नई दिल्ली। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) अब दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत सामने आने वाली कथित धोखाधड़ी की योजनाओं पर शिकंजा कसने की तैयारी में है। एजेंसी खास तौर पर उन मामलों की जांच करेगी, जिनमें कथित मिलीभगत से समाधान प्रक्रिया को प्रभावित कर डिफॉल्ट करने वाले प्रवर्तकों या उनसे जुड़ी संस्थाओं को संपत्तियां दोबारा हासिल करने का रास्ता मिला। ऐसे मामलों में लेनदारों की ओर से स्वीकार दावों पर असामान्य रूप से बड़ी ‘हेयरकट’ यानी बकाया रकम में भारी कटौती भी जांच के दायरे में होगी।
बेंगलुरु में ईडी के विशेष निदेशकों की तीन दिवसीय उच्चस्तरीय बैठक के दौरान क्षेत्रीय कार्यालयों को संदिग्ध मामलों की पहचान कर कार्रवाई शुरू करने के निर्देश दिए गए। एजेंसी का फोकस ऐसे समाधान मामलों पर रहेगा, जो प्रथम दृष्टया संदिग्ध नजर आते हैं, लेकिन राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) से मंजूर हो चुके हैं।
ईडी ने अधिकारियों से कहा है कि समाधान प्रक्रिया में संभावित अनियमितताओं के संकेतों की पहचान की जाए। इसके साथ ही समाधान पेशेवरों से तरजीही लेनदेन, कम मूल्यांकन वाले लेनदेन, धोखाधड़ीपूर्ण लेनदेन और अनुचित रूप से महंगे लेनदेन से संबंधित आवेदनों की प्रतियां हासिल करने को कहा गया है। जरूरत पड़ने पर एनसीएलटी के समक्ष हस्तक्षेप आवेदन दाखिल करने और कथित मुख्य सूत्रधारों के खिलाफ धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत स्वतंत्र जांच शुरू करने की तैयारी है।
जांच का एक अहम हिस्सा उन मामलों से जुड़ा होगा, जिनमें दिवालिया कंपनियों की संपत्तियों या स्वामित्व को कथित तौर पर ऐसी फ्रंट संस्थाओं के पास पहुंचाया गया, जिनका संबंध पुराने प्रवर्तकों से हो सकता है। कुछ मामलों में बैंक और अन्य वित्तीय लेनदारों को उनके स्वीकृत दावों के मुकाबले 97 से 99 प्रतिशत तक की बड़ी कटौती स्वीकार करनी पड़ी। इसके बाद संबंधित कंपनियों या संपत्तियों का नियंत्रण कथित तौर पर प्रवर्तकों से जुड़ी फ्रंट संस्थाओं के हाथों में पहुंचने के आरोपों की भी जांच की जा रही है।
Proposal for Conducting Cyber Crisis Drill, Tabletop Exercise (TTEx) & CCMP Readiness Exercise
ईडी की नजर समाधान प्रक्रिया में लेनदारों की समिति के मतदान पर भी है। एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि कहीं संबंधित पक्षों ने फ्रंट संस्थाओं का इस्तेमाल कर लेनदारों की समिति में बहुमत हासिल करने या मतदान प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश तो नहीं की। अगर ऐसे मामलों में आपराधिक धन या संपत्ति के इस्तेमाल के संकेत मिलते हैं, तो पीएमएलए के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
एजेंसी आईबीसी और पीएमएलए के बीच कानूनी संबंधों की भी समीक्षा कर रही है। खास तौर पर आईबीसी की धारा 14 के तहत लागू अधिस्थगन और धारा 32ए के तहत मिलने वाली कानूनी सुरक्षा तथा पीएमएलए के तहत संपत्ति कुर्क करने की ईडी की शक्तियों के बीच संभावित टकराव का अध्ययन किया जा रहा है।
आईबीसी के तहत कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया का उद्देश्य वित्तीय संकट में फंसी कंपनियों की संपत्तियों का अधिकतम मूल्य हासिल करना और लेनदारों के हितों की रक्षा करना है। हालांकि, समाधान प्रक्रिया में कथित मिलीभगत, संपत्तियों के कम मूल्यांकन और संबंधित पक्षों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण हासिल करने जैसे मामलों में एजेंसियां यह जांच कर सकती हैं कि दिवाला प्रक्रिया का इस्तेमाल वास्तविक समाधान के बजाय संपत्ति के हस्तांतरण के लिए तो नहीं किया गया।
ईडी की इस कवायद से उन समाधान योजनाओं की दोबारा जांच का रास्ता खुल सकता है, जिनमें भारी वित्तीय कटौती के बावजूद संपत्तियां ऐसे समूहों या संस्थाओं के पास पहुंचीं, जिनके पुराने प्रवर्तकों से संबंध होने के आरोप हैं। एजेंसी अब ऐसे मामलों में आईबीसी प्रक्रिया के दस्तावेज, लेनदेन की संरचना, लेनदारों के मतदान और धन के प्रवाह को एक साथ रखकर संभावित धनशोधन की कड़ियों की जांच करेगी।
