Google DeepMind CEO डेमिस हसबिस ने चेतावनी दी है कि अगले 3–5 वर्षों में सुपरह्यूमन AI वास्तविकता बन सकती है।

AI से साइबर ठगी का नया खतरा: एक अपराधी प्रतिदिन 10,000 तक धोखाधड़ी कर सकेगा, विशेषज्ञ की चेतावनी

Team The420
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New Delhi: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) साइबर अपराध की दुनिया को अभूतपूर्व गति से बदल रही है और आने वाले समय में एक अकेला साइबर अपराधी प्रतिदिन 10,000 तक स्वचालित साइबर धोखाधड़ी (Scams) संचालित करने में सक्षम हो सकता है। वित्तीय अपराध विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि AI ने धोखाधड़ी को एक “औद्योगिक स्तर” के अपराध में बदल दिया है, जहां बेहद कम संसाधनों और सीमित मानव हस्तक्षेप के साथ बड़े पैमाने पर ठगी को अंजाम दिया जा सकता है।

पूर्व इजरायली वित्तीय खुफिया इकाई (FIU) की प्रमुख और Integria AI की संस्थापक डॉ. श्लोमित वैगमैन ने कहा कि AI के तेज़ विकास से वैश्विक स्तर पर वित्तीय धोखाधड़ी की “सुनामी” आने का खतरा है। उनके अनुसार, अपराधी अब AI की मदद से फर्जी पहचान, वॉयस क्लोनिंग, डीपफेक वीडियो और स्वचालित सोशल इंजीनियरिंग हमलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे पारंपरिक सुरक्षा प्रणालियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं।

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विशेषज्ञों के अनुसार, AI आधारित तकनीकों के कारण अपराधी अब हजारों संभावित पीड़ितों को एक साथ निशाना बना सकते हैं। पहले जहां साइबर ठगी में अधिक समय, संसाधन और मानव नेटवर्क की आवश्यकता होती थी, वहीं अब AI चैटबॉट, ऑटोमेटेड मैसेजिंग सिस्टम और डीपफेक तकनीक ने इस प्रक्रिया को कहीं अधिक तेज, सस्ता और प्रभावी बना दिया है।

हाल के वर्षों में AI आधारित वित्तीय धोखाधड़ी के कई बड़े मामले सामने आए हैं। इनमें यूनाइटेड किंगडम की एक ऊर्जा कंपनी से लगभग ₹2.2 करोड़ (लगभग €2,20,000) की ठगी AI वॉयस क्लोनिंग तकनीक के जरिए की गई। इसी प्रकार, हांगकांग स्थित एक बहुराष्ट्रीय कंपनी से डीपफेक वीडियो कॉन्फ्रेंस का इस्तेमाल कर लगभग ₹215 करोड़ (लगभग 25 मिलियन अमेरिकी डॉलर) की कथित वित्तीय धोखाधड़ी की गई।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस बढ़ते खतरे से निपटने के लिए केवल कानून प्रवर्तन एजेंसियों की कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। बैंकों, वित्तीय संस्थानों और नियामक एजेंसियों को AI आधारित जोखिम पहचान प्रणाली, व्यवहार विश्लेषण (Behavioural Analytics), रियल-टाइम ट्रांजैक्शन मॉनिटरिंग तथा उन्नत पहचान सत्यापन तकनीकों को अपनाना होगा ताकि संदिग्ध लेन-देन का समय रहते पता लगाया जा सके।

प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, AI ने साइबर अपराधियों को ऐसी क्षमताएं उपलब्ध करा दी हैं, जिनके जरिए वे बेहद कम समय में हजारों लोगों को व्यक्तिगत और विश्वसनीय दिखने वाले संदेश, कॉल और वीडियो भेज सकते हैं। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में वॉयस क्लोनिंग, डीपफेक वीडियो और AI-संचालित सोशल इंजीनियरिंग वित्तीय अपराधों की सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल होंगे। उनके अनुसार, केवल तकनीकी सुरक्षा पर्याप्त नहीं है, बल्कि डिजिटल जागरूकता, मजबूत पहचान सत्यापन और संदिग्ध अनुरोधों की स्वतंत्र पुष्टि भी उतनी ही आवश्यक है।

Future Crime Research Foundation ने भी चेतावनी दी है कि AI आधारित साइबर अपराधों में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अपराधी अब अत्यधिक वास्तविक दिखने वाली आवाज़, वीडियो और डिजिटल पहचान तैयार कर सकते हैं। इससे पारंपरिक सत्यापन प्रक्रियाएं कमजोर पड़ सकती हैं और सोशल इंजीनियरिंग हमलों की सफलता दर बढ़ सकती है। संस्थान ने वित्तीय संस्थानों को बहु-स्तरीय प्रमाणीकरण (Multi-Factor Authentication), AI-संचालित फ्रॉड डिटेक्शन सिस्टम और कर्मचारियों के नियमित साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण को प्राथमिकता देने की सलाह दी है।

विशेषज्ञों ने आम लोगों को भी सतर्क रहने की सलाह दी है। किसी भी फोन कॉल, वीडियो कॉल या डिजिटल संदेश के आधार पर बिना स्वतंत्र सत्यापन के धनराशि स्थानांतरित नहीं करनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति AI से तैयार आवाज़, वीडियो या पहचान का उपयोग कर तत्काल भुगतान का दबाव बनाए, तो पहले संबंधित व्यक्ति या संस्था से किसी वैकल्पिक माध्यम से पुष्टि करना आवश्यक है। साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि AI के बढ़ते उपयोग के साथ जागरूकता, तकनीकी सुरक्षा और त्वरित सत्यापन ही इस नई पीढ़ी की साइबर ठगी से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय होगा।

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