ञों ने चयन प्रक्रिया को पारदर्शी और दबाव से मुक्त बताया था। ऐसे में पूरी समिति को भ्रष्ट गठजोड़ के रूप में पेश करने का अभियोजन का दावा टिक नहीं पाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन अपने ही स्वतंत्र गवाहों की गवाही को नजरअंदाज नहीं कर सकता।
इन सभी गंभीर खामियों और उचित संदेह के आधार पर हाईकोर्ट ने 2010 की निचली अदालत की दोषसिद्धि को कानूनी रूप से गलत माना और आठों आरोपियों को मिली सजा रद्द कर दी।
