₹857 करोड़ की ‘सेफ सिटी’ परियोजना के तहत कैमरों को कई सरकारी डाटाबेस से जोड़ा जा रहा; चेहरे और वाहन नंबर प्लेट की पहचान के साथ संदिग्धों तक तेजी से पहुंचने में मिलेगी मदद

दिल्ली का एआई निगरानी तंत्र कैमरों से लाखों चेहरों की करेगा पहचान

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By Roopa
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नई दिल्ली। दिल्ली में तेजी से बढ़ रहे निगरानी कैमरों के नेटवर्क को कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी तंत्र से जोड़ा जा रहा है। इससे कैमरों में कैद चेहरों और वाहनों की नंबर प्लेट की पहचान कर संदिग्ध व्यक्तियों तक तेजी से पहुंचने में पुलिस को मदद मिल सकती है। यह व्यवस्था दिल्ली पुलिस की ₹857 करोड़ की ‘सेफ सिटी’ परियोजना का हिस्सा है और इसके जरिए विभिन्न सरकारी डाटाबेस को आपस में जोड़कर किसी व्यक्ति की पहचान तथा उससे संबंधित पृष्ठभूमि की जानकारी हासिल करने की क्षमता बढ़ाने की तैयारी है।

एक महीने तक चली जांच के अनुसार, परियोजना का उद्देश्य केवल राजधानी में कैमरों की संख्या बढ़ाना नहीं है। इसके तहत अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड को एक तकनीकी ढांचे में जोड़ने की योजना है, ताकि कैमरे में दिखाई देने वाले किसी व्यक्ति की पहचान होने के बाद उससे संबंधित अन्य सूचनाएं भी कम समय में सामने लाई जा सकें। जांच के दौरान कम से कम 20 पुलिस अधिकारियों, प्रौद्योगिकी सेवा प्रदाताओं और सलाहकारों से बातचीत तथा परियोजना से जुड़े आधिकारिक दस्तावेजों की समीक्षा किए जाने का दावा किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, निगरानी व्यवस्था को पुलिस क्लीयरेंस प्रमाणपत्र, आपराधिक न्याय व्यवस्था, मतदाता पहचान, वाहन पंजीकरण और ड्राइविंग लाइसेंस से जुड़े डाटाबेस से जोड़ा जा रहा है। इन डाटाबेस के एकीकरण से किसी कैमरे में कैद तस्वीर से व्यक्ति की पहचान करने और फिर उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड में उसके बारे में जानकारी तलाशने की प्रक्रिया काफी तेज हो सकती है।

अप्रैल में दिल्ली विधानसभा के बाहर हुई एक घटना में इस तकनीक की उपयोगिता सामने आने का दावा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, 37 वर्षीय एक व्यक्ति सफेद टाटा सिएरा लेकर विधानसभा के प्रवेश द्वार पर सुरक्षा बैरिकेड से टकराते हुए अंदर पहुंच गया था। वाहन से उतरने के बाद उसने विधानसभा अध्यक्ष की कार के पास जाकर गुलदस्ता रखने जैसी हरकत की और फिर वहां से फरार हो गया।

पुलिस ने कथित तौर पर दो घंटे से भी कम समय में उसे पकड़ लिया। विधानसभा से करीब चार किलोमीटर दूर एक पुलिस पिकेट पर सिएरा को रोका गया और चालक को हिरासत में ले लिया गया। रिपोर्ट के अनुसार, आरोपी और वाहन की पहचान तथा तलाश में ‘सेफ सिटी’ परियोजना से जुड़ी तकनीकी व्यवस्था ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस निगरानी ढांचे के तहत तस्वीरों, वीडियो फुटेज और व्यक्तिगत तथा जैवमितीय जानकारी का बड़ा संग्रह तैयार होने की बात सामने आई है। जांच के अनुसार, इस व्यापक तंत्र में करीब 40 लाख लोगों से संबंधित आंकड़े पहले से उपलब्ध बताए जा रहे हैं और इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है।

Proposal for Conducting Cyber Crisis Drill, Tabletop Exercise (TTEx) & CCMP Readiness Exercise

यह डाटाबेस केवल अपराधियों या संदिग्ध लोगों तक सीमित नहीं है। मतदाता पहचान पत्र रखने वाले, ड्राइविंग लाइसेंसधारी और वाहन पंजीकृत कराने वाले आम नागरिकों की जानकारी पहले से अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद है, जिसे इस निगरानी ढांचे से जोड़ा जा सकता है। किराएदारों और घरेलू कामगारों के पुलिस सत्यापन से संबंधित जानकारी भी इस व्यापक डाटा संरचना का हिस्सा बन सकती है।

पुलिस क्लीयरेंस प्रमाणपत्र या चरित्र प्रमाणपत्र के लिए आवेदन करने वाले लोगों के रिकॉर्ड भी पहचान से संबंधित जानकारी की एक अतिरिक्त परत उपलब्ध करा सकते हैं। इसी तरह देश में कहीं भी दर्ज अदालती मामलों से जुड़े रिकॉर्ड किसी व्यक्ति की पहचान और पृष्ठभूमि की जानकारी तलाशने में उपयोग किए जा सकते हैं।

इस व्यवस्था के कारण कैमरे में कैद किसी व्यक्ति या वाहन की जानकारी मौजूदा डाटाबेस से कुछ ही समय में मिलान की जा सकती है। चेहरे की पहचान तकनीक तस्वीरों का डाटाबेस में मौजूद चेहरों से मिलान करने में मदद करेगी, जबकि नंबर प्लेट पहचान प्रणाली कैमरों में दर्ज वाहनों की पहचान और उनकी आवाजाही का पता लगाने में उपयोगी हो सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार, जापान की प्रौद्योगिकी कंपनी एनईसी और गुरुग्राम स्थित अवीरोस इस तकनीकी ढांचे में प्रमुख भूमिका निभा रही हैं। एनईसी प्रणाली एकीकरण के साथ चेहरे की पहचान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डाटा विश्लेषण, साइबर सुरक्षा, दूरसंचार, नेटवर्किंग और सरकारी सूचना प्रौद्योगिकी प्रणालियों से जुड़े क्षेत्रों में काम कर रही है।

अवीरोस कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित वीडियो विश्लेषण, चेहरे की पहचान और तस्वीर के आधार पर खोज जैसी तकनीक उपलब्ध करा रही है। उसका ‘अन्वेषण’ नामक तस्वीर खोज तंत्र किसी तस्वीर के आधार पर उपलब्ध डाटाबेस में संभावित मिलान तलाशने में मदद करता है।

इस व्यवस्था के विस्तार से दिल्ली पुलिस को अपराध की जांच में लोगों और वाहनों की पहचान तेजी से करने का प्रभावी साधन मिल सकता है। हालांकि, एक साथ कई सरकारी डाटाबेस जोड़ने से व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा, डाटा तक पहुंच, उसे कितने समय तक सुरक्षित रखा जाएगा और उसके दुरुपयोग को रोकने के उपायों को लेकर भी गंभीर सवाल उठते हैं। खासकर तब, जब इस व्यवस्था में ऐसे बड़ी संख्या में आम नागरिकों की जानकारी शामिल हो सकती है, जिन पर किसी अपराध का संदेह तक नहीं है।

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