नई दिल्ली: सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग में फर्जी फॉलोअर्स और नकली एंगेजमेंट का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। ऐसे में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित फ्रॉड डिटेक्शन टूल अब ब्रांड्स और मार्केटिंग एजेंसियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा साधनों में शामिल हो गए हैं। उद्योग से जुड़े नवीनतम विश्लेषण के अनुसार, 2026 में साइबर अपराधी और फर्जी नेटवर्क केवल फॉलोअर्स खरीदने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बॉट अकाउंट, एंगेजमेंट पॉड्स और कृत्रिम इंटरैक्शन के माध्यम से प्रोफाइल की लोकप्रियता को कृत्रिम रूप से बढ़ा रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार भारत के विभिन्न शहरों में सत्यापित एक मिलियन से अधिक इन्फ्लुएंसर प्रोफाइल के ऑडिट के दौरान पाया गया कि ब्रांड्स को प्रस्तुत किए गए लगभग हर चार में से एक प्रोफाइल बुनियादी ऑडियंस ऑथेंटिसिटी जांच में असफल रहा। विश्लेषण में यह भी सामने आया कि खरीदे गए फॉलोअर्स वाले प्रोफाइल समान फॉलोअर संख्या वाले सत्यापित इन्फ्लुएंसर्स की तुलना में 60 से 80 प्रतिशत तक कम वास्तविक कन्वर्जन देते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार AI आधारित इन्फ्लुएंसर ऑडिट केवल फॉलोअर्स की संख्या नहीं देखता, बल्कि पूरे डिजिटल व्यवहार का विश्लेषण करता है। इसमें ऑडियंस का भौगोलिक वितरण, कंटेंट की भाषा और फॉलोअर्स की लोकेशन के बीच सामंजस्य, एंगेजमेंट का पैटर्न, अचानक बढ़े फॉलोअर्स, कमेंट्स की गुणवत्ता तथा संदिग्ध गतिविधियों का मूल्यांकन किया जाता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि किसी क्षेत्रीय भाषा के कंटेंट निर्माता के अधिकांश फॉलोअर्स उन देशों से हों जहां वह भाषा प्रचलित नहीं है, या किसी प्रोफाइल पर बिना किसी वायरल पोस्ट के अचानक हजारों फॉलोअर्स जुड़ जाएं, तो यह फर्जी फॉलोअर्स खरीदने का संकेत हो सकता है। इसी तरह हर पोस्ट पर लगभग समान संख्या में लाइक और कमेंट आना तथा संदर्भहीन टिप्पणियां भी संदिग्ध गतिविधि मानी जाती हैं।
विश्लेषण के अनुसार फर्जी एंगेजमेंट बढ़ाने के लिए तथाकथित “एंगेजमेंट पॉड्स” का भी उपयोग किया जा रहा है, जहां सोशल मीडिया समूहों के सदस्य एक-दूसरे की पोस्ट पर कृत्रिम रूप से लाइक और कमेंट करते हैं ताकि प्रोफाइल अधिक लोकप्रिय दिखाई दे। AI आधारित सिस्टम ऐसे पैटर्न की पहचान कर उन्हें वास्तविक ऑडियंस व्यवहार से अलग कर सकते हैं।
प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि डिजिटल अर्थव्यवस्था में भरोसा सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति बन चुका है और साइबर अपराधी अब इसी भरोसे का दुरुपयोग कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “फर्जी फॉलोअर्स केवल मार्केटिंग का मुद्दा नहीं हैं, बल्कि यह डिजिटल पहचान और ऑनलाइन विश्वसनीयता से जुड़ा साइबर जोखिम भी है। AI आधारित ऑडिटिंग, व्यवहार विश्लेषण और ऑडियंस सत्यापन भविष्य में डिजिटल फ्रॉड रोकने के प्रमुख साधन बनेंगे।”
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ब्रांड्स को केवल फॉलोअर्स की संख्या के आधार पर निर्णय लेने के बजाय ऑडियंस की प्रामाणिकता, वास्तविक एंगेजमेंट और कन्वर्जन क्षमता का मूल्यांकन करना चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार 75 से 80 प्रतिशत से कम वास्तविक ऑडियंस वाले प्रोफाइल का व्यावसायिक मूल्यांकन अतिरिक्त सावधानी के साथ किया जाना चाहिए।
Algoritha Security के एक शोधकर्ता के अनुसार AI आधारित फ्रॉड डिटेक्शन अब केवल सोशल मीडिया विश्लेषण तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले समय में मशीन लर्निंग मॉडल डिजिटल पहचान, व्यवहारिक पैटर्न, नेटवर्क विश्लेषण और वास्तविक उपयोगकर्ता गतिविधि के आधार पर ऑनलाइन विश्वसनीयता का आकलन करेंगे। शोधकर्ता ने कहा कि जैसे-जैसे इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग प्रदर्शन-आधारित मॉडल की ओर बढ़ रही है, वैसे-वैसे सत्यापित और वास्तविक ऑडियंस वाले कंटेंट क्रिएटर्स को प्राथमिकता मिलेगी, जबकि फर्जी फॉलोअर्स और कृत्रिम एंगेजमेंट पर आधारित प्रोफाइल की पहचान पहले से कहीं अधिक तेज और सटीक तरीके से की जा सकेगी।
