हैदराबाद। आंध्र प्रदेश के चर्चित शराब घोटाले में अब कॉरपोरेट फ्रॉड की परतें भी खुलने लगी हैं। Serious Fraud Investigation Office (SFIO) ने इस मामले से जुड़ी कई कंपनियों के खिलाफ जांच शुरू कर दी है, जिससे यह केस अब केवल आपराधिक या वित्तीय गड़बड़ी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कंपनी कानून के गंभीर उल्लंघनों तक पहुंच गया है। पहले से इस मामले की जांच Enforcement Directorate (ED) और राज्य स्तर की एजेंसियों द्वारा की जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, जांच का फोकस उन कंपनियों पर है जिन्हें कथित तौर पर एक संगठित शराब सिंडिकेट द्वारा नियंत्रित किया जा रहा था और जिन्हें असामान्य रूप से बड़े बिजनेस ऑर्डर दिए गए। इन कंपनियों के जरिए भारी रकम के लेनदेन, फंड डायवर्जन और कमीशन तंत्र संचालित होने की आशंका जताई गई है।
जांच में सामने आया है कि Adan Distilleries (ADPL) नामक कंपनी, जो कसिचयनुला श्रीनिवास और मुप्पिडी अनिरुद्ध रेड्डी से जुड़ी बताई जा रही है, ने बिना किसी खुद के उत्पादन ढांचे के ही मई 2020 से दिसंबर 2022 के बीच करीब ₹732 करोड़ का कारोबार किया। आरोप है कि यह कंपनी किराए पर उत्पादन सुविधाएं लेकर काम कर रही थी और इसे कथित तौर पर सिंडिकेट के निर्देश पर स्थापित किया गया था। ED के मुताबिक, इस कंपनी के जरिए लगभग ₹135 करोड़ तक की कथित कमीशन राशि दी गई, जिससे इसे एक “शेल एंटिटी” के रूप में इस्तेमाल किए जाने का शक मजबूत होता है।
FCRF Launches India’s Premier Certified Data Protection Officer Program Aligned with DPDP Act
इसी तरह Leela Distilleries (LDPL) का नाम भी जांच में प्रमुखता से सामने आया है। पहले यह कंपनी नागलिंगम जयमुरुगन और नल्लन्नन मथप्पन के स्वामित्व में थी, लेकिन बाद में इसे कथित तौर पर सिंडिकेट ने अपने नियंत्रण में ले लिया। जांच एजेंसियों का मानना है कि इस कंपनी का इस्तेमाल 20% कमीशन मॉडल को बनाए रखने के लिए किया गया, जिसमें डमी डायरेक्टर्स और फर्जी वेंडर्स के जरिए लेनदेन को छिपाया गया।
UV Distilleries के संचालन में शामिल टीगला उपेंद्र रेड्डी, डॉ. टीगला विजेंद्र रेड्डी और बूनटी चाणक्य के नाम भी सामने आए हैं। इस कंपनी को आंध्र प्रदेश स्टेट बेवरेजेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड से बड़े ऑर्डर मिलने की बात कही जा रही है, जिसके जरिए लगभग ₹230 करोड़ का कारोबार हुआ। आरोप है कि इस दौरान फर्जी या बढ़े-चढ़े बिलों के जरिए रकम को बाहर निकाला गया।
जांच अब केवल डिस्टिलरी कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्ट कंपनियों तक भी फैल चुकी है। Sigma Supply Chain Solutions और Tekkr Exports and Imports जैसी कंपनियों को कथित तौर पर ऊंची दरों पर टेंडर दिए गए और बाद में इन्हें अन्य सिंडिकेट-नियंत्रित कंपनियों को सब-लीज कर दिया गया। इस पूरी प्रक्रिया में फंड को कई स्तरों पर घुमाने की रणनीति अपनाई गई।
इसके अलावा Arroyo Services और Ezyload Network जैसी संस्थाओं के जरिए बिना किसी वास्तविक सेवा के पैसे ट्रांसफर किए जाने के आरोप हैं। जांच एजेंसियों ने Prime Services को एक ऐसी शेल कंपनी के रूप में चिह्नित किया है, जिसने बिना किसी वास्तविक संचालन के फर्जी बिल जारी किए।
मुंबई स्थित Olwick Multiventures और Nysna Multiventures जैसी कंपनियों का भी नाम सामने आया है, जिनके जरिए कथित तौर पर पैसे की लेयरिंग की गई और बाद में इन फंड्स को सोना और बुलियन कारोबार में लगाया गया। वहीं TAG Developers पर बैकडेटेड एग्रीमेंट्स के जरिए नकदी को वैध दिखाने का आरोप है।
जांच में यह भी सामने आया है कि कथित अवैध कमाई को रियल एस्टेट और निवेश परियोजनाओं में लगाया गया। Eshanvi Infra Projects और ED Entertainment जैसी कंपनियों के जरिए आवासीय प्रोजेक्ट्स और अचल संपत्तियों में निवेश किए जाने की बात कही गई है, जो इस पूरे नेटवर्क की जटिलता को और बढ़ाता है।
कॉरपोरेट मामलों से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, SFIO अब इन कंपनियों के बेनिफिशियल ओनरशिप, डायरेक्टर्स की भूमिका, और कंपनी स्ट्रक्चर के दुरुपयोग की गहराई से जांच करेगा। खास तौर पर यह देखा जा रहा है कि कैसे कई स्तरों पर कंपनियों का जाल बिछाकर फंड को छिपाया गया और उसके स्रोत को अस्पष्ट बनाया गया।
यह मामला अब एक बड़े कॉरपोरेट-क्राइम मॉडल के रूप में उभर रहा है, जहां नीतिगत खामियों, शेल कंपनियों और जटिल वित्तीय संरचनाओं का इस्तेमाल कर कथित तौर पर सैकड़ों करोड़ रुपये का नेटवर्क तैयार किया गया। SFIO की एंट्री के बाद यह जांच और व्यापक होने की संभावना है, जिससे आने वाले दिनों में और बड़े खुलासे हो सकते हैं।
