नई दिल्ली। देश के सबसे चर्चित क्रिप्टोकरेंसी घोटालों में गिने जाने वाले लगभग ₹20,000 करोड़ के ‘गेन बिटकॉइन’ मामले में जांच ने अहम मोड़ ले लिया है। इस बहुचर्चित मामले में डार्विन लैब्स के सह-संस्थापक आयुष वार्ष्णेय को गिरफ्तार किया गया है। जांच में सामने आया है कि जिस डिजिटल ढांचे के सहारे कथित तौर पर गेन बिटकॉइन योजना संचालित की जा रही थी, उसके निर्माण और तकनीकी संचालन में डार्विन लैब्स की भूमिका महत्वपूर्ण बताई जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, आयुष वार्ष्णेय काफी समय से जांच एजेंसियों के रडार पर थे। उनके खिलाफ पहले ही लुकआउट सर्कुलर जारी किया जा चुका था। जब वह देश छोड़कर जाने की कोशिश कर रहे थे, तभी मुंबई एयरपोर्ट पर उन्हें हिरासत में लिया गया। इसके बाद पूछताछ के बाद उन्हें औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया गया।
डिजिटल ढांचे से जुड़ी भूमिका की जांच
जांच में सामने आया है कि डार्विन लैब्स प्राइवेट लिमिटेड और उसके सह-संस्थापकों की भूमिका इस पूरे कथित क्रिप्टो नेटवर्क के तकनीकी पक्ष में रही है। जांच में आयुष वार्ष्णेय के अलावा साहिल बघला और निकुंज जैन का नाम भी सामने आया है।
आरोप है कि इन लोगों ने मिलकर एमसीएपी (MCAP) नामक क्रिप्टो टोकन तैयार किया और उससे जुड़े ईआरसी-20 स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट को डिजाइन किया। यह डिजिटल ढांचा उस कथित क्रिप्टो पोंजी स्कीम के संचालन में इस्तेमाल किया गया, जिसमें निवेशकों को अत्यधिक रिटर्न का लालच दिया गया था।
जांच के दौरान यह भी जानकारी मिली है कि डार्विन लैब्स ने कई डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किए थे। इनमें जीबीमाइनर्स डॉट कॉम (GBMiners.com) नामक बिटकॉइन माइनिंग पूल प्लेटफॉर्म, बिटकॉइन पेमेंट गेटवे, कॉइन बैंक बिटकॉइन वॉलेट और गेन बिटकॉइन वेबसाइट शामिल हैं। इन्हीं प्लेटफॉर्म के जरिए निवेशकों से संपर्क किया जाता था और उन्हें निवेश के लिए प्रोत्साहित किया जाता था।
2015 में शुरू हुई थी योजना
जांच के मुताबिक, गेन बिटकॉइन योजना की शुरुआत वर्ष 2015 में हुई थी। इसे वेरिएबलटेक प्राइवेट लिमिटेड के नाम पर संचालित किया जा रहा था। इस योजना के कथित मास्टरमाइंड अमित भारद्वाज और उनके भाई अजय भारद्वाज बताए जाते हैं।
निवेशकों को बताया जाता था कि यदि वे बिटकॉइन खरीदकर इस योजना में लगाते हैं तो उन्हें 18 महीनों तक हर महीने लगभग 10 प्रतिशत तक का रिटर्न मिलेगा। इसके लिए लोगों को बाहरी एक्सचेंज से बिटकॉइन खरीदने और तथाकथित क्लाउड माइनिंग कॉन्ट्रैक्ट के जरिए उसे गेन बिटकॉइन प्लेटफॉर्म पर जमा करने के लिए कहा जाता था।
शुरुआती दौर में कई निवेशकों को बिटकॉइन में भुगतान भी किया गया, जिससे लोगों को यह योजना लाभदायक लगने लगी। इसी कारण बड़ी संख्या में लोग इसमें निवेश करने लगे।
नए निवेश से पुराने निवेशकों को भुगतान
जांच में सामने आया है कि यह पूरी योजना मल्टी-लेवल मार्केटिंग (एमएलएम) मॉडल पर आधारित थी। इसमें पुराने निवेशकों को भुगतान नए निवेशकों से आने वाली रकम से किया जाता था।
बताया जाता है कि जब तक नए निवेशकों की संख्या बढ़ती रही, तब तक भुगतान जारी रहा। लेकिन 2017 के बाद जब नए निवेशकों का प्रवाह कम होने लगा तो स्थिति बदल गई।
उस समय कंपनी ने अचानक भुगतान की प्रक्रिया में बदलाव करते हुए निवेशकों को बिटकॉइन के बजाय अपने ही बनाए क्रिप्टो टोकन एमसीएपी में भुगतान करना शुरू कर दिया। यह टोकन बाजार में बिटकॉइन की तुलना में काफी कम कीमत का था, जिससे निवेशकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
देशभर में दर्ज हुए कई मामले
इस घोटाले के सामने आने के बाद देश के कई हिस्सों में शिकायतें दर्ज हुई थीं। जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र, दिल्ली और पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में निवेशकों ने धोखाधड़ी के आरोप लगाते हुए मामले दर्ज कराए थे।
मामले की व्यापकता और अंतरराष्ट्रीय कड़ियों को देखते हुए इस पूरे प्रकरण की जांच केंद्रीय स्तर पर सौंपी गई थी। अब जांच एजेंसियां इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका, विदेशों में भेजे गए फंड और निवेशकों से जुटाई गई रकम के वास्तविक प्रवाह की पड़ताल कर रही हैं।
जांच से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस मामले में आगे भी कई अहम खुलासे हो सकते हैं और घोटाले में शामिल अन्य लोगों की भूमिका सामने आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा है।
