आतंकी गतिविधियों में आधार के इस्तेमाल का डर दिखाकर की गई ठगी; केरल, कर्नाटक, गौतमबुद्ध नगर और महाराष्ट्र से गुरुग्राम तक पहुंची रकम, फर्जी गेमिंग ऐप के भुगतान नेटवर्क से जोड़े गए करीब 300 खाते

लखनऊ में ‘डिजिटल अरेस्ट’ कर 80 वर्षीय डॉक्टर से ₹1.55 करोड़ ठगे, 300 खातों में घुमाई रकम; ₹43.14 लाख बरामद

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By Roopa
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लखनऊ। राजधानी लखनऊ में साइबर ठगों ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर 80 वर्षीय महिला डॉक्टर से कथित तौर पर ₹1.55 करोड़ की ठगी कर ली। ठगों ने खुद को पुणे की आतंकवाद निरोधक दस्ता (ATS) का अधिकारी बताकर डॉक्टर को धमकाया और दावा किया कि उनके आधार नंबर का इस्तेमाल अवैध तथा आतंकी गतिविधियों में किया गया है। कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर उन्हें कथित तौर पर वीडियो कॉल के जरिए निगरानी में रखा गया और अलग-अलग खातों में रकम भेजने के लिए मजबूर किया गया। साइबर पुलिस ने चार राज्यों में फैले बैंक खातों और करीब 300 खातों वाले संदिग्ध नेटवर्क की पड़ताल के बाद ₹43.14 लाख की रकम वापस बरामद कर ली है।

हजरतगंज निवासी डॉ. जिया सुल्ताना, 80, को कथित ठगों ने पहले फोन किया। आरोपियों ने उन्हें बताया कि उनके आधार नंबर से जुड़ा मामला गंभीर है और इसका संबंध आतंकी गतिविधियों से है। इसके बाद गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर उन्हें ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रखने का दावा किया गया। साइबर पुलिस के मुताबिक, इसी दबाव के बीच डॉक्टर से कुल ₹1.55 करोड़ अलग-अलग बैंक खातों में स्थानांतरित कराए गए।

लखनऊ साइबर क्राइम पुलिस की जांच में सामने आया कि डॉक्टर से प्राप्त पूरी रकम शुरुआत में केरल, कर्नाटक, गौतमबुद्ध नगर और महाराष्ट्र के चार अलग-अलग बैंक खातों में भेजी गई थी। इसके बाद रकम को गुरुग्राम स्थित इंडसइंड बैंक के एक खाते में स्थानांतरित किया गया। वहां से धनराशि को करीब 300 अन्य बैंक खातों में बांट दिया गया।

जांचकर्ताओं के अनुसार, ठगी की रकम को सीधे किसी एक खाते में रखने के बजाय कई खातों के जरिए आगे भेजा गया। पुलिस को जांच के दौरान पता चला कि रकम का इस्तेमाल कथित फर्जी गेमिंग ऐप या वेबसाइट से जुड़े भुगतान निपटान के लिए किया गया। इस प्रक्रिया के जरिए धनराशि का लेनदेन जटिल बनाया गया, जिससे उसके वास्तविक स्रोत और अंतिम लाभार्थियों तक पहुंचना मुश्किल हो सके।

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साइबर अपराध टीम ने संबंधित बैंकों और अन्य एजेंसियों के साथ समन्वय कर संदिग्ध खातों को चिन्हित किया और उनमें मौजूद रकम को तत्काल रोकने की कार्रवाई शुरू की। इस प्रयास के परिणामस्वरूप ₹43,14,024 की रकम बरामद कर डॉक्टर को वापस कर दी गई। पुलिस का कहना है कि अब तक चिन्हित खातों में मौजूद बाकी रकम भी रोक दी गई है और अन्य खातों तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है।

जांचकर्ताओं का फोकस अब इस बात पर है कि ठगी के बाद रकम किन-किन खातों से होकर गुजरी और इन खातों को संचालित करने वाले लोग किस नेटवर्क से जुड़े थे। पुलिस संदिग्ध बैंक खातों के धारकों, धनराशि के हस्तांतरण और फर्जी गेमिंग मंच से जुड़े भुगतान की कड़ियों की जांच कर रही है। आरोपियों की पहचान और गिरफ्तारी के लिए भी लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।

मामले में साइबर क्राइम थाने में भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4), 319(2) और 351(4) तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66D के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। पुलिस के मुताबिक, जांच जारी है और ठगी की शेष रकम बरामद करने के साथ पूरे नेटवर्क का पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है।

साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के मुताबिक, ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर ठगों की ऐसी रणनीति है जिसमें भय और कानूनी कार्रवाई का दबाव बनाकर पीड़ित को लंबे समय तक मानसिक नियंत्रण में रखा जाता है। किसी भी सरकारी एजेंसी की ओर से वीडियो कॉल पर ‘डिजिटल अरेस्ट’ की कोई वैध प्रक्रिया नहीं है। ऐसे कॉल आने पर व्यक्ति को तुरंत बातचीत बंद कर संबंधित पुलिस या साइबर अपराध हेल्पलाइन से संपर्क करना चाहिए।

पुलिस ने लोगों से अपील की है कि किसी भी व्यक्ति के आधार नंबर, बैंक खाते या मोबाइल नंबर के कथित तौर पर आपराधिक गतिविधियों में इस्तेमाल होने की बात कहकर धमकाए जाने पर घबराएं नहीं। सरकारी अधिकारी बनकर वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी, पूछताछ या पैसे जमा कराने की मांग करने वाले लोगों के झांसे में न आएं। संदिग्ध कॉल की सूचना तत्काल पुलिस को देने से ठगी की रकम को दूसरे खातों में जाने से रोकने में मदद मिल सकती है।

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