मुंबई। यस बैंक और डीएचएफएल से जुड़े ₹4,733 करोड़ के कथित कर्ज घोटाले में विशेष अदालत ने इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड और आईवीएल फाइनेंस लिमिटेड की कथित भूमिका की आगे जांच कराने की केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की मांग खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि सीबीआई ऐसी नई जांच के लिए पर्याप्त सामग्री पेश नहीं कर सकी, जिससे यह साबित हो कि इंडियाबुल्स या उसके तत्कालीन प्रवर्तकों के खिलाफ आगे जांच जरूरी है।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में कहा था कि इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस या उसके पूर्व प्रवर्तकों पर रकम के सीधे तौर पर दुरुपयोग या हड़पने का आरोप नहीं है। इसी विरोधाभासी रुख को विशेष अदालत ने सीबीआई की आगे की जांच की मांग पर महत्वपूर्ण माना।
मामले की शुरुआत यस बैंक के तत्कालीन प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी राणा कपूर के खिलाफ दर्ज शिकायत से हुई थी। आरोप है कि कपूर ने अन्य आरोपियों के साथ आपराधिक साजिश रचकर ₹4,733 करोड़ की रकम का कथित तौर पर दुरुपयोग किया। शुरुआती शिकायत डीएचएफएल और 11 अन्य लोगों के खिलाफ दर्ज की गई थी। सीबीआई ने 25 जून 2020 को पहला आरोपपत्र दाखिल किया था। इसके बाद जुलाई 2021, जून 2022 और जुलाई 2022 में पूरक आरोपपत्र दाखिल किए गए।
24 अक्टूबर 2024 को दाखिल चौथे पूरक आरोपपत्र में सीबीआई ने इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड और आईवीएल फाइनेंस लिमिटेड को भी आरोपी बनाया था। हालांकि, विशेष अदालत ने उस चरण में दोनों कंपनियों के खिलाफ संज्ञान लेने से इनकार कर दिया था। सीबीआई ने इस आदेश को बंबई हाई कोर्ट में चुनौती दी, जहां मामला अभी लंबित है।
इसके बाद सीबीआई ने आगे की जांच की अनुमति मांगते हुए कहा कि रकम के कथित हस्तांतरण से जुड़े कुछ नए तथ्य सामने आए हैं। जांच एजेंसी के अनुसार, जनवरी 2017 में भारतीय रिजर्व बैंक के निरीक्षण के बाद यस बैंक का उन संस्थाओं को दिया गया कर्ज जांच के दायरे में आया, जिनका संबंध रियल एस्टेट कारोबारी संजय छाबरिया से बताया गया था।
Proposal for Conducting Cyber Crisis Drill, Tabletop Exercise (TTEx) & CCMP Readiness Exercise
सीबीआई का आरोप था कि इंडियाबुल्स द्वारा मंजूर कुछ कर्ज का इस्तेमाल यस बैंक के कर्ज खाते को बंद करने या उसमें समायोजन के लिए किया गया। एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया कि ₹19.3 करोड़ की रकम आईवीएल फाइनेंस को भेजी गई, जिसे इंडियाबुल्स की संबद्ध कंपनी बताया गया।
सीबीआई ने आगे दावा किया कि बाद की जांच में यस बैंक और इंडियाबुल्स समूह से जुड़ी संस्थाओं के बीच बड़े वित्तीय लेनदेन सामने आए। इनमें टुपेलो कंस्ट्रक्शंस प्राइवेट लिमिटेड और टुपेलो लैंड डेवलपमेंट प्राइवेट लिमिटेड को ₹290-₹290 करोड़ के कर्ज, पैडिया कनेक्शन प्राइवेट लिमिटेड को ₹85 करोड़ तथा आईवीएल फाइनेंस को अलग-अलग वित्तीय वर्षों में ₹1,000 करोड़ और ₹1,100 करोड़ के कर्ज शामिल थे। एजेंसी ने इन लेनदेन में कथित लाभ के बदले लाभ पहुंचाने की व्यवस्था की जांच की जरूरत बताई थी।
हालांकि, विशेष अदालत ने सीबीआई के अपने ही पूर्व रुख को अहम माना। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में सीबीआई द्वारा दिए गए इस कथन का उल्लेख किया कि इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस के कथित कृत्यों से सार्वजनिक धन को कोई नुकसान नहीं हुआ। अदालत के अनुसार, जब जांच एजेंसी खुद कह चुकी है कि कंपनी या उसके प्रवर्तकों के खिलाफ रकम के दुरुपयोग का कोई प्रत्यक्ष आरोप नहीं है और उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया आपराधिक कृत्य सामने नहीं आता, तो उसी आधार पर आगे की जांच की अनुमति नहीं दी जा सकती।
मामले में धानी लोन्स एंड सर्विसेज लिमिटेड ने भी हस्तक्षेप की मांग की थी। यह कंपनी पूर्व आईवीएल फाइनेंस की जगह आ चुकी है। उसका कहना था कि जब पूर्व कंपनी के खिलाफ संज्ञान ही नहीं लिया गया है, तो पर्याप्त आधार के बिना आगे जांच की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
विशेष अदालत ने माना कि आगे की जांच की अनुमति देने से पहले अभियोजन पक्ष को उसके समर्थन में ठोस सामग्री प्रस्तुत करनी होगी। चूंकि अदालत ने सीबीआई की आगे जांच की मांग खारिज कर दी, इसलिए धानी लोन्स एंड सर्विसेज की हस्तक्षेप याचिका भी निष्प्रभावी हो गई। मामला अब हाई कोर्ट में लंबित संबंधित कार्यवाही और मूल घोटाले की जारी कानूनी प्रक्रिया के बीच आगे बढ़ेगा।
