नई दिल्ली। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) अब केवल नकली पोस्ट या ठगी के संदेश तैयार करने तक सीमित नहीं रह गई है। इसके दुरुपयोग से फर्जी समाचार वेबसाइटों का पूरा नेटवर्क चलाने, सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की निगरानी करने, हजारों नकली ऑनलाइन डेटिंग प्रोफाइल संचालित करने और साइबर हमलों के कई चरणों को स्वचालित करने के मामले सामने आए हैं। एक नई खतरा खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक दिसंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच ऐसे कई अभियान सामने आए, जिनमें एआई मॉडल का इस्तेमाल साइबर गतिविधियों, प्रभाव अभियानों, निगरानी, धोखाधड़ी और संवेदनशील जैविक अनुसंधान से जुड़े कार्यों में किया गया।
रिपोर्ट में बताया गया है कि एआई ने इन गतिविधियों की लागत और मानव श्रम दोनों को कम कर दिया है। पहले जिन कामों के लिए लेखकों, विश्लेषकों, प्रोग्रामरों और ऑपरेटरों की बड़ी टीम की जरूरत होती थी, उनमें अब इंसान केवल लक्ष्य और रणनीति तय कर रहे हैं, जबकि एआई बड़े हिस्से को खुद संभाल रहा है।
70 फर्जी वेबसाइटों से चला पूरा नेटवर्क
एक मामले में करीब 70 ऐसी फर्जी समाचार वेबसाइटें तैयार की गईं, जिन्हें अलग-अलग स्थानीय प्रकाशनों की तरह दिखाया गया। इनके साथ करीब 70 सोशल मीडिया खाते और 250 से अधिक अतिरिक्त नकली टिप्पणी खातों को जोड़ा गया था। इस नेटवर्क ने छह महाद्वीपों के दर्शकों को निशाना बनाया।
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जांच में करीब 20 भाषाओं में 8,913 लेख प्रकाशित किए जाने का पता चला। एआई की मदद से एक ही घटना की अलग-अलग वैचारिक समूहों के लिए अलग भाषा में सामग्री तैयार की जाती थी। सामान्य खबरों में राजनीतिक कोण जोड़े जाते और किसी सामग्री को दूसरे देश के दर्शकों के अनुरूप ढालते समय उसका मूल संदर्भ हटा दिया जाता था।
इन लेखों में फर्जी पत्रकारों के नाम भी इस्तेमाल किए गए, जिससे अलग-अलग संपादकीय टीमों का भ्रम पैदा हो। एआई को तय प्रारूप, शब्द सीमा, एचटीएमएल संरचना और आंतरिक लिंक के साथ सामग्री तैयार करने के निर्देश दिए जाते थे, जिससे लेख सीधे प्रकाशन प्रणाली में भेजे जा सकें।
सोशल मीडिया से तैयार हो रहा निगरानी तंत्र
एआई के दुरुपयोग का दूसरा रूप बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया निगरानी के रूप में सामने आया। एक वाणिज्यिक निगरानी अभियान में ईरान और फारस की खाड़ी क्षेत्र के उपयोगकर्ताओं की सोशल मीडिया गतिविधियों का विश्लेषण किया गया। एआई से पोस्ट करने वाले लोगों की संभावित जगह, जनसांख्यिकीय समूह और राजनीतिक रुझान का आकलन कराया गया तथा उन्हें विश्वास स्तर के साथ वर्गीकृत किया गया।
एक प्रक्रिया में करीब 25 सोशल मीडिया पोस्ट का समूह एआई को दिया जाता था। इसके आधार पर उपयोगकर्ताओं की प्रोफाइल तैयार की जाती थीं और अरबी भाषा में सरकारी रिपोर्ट जैसी खुफिया सूचनाएं तैयार की जाती थीं।
एक अन्य मामले में सैकड़ों हजारों सोशल मीडिया पोस्ट को संसाधित कर 39 विपक्षी खातों को निगरानी के लिए चुना गया। चीन से जुड़े एक अभियान में सोशल मीडिया और समाचार सामग्री को राजनीतिक संवेदनशीलता के आधार पर जांचने तथा कुछ लोगों को ‘नियंत्रण’ के लिए चिन्हित करने का प्रयास किया गया।
4,700 एआई व्यक्तित्वों ने 25 हजार लोगों से की बातचीत
ऑनलाइन डेटिंग से जुड़े मामले ने एआई आधारित ठगी के बढ़ते पैमाने को उजागर किया। एक चीन स्थित ऐप संचालक ने 20 से अधिक डेटिंग ऐप चलाए, जहां बातचीत को इंसानों के बीच होने जैसा दिखाया जाता था।
अप्रैल 2026 में दो सप्ताह के दौरान 4,700 से अधिक एआई व्यक्तित्वों ने कम से कम 25 हजार लोगों से बातचीत की। इस दौरान एआई ने करीब 23.6 लाख संदेश तैयार किए। ऐप पर करीब 75 प्रतिशत गतिविधि एआई व्यक्तित्वों की और 25 प्रतिशत वास्तविक लोगों की बताई गई।
एआई व्यक्तित्व लगातार बातचीत करते थे, जबकि वास्तविक कर्मचारी लाइव वीडियो कॉल और सोशल मीडिया पर जुड़ने जैसे कार्य संभालते थे। एआई को यह निर्देश दिया गया था कि वह खुद को स्वचालित प्रणाली के रूप में उजागर न करे और बातचीत को तय चरणों में आगे बढ़ाए।
साइबर हमलों में भी बढ़ी एआई की भूमिका
रिपोर्ट में साइबर हमलों के ऐसे उदाहरण भी सामने आए, जहां एआई का इस्तेमाल नेटवर्क की जानकारी जुटाने, फिशिंग, सिस्टम में बने रहने और डेटा चोरी जैसे कार्यों में किया गया। एक मामले में एआई आधारित प्रणाली ने यह पहचानने की कोशिश की कि किसी सुरक्षा प्रणाली ने मैलवेयर को पकड़ लिया है या नहीं। पकड़े जाने पर उसने मैलवेयर में बदलाव कर उसे दोबारा तैयार करने में मदद की।
इससे एआई की भूमिका एक सहायक से आगे बढ़कर पूरे अभियान के संचालनकर्ता तक पहुंचती दिखाई दे रही है। प्रभाव अभियानों, निगरानी और ऑनलाइन ठगी में भी यही पैटर्न सामने आया है, जहां इंसान केवल लक्ष्य तय करते हैं और एआई बड़े पैमाने पर उसे लागू करने में मदद करता है।
जैविक अनुसंधान के दुरुपयोग को लेकर भी चेतावनी
रिपोर्ट में जैविक क्षेत्र से जुड़े पांच मामलों का भी उल्लेख किया गया है। इनमें रोगजनकों, विषैले पदार्थों और अन्य जैविक क्षमताओं से संबंधित अनुसंधान शामिल था। संबंधित संस्थानों, देशों और विशिष्ट तकनीकों के नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं और यह दावा भी नहीं किया गया कि संबंधित शोधकर्ताओं का नुकसान पहुंचाने का इरादा था।
एक मामले में एआई की मदद से विषैले पेप्टाइड से जुड़ा डेटाबेस तैयार करने और उनके गुणों को बेहतर बनाने वाली प्रणाली विकसित करने का काम किया गया। शोध के संभावित चिकित्सकीय उपयोग बताए गए थे, लेकिन इसी तकनीक का इस्तेमाल हानिकारक यौगिक विकसित करने में भी किया जा सकता है।
रिपोर्ट का निष्कर्ष यह है कि फिलहाल इन मामलों को किसी आसन्न जैविक आपदा का प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन ये घटनाएं दिखाती हैं कि सक्षम एआई प्रणालियां संवेदनशील और दोहरे उपयोग वाले अनुसंधान में तेजी से उपयोगी हो रही हैं।
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि एआई अब केवल जवाब देने वाला उपकरण नहीं रह गया है। वह योजना, विश्लेषण, सामग्री निर्माण, निगरानी और संचालन जैसे कई चरणों को एक साथ संभालने की क्षमता हासिल कर रहा है। इससे भविष्य में किसी अभियान को बड़े पैमाने पर चलाने के लिए संगठन के आकार से ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो सकता है कि उसके पास कितने सक्षम एआई उपकरणों तक पहुंच है।
