नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर सामने आई एक प्रचार सामग्री ने वाहन मालिकों की निजी जानकारी, FASTag शेष राशि, लेनदेन इतिहास और समय सहित टोल प्लाजा से गुजरने के रिकॉर्ड की संभावित पहुंच को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह सामग्री “C-TRACE” नाम की एक कथित निजी WhatsApp आधारित सेवा से जुड़ी है।
प्रचारित तस्वीर में दावा किया गया है कि उपयोगकर्ता केवल एक त्वरित खोज के जरिए वाहन के पंजीकरण प्रमाणपत्र (RC) से मालिक की जानकारी, FASTag की शेष राशि, पूरा FASTag इतिहास और टोल प्लाजा से वाहन के गुजरने की जानकारी हासिल कर सकते हैं। सेवा को “कानूनी जांच के लिए निर्मित” बताया गया है और यह भी दावा किया गया है कि इसका उद्देश्य लीक या अनधिकृत डेटा उपलब्ध कराना नहीं है।
हालांकि, Centre for Police Technology (CPT) के शोधकर्ताओं ने इन दावों को लेकर गंभीर तकनीकी, कानूनी, निजता और राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताएं जताई हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि मामले की तत्काल जांच गृह मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के साथ NPCI, NHAI, Indian Highways Management Company Limited, FASTag जारी करने वाले बैंकों और संबंधित कानून प्रवर्तन एजेंसियों को करनी चाहिए।
सरकारी मंजूरी का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं
प्रचारित तस्वीर में किसी सरकारी विभाग का नाम, वैधानिक मंजूरी, आधिकारिक वेबसाइट, अधिकृत अनुमति संख्या, निजता नीति, शिकायत अधिकारी या FASTag जारी करने वाले बैंक अथवा परिवहन डेटा प्राधिकरण के साथ किसी सत्यापन योग्य समझौते का उल्लेख नहीं है।
हालांकि, केवल इस तस्वीर के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सेवा वास्तव में काम कर रही है या इसके पास किसी सरकारी या संस्थागत प्रतिबंधित डेटा तक पहुंच है। यह भी स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हुआ है कि तस्वीर में दिखाए गए परिणाम वास्तविक रिकॉर्ड हैं या नहीं।
क्या वाहन के लिए ‘मूवमेंट CDR’ तैयार हो सकता है?
सबसे गंभीर चिंता टोल प्लाजा से गुजरने के इतिहास तक कथित पहुंच को लेकर है। एक टोल रिकॉर्ड से यह पता चल सकता है कि कोई वाहन किसी खास समय पर किसी विशेष स्थान पर मौजूद था। यदि ऐसे कई रिकॉर्ड एक साथ उपलब्ध हों तो उनसे वाहन की आवाजाही, नियमित मार्ग, दिनचर्या और संभावित संपर्कों का पैटर्न तैयार किया जा सकता है।
इस तरह की जानकारी व्यवहार में वाहन के लिए कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) जैसी आवाजाही की प्रोफाइल तैयार कर सकती है। यदि यह जानकारी बिना वैध अधिकार के उपलब्ध कराई जाती है, तो इसका इस्तेमाल पीछा करने, जबरन वसूली, कारोबारी जासूसी, लक्षित हमले या पुलिस अधिकारियों, सरकारी कर्मचारियों और अन्य संवेदनशील व्यक्तियों की अनधिकृत निगरानी के लिए किया जा सकता है।
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FASTag डेटा तक पहुंच को लेकर सवाल
FASTag राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह व्यवस्था का हिस्सा है, जिसमें NPCI, NHAI, टोल संचालक और FASTag जारी करने वाले बैंक शामिल हैं। वाहन मालिक अपने खाते का शेष और लेनदेन विवरण अधिकृत बैंक ऐप, पोर्टल और पंजीकृत मोबाइल माध्यमों से प्राप्त कर सकते हैं। कानून के तहत अधिकृत पुलिस और अन्य एजेंसियां भी निर्धारित प्रक्रिया के जरिए संबंधित रिकॉर्ड मांग सकती हैं।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कोई अपारदर्शी निजी WhatsApp सेवा किसी दूसरे व्यक्ति की पहचान, वित्तीय जानकारी या वाहन की यात्रा का इतिहास उपलब्ध कराने के लिए स्वतः अधिकृत हो जाती है।
‘कानूनी जांच’ का दावा मंजूरी का विकल्प नहीं
किसी सेवा का खुद को “कानूनी जांच के लिए निर्मित” बताना अपने आप उसकी वैधता साबित नहीं करता। किसी वास्तविक प्रतिबंधित जांच मंच को अपनी कानूनी स्वामित्व स्थिति, सरकारी या संस्थागत मंजूरी, अधिकृत डेटा स्रोत, उपयोगकर्ता सत्यापन प्रक्रिया, डेटा उपयोग की सीमा, निगरानी व्यवस्था और सुरक्षित लेखा-परीक्षण रिकॉर्ड जैसी जानकारियां स्पष्ट करने में सक्षम होना चाहिए।
जांच एजेंसियों को यह पता लगाना होगा कि C-TRACE वास्तव में क्या है। संभावनाओं में कोई अधिकृत और नियंत्रित जांच मंच, अनधिकृत डेटा एकत्र करने वाली सेवा, चोरी या अंदरूनी पहुंच से प्राप्त प्रमाण-पत्रों का इस्तेमाल करने वाला तंत्र, अलग-अलग लीक डेटा स्रोतों को जोड़ने वाली व्यवस्था या केवल बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावे शामिल हो सकते हैं।
यदि कंप्यूटर प्रणाली या डेटाबेस तक अनधिकृत पहुंच साबित होती है, तो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धाराएं 43 और 66 प्रासंगिक हो सकती हैं। परिस्थितियों और डेटा के स्रोत के आधार पर अनधिकृत संविदात्मक खुलासा होने पर धारा 72A भी लागू हो सकती है।
CPT ने तत्काल जांच की मांग की
Centre for Police Technology के शोधकर्ताओं ने संबंधित मंत्रालयों और एजेंसियों से सेवा संचालक की पहचान करने, उसके कथित अधिकारों की पुष्टि करने और डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की मांग की है। जांच में यह पता लगाने की जरूरत है कि C-TRACE किसने बनाया, इसके सर्वर कहां हैं, उपयोगकर्ताओं का सत्यापन कैसे होता है, कौन-कौन से डेटाबेस खोजे जाते हैं, क्या खोज के लिए शुल्क लिया जाता है और अब तक कितने वाहन रिकॉर्ड तक पहुंच बनाई गई है।
WhatsApp और Meta से भी सक्षम कानूनी प्रक्रिया के तहत खाते के पंजीकरण, कारोबारी सत्यापन और पहुंच से जुड़े रिकॉर्ड सुरक्षित रखने को कहा जा सकता है।
जब तक इन सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं मिलता, नागरिकों और जांचकर्ताओं को C-TRACE को सरकारी सेवा नहीं मानना चाहिए। वाहन नंबर, निजी जानकारी या किसी तरह का भुगतान भी ऐसी सेवा के साथ साझा करने से बचना चाहिए।
मामला सिर्फ इतना नहीं है कि कोई WhatsApp बॉट कितना आधुनिक दिखाई देता है। असली सवाल यह है कि क्या किसी ने भारत के प्रतिबंधित वाहन, भुगतान और आवाजाही संबंधी डेटा तंत्र तक निजी पहुंच का रास्ता तैयार किया है—और अगर ऐसा है, तो उसे यह पहुंच किसने दी।
