2 करोड़ से अधिक यूजर्स के संवेदनशील डेटा को लेकर संसद समिति ने जताई चिंता; स्वतंत्र ऑडिट और सुरक्षा समीक्षा की सिफारिश

डिजिटल सुविधा या जोखिम? डिजीयात्रा के बायोमेट्रिक डेटा पर जांच की मांग तेज

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By Roopa
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नई दिल्ली: देश के प्रमुख हवाई अड्डों पर यात्रियों की आवाजाही को तेज और सुगम बनाने के उद्देश्य से लागू किया गया डिजीयात्रा सिस्टम अब बायोमेट्रिक डेटा की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में आ गया है। संसद की परिवहन, पर्यटन और संस्कृति संबंधी स्थायी समिति ने इस डिजिटल प्लेटफॉर्म के तहत एकत्र किए जा रहे संवेदनशील डेटा के प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था पर गहरी चिंता व्यक्त की है।

समिति की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि डिजीयात्रा सिस्टम में इस्तेमाल हो रहे बायोमेट्रिक डेटा, खासकर चेहरे की पहचान (फेशियल रिकग्निशन) से जुड़ी जानकारी, अत्यंत संवेदनशील श्रेणी में आती है और इसके सुरक्षित उपयोग के लिए मजबूत निगरानी व्यवस्था जरूरी है। हालांकि, इतनी बड़ी मात्रा में डेटा के संग्रह और उपयोग के बावजूद अब तक किसी स्वतंत्र एजेंसी द्वारा इसका व्यापक ऑडिट नहीं कराया गया है, जिसे समिति ने एक गंभीर कमी बताया है।

रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में 2 करोड़ से अधिक यात्री डिजीयात्रा ऐप से जुड़ चुके हैं और यह सिस्टम देश के करीब 30 हवाई अड्डों पर सक्रिय रूप से उपयोग में लाया जा रहा है। इसके जरिए यात्रियों की पहचान स्वचालित रूप से की जाती है, जिससे चेक-इन और सुरक्षा जांच की प्रक्रिया तेज हो जाती है। लेकिन इसी तकनीक के साथ जुड़े डेटा सुरक्षा जोखिमों को लेकर अब सवाल और तेज हो गए हैं।

समिति ने स्पष्ट कहा है कि किसी भी डिजिटल पहचान प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सबसे अहम होती है। रिपोर्ट में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि डेटा किस तरह लिया जा रहा है, उसे कैसे स्टोर किया जा रहा है, और किस परिस्थिति में उसका उपयोग किया जा सकता है—इन सभी पहलुओं पर स्पष्ट और स्वतंत्र मूल्यांकन की कमी है।

सांसदीय समिति ने मंत्रालय को सिफारिश की है कि डिजीयात्रा सिस्टम की सुरक्षा और गोपनीयता की जांच किसी स्वतंत्र और विशेषज्ञ एजेंसी से कराई जाए। इसमें यह भी शामिल हो कि यूजर्स से डेटा लेने के लिए किस प्रकार की सहमति ली जाती है, डेटा कितने समय तक सुरक्षित रखा जाता है, और क्या किसी भी प्रकार के डेटा उल्लंघन (डेटा ब्रीच) की संभावना मौजूद है या नहीं।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि डिजीयात्रा का अब तक 8.6 करोड़ से अधिक बार उपयोग किया जा चुका है। यह आंकड़ा इस तकनीक की लोकप्रियता और व्यापक उपयोग को दर्शाता है, लेकिन साथ ही यह भी संकेत देता है कि इतने बड़े स्तर पर संवेदनशील डेटा का प्रबंधन एक बड़ा सुरक्षा चुनौती बन सकता है।

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समिति ने यह भी सवाल उठाया है कि इस सिस्टम के लागू होने के बाद यात्रियों के प्रोसेसिंग समय में वास्तव में कितनी कमी आई है। हालांकि डिजीयात्रा को तेज और सहज यात्रा अनुभव देने के लिए विकसित किया गया था, लेकिन इसके वास्तविक प्रभाव को लेकर ठोस और सार्वजनिक आंकड़ों की कमी महसूस की जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बायोमेट्रिक डेटा किसी भी व्यक्ति की सबसे संवेदनशील डिजिटल पहचान होती है और इसके दुरुपयोग से गंभीर परिणाम हो सकते हैं। ऐसे में किसी भी तकनीकी प्लेटफॉर्म के लिए साइबर सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन और नियमित ऑडिट अनिवार्य होना चाहिए।

इस पूरे मामले ने सरकार और संबंधित एजेंसियों के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती खड़ी कर दी है कि कैसे तकनीकी सुविधा और नागरिकों की निजता के बीच संतुलन बनाया जाए। डिजीयात्रा जैसे सिस्टम भविष्य की यात्रा व्यवस्था का हिस्सा बन सकते हैं, लेकिन इसके लिए मजबूत सुरक्षा ढांचे और पारदर्शी नीतियों की आवश्यकता होगी।

फिलहाल संसद समिति की सिफारिशों के बाद यह उम्मीद की जा रही है कि सरकार इस मामले में जल्द ही स्वतंत्र जांच और सुरक्षा ऑडिट की दिशा में कदम उठा सकती है। यदि ऐसा होता है तो न केवल सिस्टम की विश्वसनीयता बढ़ेगी, बल्कि यात्रियों का भरोसा भी मजबूत होगा।

आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि डिजीयात्रा सिस्टम को लेकर उठे ये सवाल किस तरह हल किए जाते हैं और क्या यह तकनीक वास्तव में सुरक्षित डिजिटल यात्रा अनुभव का भरोसेमंद मॉडल बन पाती है या नहीं।

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