पंजाब के जालंधर में पुलिस ने एक दंपति को कथित तौर पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बनकर डीएसपी, इंस्पेक्टर और हेड कांस्टेबल की नौकरी दिलाने का झांसा देकर लाखों रुपये ठगने के आरोप में गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसियों के अनुसार फर्जी पहचान पत्र और नकली दस्तावेजों के जरिए लोगों को गुमराह किया गया, जबकि कथित ठगी की रकम का इस्तेमाल संपत्ति, वाहन और कारोबार में निवेश के लिए किए जाने के आरोपों की भी जांच की जा रही है।
जालंधर: पंजाब पुलिस ने एक व्यक्ति और उसकी पत्नी को कथित तौर पर भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी बनकर सरकारी नौकरी दिलाने का झांसा देकर ₹31.5 लाख की ठगी करने के आरोप में गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार आरोपियों ने लोगों को उप पुलिस अधीक्षक (DSP), इंस्पेक्टर और हेड कांस्टेबल के पदों पर भर्ती कराने का भरोसा दिलाकर बड़ी रकम वसूली। मामला फिलहाल जांच के अधीन है और आरोपों की सत्यता का अंतिम फैसला न्यायालय द्वारा किया जाएगा।
गिरफ्तार आरोपियों की पहचान अनमोल रतन और उसकी पत्नी मनदीप कौर के रूप में हुई है। पुलिस के अनुसार दोनों लंबे समय से ठिकाने और मोबाइल नंबर बदलकर गिरफ्तारी से बच रहे थे। टेक्निकल सर्विलांस और विशेष टीमों की मदद से दोनों को गिरफ्तार कर पुलिस रिमांड पर लिया गया है, जहां उनसे पूछताछ जारी है।
पुलिस के अनुसार यह मामला 17 जुलाई 2025 को शाहकोट के गांव बाउपुर बेट निवासी रवीन कौर की शिकायत के आधार पर दर्ज किया गया था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि अनमोल रतन ने स्वयं को वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बताते हुए रवीन कौर को डीएसपी, उनकी भतीजी संदीप कौर को इंस्पेक्टर तथा उनके भाई हरदीप सिंह को हेड कांस्टेबल भर्ती कराने का भरोसा दिया। इस भरोसे में परिवार ने कथित तौर पर ₹31.5 लाख का भुगतान किया, लेकिन किसी को भी नौकरी नहीं मिली।
जांचकर्ताओं के अनुसार एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपी लगातार फरार रहा और गिरफ्तारी से बचने के लिए अपने ठिकाने तथा मोबाइल नंबर बदलता रहा। जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि कथित ठगी की रकम में से ₹3 लाख आरोपी के पिता के बैंक खाते में ट्रांसफर किए गए थे। इसी वित्तीय लेनदेन के आधार पर पुलिस ने 23 जून 2026 को आरोपी के पिता को भी गिरफ्तार किया। बाद में जांच आगे बढ़ने पर 8 जुलाई को अनमोल रतन और मनदीप कौर को भी गिरफ्तार कर लिया गया।
पुलिस का दावा है कि पूछताछ के दौरान अनमोल रतन ने फर्जी IPS पहचान पत्र और अन्य नकली सरकारी दस्तावेज तैयार कर लोगों को सरकारी नौकरी दिलाने का झांसा देने की बात स्वीकार की है। जांच एजेंसियां यह भी जांच कर रही हैं कि क्या इसी तरीके से अन्य लोगों को भी कथित रूप से ठगी का शिकार बनाया गया।
जांच के दौरान पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से एक लैपटॉप, मोबाइल फोन, फर्जी पहचान पत्र और कई नकली दस्तावेज बरामद किए हैं। अधिकारियों के अनुसार जब्त डिजिटल उपकरणों और दस्तावेजों की फोरेंसिक जांच कर यह पता लगाया जा रहा है कि इस कथित धोखाधड़ी का दायरा कितना बड़ा था और क्या इसमें अन्य लोग भी शामिल थे।
वित्तीय जांच में यह भी सामने आया है कि कथित ठगी से प्राप्त धनराशि का इस्तेमाल विभिन्न निवेशों में किया गया। पुलिस के अनुसार लगभग ₹17 लाख शाहकोट स्थित एक रेडीमेड कपड़ों की दुकान में लगाए गए, जिसे आरोपी का करीबी रिश्तेदार संचालित करता है। इसके अलावा जांचकर्ताओं का आरोप है कि मारुति सियाज कार खरीदने पर ₹1.10 लाख तथा नकोदर में एक कोठी खरीदने के लिए ₹10 लाख खर्च किए गए। इन सभी वित्तीय लेनदेन की जांच जारी है।
प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि भर्ती से जुड़े संगठित धोखाधड़ी के मामलों में अपराधी अक्सर फर्जी सरकारी पहचान, नकली नियुक्ति पत्र और सरकारी संस्थानों की साख का दुरुपयोग करते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी सरकारी भर्ती प्रक्रिया की जानकारी केवल आधिकारिक अधिसूचनाओं और अधिकृत भर्ती एजेंसियों से ही सत्यापित करनी चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी वैध सरकारी नौकरी के लिए निजी भुगतान या व्यक्तिगत प्रभाव के आधार पर नियुक्ति नहीं की जाती और यदि कोई ऐसा दावा करता है तो उसकी सूचना तुरंत पुलिस को देनी चाहिए।
पुलिस ने कहा कि मामले की जांच जारी है और यह पता लगाया जा रहा है कि क्या आरोपी किसी बड़े भर्ती ठगी गिरोह का हिस्सा थे। भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। जांच में यदि अन्य पीड़ितों या आरोपियों की भूमिका सामने आती है तो कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी। मामले में लगाए गए सभी आरोप अभी जांच और न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं तथा अंतिम निर्णय अदालत द्वारा ही किया जाएगा।
