मुंबई। टाटा संस ने अपने सबसे बड़े शेयरधारक टाटा ट्रस्ट्स को बताया है कि एन चंद्रशेखरन की चेयरमैन के रूप में अगले पांच साल के लिए पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव वैध तरीके से पारित हुआ है। मामले की जानकारी रखने वाले लोगों के मुताबिक, टाटा संस ने अपने रुख के समर्थन में टाटा ट्रस्ट्स को तीन कानूनी राय भी भेजी हैं। ये राय 17 सितंबर को हुई बोर्ड बैठक में पारित प्रस्ताव से जुड़ी हैं।
टाटा संस का यह जवाब टाटा ट्रस्ट्स की ओर से बोर्ड बैठक के बाद उठाए गए सवालों के जवाब में भेजा गया है। अब टाटा ट्रस्ट्स इन जवाबों और कानूनी राय का अध्ययन करने के बाद तय कर सकता है कि चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को चुनौती देने के लिए कानूनी रास्ता अपनाया जाए या नहीं। सूत्रों के अनुसार, 17 सितंबर की बैठक के बाद से ही ट्रस्ट्स इस मामले में संभावित कानूनी कार्रवाई पर विचार कर रहा है।
दोनों पक्षों ने तैयार की कानूनी रणनीति
मामले में दोनों पक्षों की ओर से कानूनी तैयारी के संकेत मिल चुके हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पिछले सप्ताह सोशल मीडिया पर बताया था कि वह टाटा ट्रस्ट्स की ओर से चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को चुनौती देने से जुड़े मामले में शामिल हो रहे हैं। दूसरी ओर, यदि विवाद अदालत तक पहुंचता है तो टाटा संस की ओर से पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे के नेतृत्व में कानूनी टीम पैरवी कर सकती है।
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मामले से जुड़े एक व्यक्ति के मुताबिक टाटा ट्रस्ट्स फिलहाल टाटा संस के जवाब और उसके साथ भेजी गई कानूनी राय की समीक्षा कर रहा है। टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स ने इस मामले पर सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की है।
बोर्ड बैठक में मुख्य विवाद क्या था
17 सितंबर की बोर्ड बैठक में टाटा ट्रस्ट्स ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की कानूनी राय का हवाला दिया था। ट्रस्ट्स का तर्क था कि चंद्रशेखरन को तीसरा कार्यकाल देने वाले प्रस्ताव को वैध बनाने के लिए आवश्यक बहुमत का मतदान होना चाहिए था।
टाटा ट्रस्ट्स की ओर से नामित दो निदेशकों में नोएल टाटा ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया, जबकि वेणु श्रीनिवासन ने इसके पक्ष में वोट दिया। सूत्रों के अनुसार, ट्रस्ट्स ने कुछ महीने पहले जस्टिस चंद्रचूड़ से इस मुद्दे पर कानूनी राय ली थी।
इसके विपरीत, टाटा संस ने बोर्ड बैठक में वरिष्ठ अधिवक्ता सुदीप्तो सरकार की राय पेश की। उनका तर्क था कि यदि संबंधित निदेशकों या बोर्ड के स्तर पर वोट बराबर हो जाएं तो कंपनी के एसोसिएशन ऑफ आर्टिकल्स के तहत चेयरमैन को निर्णायक यानी कास्टिंग वोट देने का अधिकार हो सकता है।
17 सितंबर की बैठक की अध्यक्षता स्वतंत्र निदेशक हरीश मनवानी ने की थी। चूंकि बैठक में चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति पर विचार हो रहा था, इसलिए उन्होंने खुद को इस प्रक्रिया से अलग रखा।
तीन कानूनी राय से मजबूत किया पक्ष
टाटा संस ने अपने जवाब में सुदीप्तो सरकार की राय के अलावा सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बीएन श्रीकृष्ण और भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित की राय भी टाटा ट्रस्ट्स को भेजी है।
जस्टिस बीएन श्रीकृष्ण की राय में कहा गया कि अपनाई गई प्रक्रिया एसोसिएशन ऑफ आर्टिकल्स के अनुच्छेद 121 की भाषा और भावना के अनुरूप है। इस अनुच्छेद में बोर्ड के फैसलों के लिए मतदान, बहुमत और बराबरी की स्थिति में कास्टिंग वोट से जुड़े प्रावधान हैं।
उनके अनुसार, अनुच्छेद 121 के एक हिस्से में बोर्ड के मामलों पर निदेशकों के बहुमत से निर्णय लेने की बात है, जबकि दूसरे हिस्से में वोट बराबर होने पर चेयरमैन के कास्टिंग वोट का प्रावधान है।
अनुच्छेद 118 पर भी अलग-अलग व्याख्या
सुदीप्तो सरकार ने अनुच्छेद 118 की व्याख्या भी की है। यह प्रावधान चेयरमैन की नियुक्ति और चयन की प्रक्रिया से संबंधित है। उनकी राय के मुताबिक चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के मामले में यह प्रावधान लागू नहीं होता, क्योंकि इसका संबंध नए चेयरमैन की नियुक्ति से है।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित ने भी 17 सितंबर को पारित प्रस्ताव को वैध माना है। उनकी राय के मुताबिक अनुच्छेद 104(बी) के तहत नियुक्त निदेशकों के वोट बराबर होने की स्थिति में बैठक की अध्यक्षता कर रहे कार्यवाहक चेयरमैन के कास्टिंग वोट का इस्तेमाल किया जा सकता था। उनके अनुसार इस प्रक्रिया से अनुच्छेद 121 में निर्धारित आवश्यकता पूरी होती है।
बैठक में चंद्रशेखरन के अलावा टाटा संस के कार्यकारी निदेशक एवं मुख्य वित्तीय अधिकारी सौरभ अग्रवाल, स्वतंत्र निदेशक हरीश मनवानी और अनीता जॉर्ज मौजूद थीं। टाटा ट्रस्ट्स की ओर से नामित निदेशक नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन भी बैठक में शामिल हुए थे। अब विवाद का अगला चरण टाटा ट्रस्ट्स की कानूनी राय की समीक्षा और उसके बाद संभावित कार्रवाई पर निर्भर करेगा।
