सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी ऑनलाइन सामग्री को अपलोड होने से पहले रोकने के प्रभावी उपाय तलाशने को कहा है।

ऑनलाइन बाल यौन शोषण सामग्री पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से अपलोड होने से पहले रोकने के उपाय तलाशने को कहा

Team The420
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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी ऑनलाइन अश्लील सामग्री (सीएसईएएम) के प्रसार को गंभीर मामला बताते हुए केंद्र सरकार से ऐसी सामग्री को इंटरनेट पर अपलोड या उपलब्ध होने से पहले ही रोकने के लिए प्रभावी उपाय तलाशने को कहा है। अदालत ने कहा कि इस तरह की सामग्री के ऑनलाइन आने के बाद उसे हटाने के बजाय उसे सामने आने से रोकने की व्यवस्था पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने गुरुवार को ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस’ (जेआरसीए) की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र से इस दिशा में ठोस कदम उठाने पर विचार करने को कहा। याचिका में आरोप लगाया गया है कि बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से पहले दिए गए निर्देशों के बावजूद उनके अनुपालन की स्थिति संतोषजनक नहीं है।

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याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने 23 सितंबर 2024 को इस मामले में कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए थे। याचिका में दावा किया गया कि इन निर्देशों के करीब दो साल बाद भी उनका पूरी तरह और प्रभावी तरीके से पालन नहीं हो पाया है। याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष ऑनलाइन मंचों पर बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री की उपलब्धता और उसके प्रसार को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था की जरूरत पर जोर दिया।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से बताया गया कि इस मामले में अदालत के समक्ष हलफनामा और अब तक की गई कार्रवाई की रिपोर्ट दाखिल की जाएगी। केंद्र ने पीठ को यह भी जानकारी दी कि सीएसईएएम से संबंधित मामलों से निपटने और कार्रवाई की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार की जा रही है।

अदालत का जोर केवल आपत्तिजनक सामग्री को इंटरनेट पर आने के बाद हटाने तक सीमित रखने के बजाय उसकी रोकथाम के उपाय विकसित करने पर रहा। पीठ ने केंद्र से ऐसे तकनीकी और प्रशासनिक उपायों पर विचार करने को कहा जिनसे यह सुनिश्चित किया जा सके कि बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री ऑनलाइन अपलोड या सार्वजनिक रूप से उपलब्ध ही न हो।

सीएसईएएम से जुड़े मामलों में सबसे बड़ी चुनौती सामग्री के तेजी से प्रसार की है। एक बार किसी सामग्री के इंटरनेट पर उपलब्ध होने के बाद उसके अलग-अलग मंचों, खातों और डिजिटल माध्यमों के जरिए दोबारा प्रसारित होने की आशंका बनी रहती है। ऐसे में अदालत की टिप्पणी रोकथाम की व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता की ओर संकेत करती है।

मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से एसओपी तैयार किए जाने की जानकारी को भी महत्वपूर्ण माना गया। प्रस्तावित एसओपी के जरिए संबंधित एजेंसियों और ऑनलाइन मंचों के बीच कार्रवाई की प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट और समन्वित बनाने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, इसके अंतिम स्वरूप और लागू किए जाने की समयसीमा के बारे में अदालत के समक्ष अभी विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की जानी बाकी है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से इस मामले में उठाए गए कदमों और आगे की प्रस्तावित कार्रवाई को रिकॉर्ड पर लाने को कहा है। सरकार की ओर से दाखिल किए जाने वाले हलफनामे और कार्रवाई रिपोर्ट से यह स्पष्ट होगा कि 23 सितंबर 2024 के निर्देशों पर अब तक किस स्तर तक अमल हुआ है और ऑनलाइन सीएसईएएम के प्रसार को रोकने के लिए कौन से नए उपाय प्रस्तावित हैं।

मामले की अगली सुनवाई 15 अक्टूबर को होगी। उस दौरान अदालत केंद्र की कार्रवाई रिपोर्ट और प्रस्तावित एसओपी से संबंधित जानकारी पर विचार कर सकती है।

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