वडोदरा/अहमदाबाद। अहमदाबाद–धोलेरा एक्सप्रेसवे परियोजना से जुड़ा एक बड़ा भूमि घोटाला उजागर हुआ है, जिसमें Gujarat High Court ने सख्त टिप्पणी करते हुए पूरे प्रकरण को “संगठित धोखाधड़ी” करार दिया है। अदालत ने परियोजना के लिए अधिग्रहित ‘अतिरिक्त जमीन’ को रद्द कर दिया और मामले में उच्चस्तरीय जांच के निर्देश जारी किए हैं। इस फैसले ने भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया, प्रशासनिक पारदर्शिता और सार्वजनिक धन के उपयोग पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश Sunita Agarwal और न्यायमूर्ति डी.एन. रे की खंडपीठ ने की। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि जमीन मालिकों और National Highways Authority of India (NHAI) तथा कलेक्टर कार्यालय के कुछ अधिकारियों के बीच मिलीभगत के संकेत मिले हैं, जिसके जरिए सार्वजनिक धन को योजनाबद्ध तरीके से siphon किया गया।
यह विवाद तब सामने आया जब कुछ निजी खरीदारों ने अदालत में याचिका दाखिल कर ‘अतिरिक्त जमीन’ के लिए मुआवजा जारी करने की मांग की। दूसरी ओर NHAI ने खुद अदालत का रुख करते हुए दावा किया कि यह पूरा मामला एक समन्वित धोखाधड़ी है, जिसमें जमीन के रिकॉर्ड, उपयोग और मूल्यांकन में जानबूझकर हेरफेर किया गया।
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जांच के दौरान कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। अदालत ने नोट किया कि जमीन से जुड़े नक्शों में बदलाव (flipped mapping) किए गए, कृषि भूमि को असामान्य तेजी से गैर-कृषि (NA) श्रेणी में परिवर्तित किया गया और कुछ ही दिनों के भीतर जमीन की खरीद-फरोख्त पूरी कर ली गई। अदालत के अनुसार, यह सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा था, जिसके जरिए अधिक मुआवजा प्राप्त करने की जमीन तैयार की गई।
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि ‘अतिरिक्त जमीन’ का अधिग्रहण वास्तविक आवश्यकता से अधिक दिखाया गया। इसका उद्देश्य कथित तौर पर मुआवजे की राशि बढ़ाना था। इस प्रक्रिया में जमीन मालिकों और संबंधित अधिकारियों ने मिलकर ऐसी परिस्थितियां बनाई, जिससे सरकारी खजाने पर अनावश्यक वित्तीय बोझ डाला जा सके और उस राशि का दुरुपयोग किया जा सके।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि इस प्रकार की गतिविधियां न केवल वित्तीय नुकसान पहुंचाती हैं, बल्कि शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता को भी कमजोर करती हैं। सार्वजनिक परियोजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखना अनिवार्य है, और इस तरह की अनियमितताओं को किसी भी स्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसी को ध्यान में रखते हुए अदालत ने NHAI के चेयरमैन को निर्देश दिया है कि वे पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच शुरू करें। साथ ही, इसमें शामिल अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर उनके खिलाफ आवश्यक कार्रवाई की जाए। अदालत ने संकेत दिया कि इस मामले में केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित मिलीभगत की संभावना भी नजर आती है।
इस फैसले का एक व्यापक प्रभाव भी माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय देशभर में चल रही बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण साबित हो सकता है। इससे यह स्पष्ट संदेश जाता है कि भूमि अधिग्रहण जैसी संवेदनशील प्रक्रियाओं में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
मामला अब विस्तृत जांच के चरण में प्रवेश कर चुका है, जहां भूमि सौदों, प्रशासनिक अनुमोदनों और वित्तीय लेनदेन की गहराई से पड़ताल की जाएगी। यह भी देखा जाएगा कि किन-किन स्तरों पर नियमों को दरकिनार किया गया और इस कथित ‘संगठित धोखाधड़ी’ में कौन-कौन शामिल थे।
गुजरात हाईकोर्ट का यह सख्त रुख एक स्पष्ट संकेत है कि न्यायपालिका सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों में पूरी गंभीरता से हस्तक्षेप करने को तैयार है। साथ ही, यह उन सभी परियोजनाओं के लिए चेतावनी है, जहां विकास के नाम पर नियमों की अनदेखी कर निजी लाभ हासिल करने की कोशिश की जाती है। आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है, जो पूरे प्रकरण की सच्चाई को सामने ला सकते हैं।
