ईडी के हलफनामे में चौंकाने वाले खुलासे; केमिकल से नाम मिटाकर म्यूटेशन, नकद लेन-देन और अधिकारियों तक पहुंची विवादित जमीन

बोकारो वन भूमि घोटाला: 500 करोड़ की मनी लॉन्ड्रिंग का खुलासा, फर्जी दस्तावेज और शेल कंपनियों से रचा गया पूरा खेल

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By Roopa
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रांची: झारखंड के बोकारो में सामने आए बहुचर्चित वन भूमि घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच ने बड़े पैमाने पर मनी लॉन्ड्रिंग का खुलासा किया है। 6 अप्रैल को झारखंड हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे के अनुसार, यह मामला सिर्फ जमीन हेराफेरी तक सीमित नहीं है, बल्कि 500 करोड़ रुपये से अधिक की अवैध धनराशि के लेन-देन से जुड़ा हुआ है। जांच में इस पूरे नेटवर्क का मास्टरमाइंड शैलेश कुमार सिंह को बताया गया है, जिसने कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों और शेल कंपनियों के जरिए सरकारी वन भूमि को वैध दिखाकर बेचने की साजिश रची।

ईडी के अनुसार, आरोपित सिंडिकेट ने करीब 103 एकड़ वन भूमि को “उमायूष मल्टीकॉम प्राइवेट लिमिटेड” नामक कंपनी के माध्यम से बाजार में बेचा। जमीन की कीमत 5.50 लाख रुपये प्रति डेसीमल तय की गई, जिससे अनुमानित अवैध कमाई 500 करोड़ रुपये से अधिक आंकी गई है। यह पूरा लेन-देन कागजों पर वैध दिखाने की कोशिश की गई, जबकि असल में इसमें बड़े स्तर पर काले धन का इस्तेमाल किया गया।

जांच में यह भी सामने आया है कि रजिस्ट्री दस्तावेजों में जमीन की कीमत सरकारी दर के अनुसार दिखाई गई, जबकि वास्तविक भुगतान उससे कई गुना अधिक नकद में किया गया। एक उदाहरण में बताया गया कि एक खरीदार ने 2.50 लाख रुपये की सरकारी कीमत वाली जमीन के लिए करीब 22.50 लाख रुपये चुकाए। इस तरह के मामलों से स्पष्ट होता है कि पूरे घोटाले में काले धन का व्यापक उपयोग किया गया और इसे छिपाने के लिए व्यवस्थित तरीके अपनाए गए।

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हलफनामे में सबसे चौंकाने वाला खुलासा म्यूटेशन प्रक्रिया को लेकर हुआ है। बताया गया है कि म्यूटेशन केस नंबर 1317(7)/2012-13, जो मूल रूप से डिंपल देवी के नाम था, उसमें रिकॉर्ड से उनका नाम केमिकल के जरिए मिटाकर हुसैन भाइयों का नाम दर्ज कर दिया गया। बिना किसी फील्ड वेरिफिकेशन या वन विभाग की अनुमति के महज 14 दिनों में म्यूटेशन को मंजूरी दे दी गई। जांच में यह भी संकेत मिले हैं कि संबंधित अधिकारी के खाते में रिश्वत की रकम पहुंची, जिसके बाद उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

ईडी की जांच में शेल कंपनियों के जरिए धन को इधर-उधर करने का भी खुलासा हुआ है। शैलेश कुमार सिंह ने जमीन को वैध बनाने के लिए अपने बेटे और कर्मचारियों के नाम पर कंपनी बनाई और उसमें अन्य निर्माण कंपनियों के जरिए करोड़ों रुपये ट्रांसफर किए गए। छापेमारी के दौरान 19 हस्ताक्षरित कोरे चेक भी बरामद किए गए, जो इस पूरे नेटवर्क के वित्तीय नियंत्रण की ओर इशारा करते हैं।

जांच एजेंसी ने यह भी बताया कि इस विवादित वन भूमि को कई प्रभावशाली और सेवारत वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों को भी बेचा गया। इससे यह संकेत मिलता है कि घोटाले की पहुंच सिर्फ स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें प्रभावशाली लोगों की भी कथित संलिप्तता हो सकती है।

मामले की जड़ में 1933 का एक कथित नीलामी प्रमाणपत्र पाया गया है, जिसे ईडी ने फर्जी बताया है। इस प्रमाणपत्र में जिस व्यक्ति के नाम पर जमीन खरीदी दिखायी गई, उसकी उस समय उम्र मात्र 9 वर्ष बताई गई है, जो कानूनी रूप से असंभव है। इसके अलावा, 1962 के राजस्व रिकॉर्ड में बॉलपेन से लिखावट पाई गई, जबकि उस समय सरकारी दफ्तरों में इस प्रकार के पेन का इस्तेमाल नहीं होता था। संबंधित जिला निबंधक कार्यालय ने भी पुष्टि की है कि ऐसा कोई रिकॉर्ड उनके पास मौजूद नहीं है।

यह मामला राज्य में जमीन से जुड़े भ्रष्टाचार के गहरे नेटवर्क को उजागर करता है। ईडी की जांच जारी है और आने वाले समय में इस घोटाले से जुड़े और भी नाम सामने आने की संभावना है। फिलहाल यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता और सरकारी जमीन की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

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