‘फ्लाइंग सर्जन’ नेटवर्क का खुलासा; 50 से ज्यादा अवैध किडनी ट्रांसप्लांट, ₹2.5 करोड़ तक वसूली, 9 गिरफ्तार

अस्पताल बना अवैध ट्रांसप्लांट का अड्डा: रात के अंधेरे में चलता था ‘ऑपरेशन सिंडिकेट’

Roopa
By Roopa
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लखनऊ: उत्तर प्रदेश में अवैध अंग व्यापार के एक बड़े और संगठित नेटवर्क का सनसनीखेज खुलासा हुआ है, जिसमें किडनी ट्रांसप्लांट को लेकर चल रहे गुप्त ‘ऑपरेशन सिंडिकेट’ ने स्वास्थ्य व्यवस्था की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच एजेंसियों ने इस मामले में अब तक 9 आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जबकि कई डॉक्टर, तकनीशियन और बिचौलिए अभी भी फरार बताए जा रहे हैं। यह रैकेट कानपुर से संचालित होता था और इसके तार दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद और मेरठ तक फैले हुए थे।

जांच में सामने आया है कि इस नेटवर्क के तहत 50 से अधिक अवैध किडनी ट्रांसप्लांट किए गए। इन सर्जरी के लिए मरीजों से ₹50 लाख से लेकर ₹2.5 करोड़ तक की रकम वसूली जाती थी, जबकि डोनर्स को ₹5 लाख से ₹10 लाख तक का भुगतान किया जाता था। कई मामलों में डोनर्स को वादा की गई रकम भी पूरी नहीं दी गई, जिससे यह मामला सामने आया।

इस पूरे रैकेट का खुलासा तब हुआ जब बिहार के एक पीड़ित ने शिकायत दर्ज कराई कि उसे किडनी दान के नाम पर झांसा दिया गया और तय भुगतान नहीं किया गया। शिकायत के बाद शुरू हुई जांच ने एक ऐसे संगठित नेटवर्क का पर्दाफाश किया, जो लंबे समय से सक्रिय था और सुनियोजित तरीके से अवैध ट्रांसप्लांट को अंजाम दे रहा था।

जांच एजेंसियों के अनुसार, इस गिरोह का काम करने का तरीका बेहद गोपनीय और सुनियोजित था। इसमें शामिल डॉक्टरों को ‘फ्लाइंग सर्जन’ कहा जाता था, जो अलग-अलग शहरों से रात के समय चुपचाप अस्पताल पहुंचते थे। ऑपरेशन आमतौर पर रात 3 बजे से 4 बजे के बीच किए जाते थे और सुबह होने से पहले सभी लोग वहां से निकल जाते थे, ताकि किसी को भनक न लगे।

कानपुर स्थित एक निजी अस्पताल इस नेटवर्क का मुख्य केंद्र था। आरोप है कि ऑपरेशन से पहले अस्पताल के सीसीटीवी कैमरे बंद कर दिए जाते थे और अधिकांश स्टाफ को छुट्टी पर भेज दिया जाता था या ऑपरेशन थिएटर से दूर रखा जाता था। अस्पताल के प्रवेश और निकास का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता था, जिससे गतिविधियों का कोई आधिकारिक ट्रेस नहीं बन पाता था।

जांच के दौरान आसपास के इलाकों के सीसीटीवी फुटेज में देर रात एंबुलेंस और अन्य वाहनों की संदिग्ध आवाजाही दर्ज हुई है। इसके अलावा, आरोपियों के मोबाइल फोन से टेलीग्राम चैट, ऑडियो मैसेज और वीडियो क्लिप बरामद किए गए हैं, जिनसे इस रैकेट के संचालन के पुख्ता सबूत मिले हैं। इन डिजिटल साक्ष्यों से यह भी पता चला कि डोनर्स और मरीजों को जोड़ने के लिए बिचौलियों का एक मजबूत नेटवर्क सक्रिय था।

इस नेटवर्क में डॉक्टरों के अलावा लैब तकनीशियन, ड्राइवर, अस्पताल प्रबंधन से जुड़े लोग और अन्य सहयोगी भी शामिल थे। बिचौलिए डोनर्स और मरीजों को तैयार करते थे, जबकि अस्पताल प्रबंधन ऑपरेशन की पूरी व्यवस्था करता था। कुछ आरोपी अस्पताल मालिक और प्रशासनिक पदों पर थे, जो इस अवैध गतिविधि को संरक्षण दे रहे थे।

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जांच में यह भी सामने आया कि ऑपरेशन के बाद मरीजों को अन्य अस्पतालों में शिफ्ट कर दिया जाता था, जहां या तो कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता था या दस्तावेजों में हेरफेर किया जाता था। इससे पूरे ट्रांसप्लांट की ट्रेसबिलिटी लगभग खत्म हो जाती थी और जांच एजेंसियों के लिए साक्ष्य जुटाना मुश्किल हो जाता था।

अधिकारियों का कहना है कि यह केवल एक स्थानीय मामला नहीं, बल्कि एक संगठित ‘ब्लैक मार्केट नेटवर्क’ है, जिसमें शामिल डॉक्टर कॉन्ट्रैक्टर की तरह काम करते थे। वे अलग-अलग शहरों से आते, सर्जरी करते और तुरंत लौट जाते थे। प्रत्येक सर्जरी के लिए उन्हें ₹2 लाख से ₹3 लाख तक का भुगतान किया जाता था।

जांच टीम ने इस मामले में कई ठिकानों पर छापेमारी की है और मुख्य अस्पताल को सील कर दिया गया है। फरार आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए अलग-अलग टीमें गठित की गई हैं और उनके संभावित ठिकानों पर लगातार दबिश दी जा रही है।

स्वास्थ्य विभाग ने भी इस मामले को गंभीर मानते हुए शामिल डॉक्टरों की योग्यता और लाइसेंस की जांच शुरू कर दी है। यदि अयोग्य व्यक्तियों द्वारा सर्जरी किए जाने की पुष्टि होती है, तो यह मामला और अधिक गंभीर हो सकता है।

फिलहाल जांच जारी है और एजेंसियां इस नेटवर्क के वित्तीय लेनदेन, जुड़े अस्पतालों और अन्य कड़ियों को खंगाल रही हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में इस रैकेट से जुड़े और बड़े खुलासे हो सकते हैं, जिससे पूरे गिरोह का नेटवर्क पूरी तरह सामने आ सकेगा।

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