बिना जानकारी लोगों के नाम पर करोड़ों के ऋण लेने का आरोप; बैंक ऑफ महाराष्ट्र के 14 खातों में करीब ₹72 करोड़ का नुकसान, तीन बैंक अधिकारियों की कथित भूमिका भी जांच के घेरे में

कम CIBIL स्कोर वालों के दस्तावेज बने ठगी का हथियार, ₹700 करोड़ के फर्जीवाड़े में जेनी वर्गीस पर बड़ा एक्

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By Roopa
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तिरुवनंतपुरम। कम CIBIL स्कोर वाले लोगों के पहचान दस्तावेज हासिल कर उनकी जानकारी के बिना उनके नाम पर करोड़ों रुपये के ऋण लेने के कथित फर्जीवाड़े में बैंक ऑफ महाराष्ट्र ने मुख्य आरोपी जेनी वर्गीस को अपनी फ्रॉड सूची में शामिल कर लिया है। बैंक ने तीन अधिकारियों को भी इसी सूची में रखा है, जिन पर कथित तौर पर ऋण प्रक्रिया में मदद करने और फर्जीवाड़े को आगे बढ़ाने का आरोप है। मामले में बैंक ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और पुलिस जांच की सिफारिश की है।

जांच में सामने आया है कि कथित गिरोह ऐसे लोगों को निशाना बनाता था, जिनका CIBIL स्कोर कमजोर था। आरोप है कि इन लोगों के आधार समेत अन्य पहचान दस्तावेज हासिल करने के बाद उनकी जानकारी या सहमति के बिना उनके नाम पर ऋण मंजूर कराए जाते थे। कई लोगों को अपने नाम पर लिए गए ऋण की जानकारी तब हुई, जब बैंकों की ओर से उन्हें भुगतान या वसूली संबंधी नोटिस मिलने लगे।

कथित फर्जीवाड़े का दायरा कई बैंकों तक फैला होने की आशंका है। अब तक सामने आई जानकारी के मुताबिक विभिन्न बैंकों में इस नेटवर्क से करीब ₹700 करोड़ की अनियमितता जुड़ी हो सकती है। जांचकर्ताओं का मानना है कि दस्तावेजों का इस्तेमाल केवल एक बैंक तक सीमित नहीं था और अन्य वित्तीय संस्थानों में भी इसी तरीके से ऋण लिए जाने की संभावना की जांच की जा रही है।

एर्नाकुलम की रहने वाली जेनी वर्गीस को कथित नेटवर्क का मुख्य सूत्रधार बताया गया है। जांच के अनुसार, कोच्चि में स्थित कई राष्ट्रीयकृत बैंकों की ऋण व्यवस्था को कथित तौर पर इस फर्जीवाड़े के लिए इस्तेमाल किया गया। आरोप है कि बैंक के कुछ कर्मचारियों और अधिकारियों की भूमिका के बिना इतनी बड़ी संख्या में ऋण खातों को संचालित करना संभव नहीं था। इसी वजह से बैंक अधिकारियों की कथित भूमिका भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है।

बैंक ऑफ महाराष्ट्र को इस मामले में करीब ₹72 करोड़ के नुकसान का आकलन किया गया है। बैंक के धोखाधड़ी निगरानी समूह की जांच में 14 ऋण खातों से जुड़े लेनदेन की समीक्षा की गई। इसमें बैंक को करीब ₹72 करोड़ का नुकसान होने की बात सामने आई। इसके बाद बैंक ने जेनी वर्गीस और तीन बैंक अधिकारियों को फ्रॉड सूची में शामिल करने का निर्णय लिया।

आरोप है कि गिरोह पहले ऐसे लोगों की जानकारी जुटाता था, जिनका CIBIL स्कोर कम था। इसके बाद उनके आधार और अन्य पहचान संबंधी दस्तावेज हासिल किए जाते थे। इन दस्तावेजों के आधार पर कथित तौर पर ऋण आवेदन और अन्य कागजात तैयार किए जाते थे। ऋण मंजूर होने के बाद रकम को कथित नेटवर्क से जुड़े लोगों या संस्थाओं के नियंत्रण में पहुंचाया जाता था, जबकि जिस व्यक्ति के नाम पर ऋण लिया गया, उसे इसकी जानकारी नहीं होती थी।

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मामला तब सामने आया जब कुछ लोगों को अपने नाम पर लिए गए ऋण की जानकारी बैंक से मिले नोटिस के जरिए हुई। संबंधित लोगों ने ऋण लेने से इनकार किया। इसके बाद दस्तावेजों, ऋण खातों और लेनदेन की जांच शुरू हुई। अलग-अलग बैंकों में इसी तरह के मामलों की जानकारी सामने आने के बाद जांचकर्ताओं को संदेह हुआ कि यह किसी बड़े नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है।

बैंक ऑफ महाराष्ट्र ने अपनी आंतरिक जांच पूरी करने के बाद मामले में आगे की कार्रवाई शुरू की। बैंक के पुणे स्थित मुख्यालय की ओर से जोनल स्तर के अधिकारियों को आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए गए। बैंक ने मामले की विस्तृत जांच के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो और पुलिस की कार्रवाई की सिफारिश भी की है, ताकि कथित नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों और वित्तीय लेनदेन का पता लगाया जा सके।

तीन बैंक अधिकारियों को फ्रॉड सूची में शामिल किए जाने से ऋण मंजूरी प्रक्रिया में संभावित अंदरूनी मिलीभगत का सवाल भी उठ रहा है। हालांकि, अधिकारियों की व्यक्तिगत भूमिका, उन्होंने किन खातों में क्या कार्रवाई की और कथित फर्जीवाड़े से उन्हें कितना लाभ मिला, यह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा। फिलहाल बैंक स्तर पर उपलब्ध रिकॉर्ड और ऋण खातों से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल की जा रही है।

इस मामले ने पहचान दस्तावेजों की सुरक्षा और ऋण मंजूरी प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े किए हैं। किसी व्यक्ति के नाम पर उसकी जानकारी के बिना ऋण लिया जाना न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचा सकता है, बल्कि उसके क्रेडिट रिकॉर्ड और भविष्य में ऋण लेने की क्षमता को भी प्रभावित कर सकता है। खासतौर पर कम CIBIL स्कोर वाले लोगों के दस्तावेजों का कथित तौर पर चयनित तरीके से इस्तेमाल किए जाने से यह आशंका बढ़ी है कि अपराधियों ने कमजोर क्रेडिट प्रोफाइल वाले लोगों को जानबूझकर निशाना बनाया।

अब जांच एजेंसियों के सामने कथित नेटवर्क के पूरे दायरे का पता लगाने की चुनौती है। जांच में यह पता लगाया जाएगा कि कितने लोगों के दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया, किन बैंकों और शाखाओं से ऋण स्वीकृत हुए, रकम किन खातों में पहुंची और बैंक अधिकारियों की कथित भूमिका कितनी व्यापक थी। साथ ही ₹700 करोड़ के अनुमानित फर्जीवाड़े में वास्तविक वित्तीय नुकसान कितना हुआ, इसका भी आकलन किया जाएगा।

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