नई दिल्ली। दिल्ली पुलिस की इंटेलिजेंस फ्यूजन एंड स्ट्रैटेजिक ऑपरेशंस (आईएफएसओ) यूनिट ने पीतमपुरा इलाके में चल रहे एक बड़े अंतरराष्ट्रीय फर्जी कॉल सेंटर का पर्दाफाश किया है। आरोप है कि गिरोह के सदस्य अमेरिकी नागरिकों को उनके कंप्यूटर में वायरस आने और संघीय जांच एजेंसी एफबीआई की कार्रवाई का डर दिखाकर करोड़ों रुपये की ठगी कर रहे थे। पुलिस के मुताबिक, यह नेटवर्क अब तक ₹100 करोड़ से अधिक की धोखाधड़ी कर चुका था।
पुलिस ने 21 सितंबर को पीतमपुरा गांव के शिवाजी मार्केट स्थित एक इमारत की तीसरी और चौथी मंजिल पर छापा मारकर दो महिलाओं समेत 11 आरोपियों को गिरफ्तार किया। कार्रवाई के दौरान ₹41 लाख नकद के अलावा बड़ी संख्या में कंप्यूटर, मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद किए गए। शुरुआती जांच में सामने आया है कि आरोपी भारत में बैठकर विदेशी नागरिकों को निशाना बना रहे थे और तकनीकी सहायता के बहाने उनसे संपर्क स्थापित करते थे।
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पुलिस के अनुसार, पकड़े गए आरोपियों में जनकपुरी निवासी कंवल, आश्रम निवासी प्रशांत, पीतमपुरा निवासी चित्रा और नवनीत, उत्तम नगर निवासी रोहन, बुराड़ी निवासी सचिन, देहरादून निवासी गौरव सकलानी, कानपुर निवासी अक्षत, असम निवासी इरशाद और निगथौजम तथा अरुणाचल प्रदेश निवासी फेबो शामिल हैं। गिरोह में अलग-अलग भूमिकाओं में काम करने वाले आरोपियों से पूछताछ कर नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों और विदेशों में इसके संपर्कों का पता लगाने की कोशिश की जा रही है।
जांच में सामने आए तरीके के मुताबिक, ठगी की शुरुआत पीड़ित के कंप्यूटर पर कथित सुरक्षा चेतावनी दिखाकर की जाती थी। आरोपी किसी तरह पीड़ित के सिस्टम तक मैलवेयर पहुंचाते थे, जिसके बाद स्क्रीन पर ऐसा पॉप-अप दिखाई देता था, मानो कंप्यूटर में गंभीर सुरक्षा समस्या आ गई हो। इस चेतावनी में समस्या दूर करने के लिए एक टोल-फ्री नंबर पर संपर्क करने को कहा जाता था।
पीड़ित जब उस नंबर पर फोन करता था तो उसकी कॉल माइक्रो-सिप सॉफ्टवेयर के जरिए दिल्ली के पीतमपुरा स्थित कॉल सेंटर तक पहुंच जाती थी। वहां मौजूद कर्मचारी खुद को तकनीकी सहायता देने वाला प्रतिनिधि बताते थे। इसके बाद पीड़ित को अल्ट्राव्यूअर जैसे रिमोट-एक्सेस सॉफ्टवेयर डाउनलोड करने के लिए कहा जाता था। सॉफ्टवेयर इंस्टॉल होते ही आरोपी कथित तौर पर कंप्यूटर का दूरस्थ नियंत्रण हासिल कर लेते थे।
रिमोट एक्सेस मिलने के बाद ठगी का अगला चरण शुरू होता था। आरोपी कभी खुद को बैंक अधिकारी तो कभी एफबीआई जैसी जांच एजेंसी का अधिकारी बताते थे। पीड़ितों को बताया जाता था कि उनके कंप्यूटर या बैंक खाते में संदिग्ध गतिविधि मिली है और यदि तत्काल कार्रवाई नहीं की गई तो उनका बैंक खाता बंद हो सकता है या उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। इस तरह डर और दबाव का माहौल बनाकर पीड़ितों से बातचीत आगे बढ़ाई जाती थी।
पुलिस के मुताबिक, आरोपी कॉल के दौरान विलियम्स, रेयान, सोफी और जेनी जैसे विदेशी नामों का इस्तेमाल करते थे, ताकि अमेरिकी नागरिकों को बातचीत वास्तविक लगे। इसके बाद सिस्टम ठीक करने, बैंक खाते सुरक्षित करने या कथित जांच से बचाने के नाम पर पीड़ितों से भुगतान कराया जाता था। रकम की वसूली टार्गेट और गूगल-पे के गिफ्ट कार्ड या बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से की जाती थी।
जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि गिरोह ने किन-किन देशों के नागरिकों को निशाना बनाया, ठगी की रकम किस नेटवर्क के जरिए भारत तक पहुंचती थी और इसके पीछे कौन लोग वित्तीय तथा तकनीकी स्तर पर काम कर रहे थे। बरामद इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जांच से कॉल सेंटर के संचालन, पीड़ितों के आंकड़ों और लेनदेन से जुड़े और सुराग मिलने की उम्मीद है।
