लखनऊ। अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध नेटवर्क से जुड़े एक बड़े मामले में कंबोडिया कनेक्शन का खुलासा हुआ है। इस मामले में कानपुर निवासी कृष्ण कुमार लखवानी को गिरफ्तार किया गया है, जो कथित तौर पर भारतीय युवाओं को आकर्षक नौकरी का झांसा देकर कंबोडिया भेजने और वहां उन्हें साइबर ठगी के नेटवर्क में शामिल कराने का काम करता था। जांच में सामने आया है कि आरोपी संगठित साइबर गिरोह के साथ मिलकर भारत से युवकों की भर्ती करता था और उन्हें विदेश भेजकर डिजिटल ठगी के काम में लगाया जाता था।
प्रारंभिक जांच के अनुसार आरोपी बेरोजगार युवाओं को डेटा एंट्री, कस्टमर सपोर्ट और कॉल सेंटर जैसी नौकरियों का लालच देता था। बेहतर वेतन और विदेश में काम करने का सपना दिखाकर उन्हें अपने जाल में फंसाया जाता था। युवकों से विदेश भेजने के नाम पर ₹30,000 से ₹40,000 तक की रकम वसूली जाती थी। इसके बाद उन्हें दिल्ली के रास्ते अलग-अलग मार्गों से कंबोडिया भेज दिया जाता था।
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जांच में यह भी सामने आया कि कंबोडिया पहुंचने के बाद युवकों की स्थिति पूरी तरह बदल जाती थी। वहां गिरोह के सदस्य उनके पासपोर्ट और अन्य दस्तावेज अपने कब्जे में ले लेते थे और उन्हें अवैध तरीके से ठिकानों पर रोककर रखा जाता था। इसके बाद धमकी और दबाव डालकर उनसे साइबर ठगी कराई जाती थी। गिरोह खास तौर पर भारत के नागरिकों को निशाना बनाता था और फोन कॉल, मैसेज तथा ऑनलाइन माध्यमों से उन्हें ठगने की साजिश रचता था।
जांच के दौरान आरोपी के मोबाइल फोन से कई अहम इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी बरामद हुए हैं। इनमें कई वीडियो क्लिप शामिल हैं, जिनमें कृष्ण कुमार युवकों का इंटरव्यू लेते और उन्हें कंबोडिया भेजने की प्रक्रिया में शामिल दिखाई दे रहा है। इसके अलावा मोबाइल में कई भारतीय युवकों के पासपोर्ट की तस्वीरें भी मिली हैं। जांच में माना जा रहा है कि इन पासपोर्ट का इस्तेमाल विदेश भेजे गए युवकों की पहचान और यात्रा से जुड़ी व्यवस्थाओं के लिए किया जाता था।
प्रारंभिक जांच से यह भी संकेत मिला है कि गिरोह सुनियोजित तरीके से सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का उपयोग कर बेरोजगार युवाओं तक पहुंचता था। नौकरी के नाम पर उनसे संपर्क किया जाता था और उन्हें बताया जाता था कि विदेश में कॉल सेंटर या कस्टमर सपोर्ट की अच्छी नौकरी उपलब्ध है। आकर्षक वेतन, रहने-खाने की सुविधा और बेहतर भविष्य का भरोसा दिलाकर युवकों को विश्वास में लिया जाता था।
हालांकि कंबोडिया पहुंचने के बाद उन्हें पता चलता था कि नौकरी के नाम पर उन्हें साइबर ठगी के कॉल सेंटर में काम करने के लिए लाया गया है। कई मामलों में विरोध करने पर युवकों को धमकाया जाता था और जबरन काम कराया जाता था। इस दौरान उन्हें फोन कॉल और ऑनलाइन माध्यमों से लोगों को ठगने के तरीके भी सिखाए जाते थे।
साइबर अपराध से जुड़े जानकारों का कहना है कि दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ देशों में पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई नेटवर्क सक्रिय हुए हैं, जहां भारतीय समेत विभिन्न देशों के युवाओं को फर्जी नौकरी के नाम पर बुलाकर साइबर अपराध में झोंक दिया जाता है। इन नेटवर्क का संचालन संगठित तरीके से किया जाता है और कई देशों में फैले एजेंट इसके लिए काम करते हैं।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, “साइबर अपराधी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित नेटवर्क बनाकर काम कर रहे हैं। वे बेरोजगार युवाओं को आकर्षक नौकरी का लालच देकर विदेश ले जाते हैं और वहां सोशल इंजीनियरिंग आधारित ठगी—जैसे डिजिटल अरेस्ट, फर्जी कॉल या निवेश ठगी—करवाते हैं। युवाओं को ऐसे ऑफर स्वीकार करने से पहले पूरी तरह जांच-पड़ताल करनी चाहिए।”
जांच में यह भी पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि अब तक कितने युवकों को इस नेटवर्क के माध्यम से विदेश भेजा गया और उनसे कितनी साइबर ठगी कराई गई। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर आरोपी के संपर्कों और वित्तीय लेन-देन की भी जांच की जा रही है।
अधिकारियों का मानना है कि जांच आगे बढ़ने पर इस अंतरराष्ट्रीय साइबर नेटवर्क से जुड़े कई और नाम सामने आ सकते हैं। फिलहाल आरोपी से पूछताछ जारी है और उससे मिली जानकारी के आधार पर पूरे नेटवर्क की कड़ियों को जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
