नई दिल्ली। भारतीय बैंकों के लिए विदेशी मुद्रा जमा अब एक नई चुनौती का कारण बन सकती है। बैंकों ने केंद्रीय बैंक की विशेष सुविधा के तहत 127 अरब डॉलर से अधिक की विदेशी मुद्रा जमा जुटाई है, लेकिन इस रकम पर भविष्य में होने वाले ब्याज भुगतान का बड़ा हिस्सा अब तक सुरक्षित नहीं किया गया है। ऐसे में अगर रुपये में फिर तेज गिरावट आती है तो बैंकों को ब्याज चुकाने के लिए बड़ी मात्रा में डॉलर खरीदने पड़ सकते हैं। इससे विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग बढ़ सकती है और रुपये पर अतिरिक्त दबाव बनने का जोखिम है।
यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब रुपये की दिशा पर कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिकी ब्याज दरों और वैश्विक बाजारों में पूंजी प्रवाह का असर बना हुआ है। बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े पांच अधिकारियों के मुताबिक, आरबीआई की विशेष स्वैप व्यवस्था ने विदेशी मुद्रा जमा की मूल रकम से जुड़े जोखिम को काफी हद तक संभाल लिया है, लेकिन ब्याज भुगतान का जोखिम बैंकों को खुद प्रबंधित करना होगा।
127 अरब डॉलर से ज्यादा की विदेशी मुद्रा जमा
केंद्रीय बैंक ने जून में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच देश के भुगतान संतुलन को मजबूत करने के लिए एकमुश्त उपाय के तौर पर विदेशी मुद्रा जमा से जुड़ी विशेष स्वैप सुविधा शुरू की थी। इसके बाद बैंकों ने 127 अरब डॉलर से अधिक की ऐसी जमा राशि जुटाई है।
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इस व्यवस्था से बैंकों को विदेशी मुद्रा उपलब्धता बढ़ाने और रुपये पर तत्काल दबाव कम करने में मदद मिली। हालांकि, तीन से पांच साल की अवधि वाली कई जमाओं पर ब्याज का भुगतान अवधि पूरी होने पर किया जाना है। इसका मतलब है कि भविष्य में बैंकों को ब्याज भुगतान के लिए डॉलर की व्यवस्था करनी होगी।
बैंकिंग क्षेत्र के अधिकारियों के अनुसार, विदेशी बैंकों ने इस तरह के जोखिम का बड़ा हिस्सा सुरक्षित किया है। इसके विपरीत, अधिकांश सरकारी बैंकों और कई निजी भारतीय बैंकों ने ब्याज भुगतान से जुड़े विदेशी मुद्रा जोखिम की फिलहाल हेजिंग नहीं की है।
हेजिंग महंगी, इसलिए बैंक कर रहे इंतजार
बैंकों के लिए ब्याज भुगतान के विदेशी मुद्रा जोखिम को पहले से सुरक्षित करना महंगा पड़ रहा है। तीन से पांच साल की अवधि वाली जमा के मामले में हेजिंग की लागत करीब 3 प्रतिशत सालाना बताई गई है। ऐसे में कई बैंकों को मौजूदा परिस्थितियों में हेजिंग की लागत तत्काल डॉलर खरीदने की संभावित लागत से अधिक लग रही है।
एक सरकारी बैंक से जुड़े अधिकारी के मुताबिक, फिलहाल उनका बैंक ब्याज भुगतान के लिए पहले से विदेशी मुद्रा खरीदकर जोखिम सुरक्षित करने के बजाय जरूरत पड़ने पर हाजिर बाजार से डॉलर खरीदने की रणनीति अपना रहा है। हाल में आरबीआई के हस्तक्षेप से रुपये में आई मजबूती ने भी बैंकों को इस रणनीति को जारी रखने का भरोसा दिया है।
रुपया 96-97 पर पहुंचा तो बदल सकता है रुख
बैंकों की मौजूदा रणनीति रुपये की स्थिरता पर काफी हद तक निर्भर है। अगर भारतीय मुद्रा में तेज गिरावट आती है तो विदेशी मुद्रा में होने वाले ब्याज भुगतान की लागत रुपये के लिहाज से बढ़ जाएगी। साथ ही, कई बैंकों को एक ही समय में डॉलर खरीदने की जरूरत पड़ सकती है।
एक निजी बैंक के विदेशी मुद्रा कारोबार से जुड़े अधिकारी के मुताबिक, अगर रुपया 96-97 रुपये प्रति डॉलर के स्तर की ओर जाता है तो बैंक ब्याज भुगतान के जोखिम को सुरक्षित करने पर गंभीरता से विचार कर सकते हैं। हालांकि, उस समय तक डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर और दबाव बनने की स्थिति भी पैदा हो सकती है।
कच्चे तेल की कीमत फिर बढ़ा रही चिंता
रुपये के लिए बाहरी जोखिम भी कम नहीं हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच रही है। भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है, इसलिए तेल महंगा होने पर देश की डॉलर जरूरत बढ़ती है। इससे रुपये पर दबाव बढ़ने की संभावना रहती है।
इसके अलावा अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति भी भारतीय मुद्रा के लिए महत्वपूर्ण है। बाजार में अमेरिकी ब्याज दर बढ़ने की संभावना बढ़ने पर डॉलर मजबूत हो सकता है और उभरते बाजारों से पूंजी बाहर निकलने का दबाव बन सकता है।
आरबीआई के हस्तक्षेप से मिली थी राहत
हाल के दिनों में आरबीआई के विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप और बैंकों के पास उपलब्ध अतिरिक्त विदेशी मुद्रा ने रुपये को सहारा दिया है। इसी वजह से रुपये ने हाल में दो महीने का मजबूत स्तर भी देखा। लेकिन यह राहत लंबे समय तक कायम रहती है या नहीं, यह वैश्विक बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
अगर कच्चा तेल महंगा रहता है, डॉलर मजबूत होता है और रुपया कमजोर पड़ता है, तो विदेशी मुद्रा जमा पर बिना हेजिंग वाले ब्याज भुगतान बैंकों के लिए अतिरिक्त लागत बन सकते हैं। ऐसे में बैंकों की डॉलर खरीदारी विदेशी मुद्रा बाजार में मांग बढ़ा सकती है।
फिलहाल यह जोखिम तत्काल संकट के रूप में सामने नहीं आया है, लेकिन विदेशी मुद्रा जमा की बड़ी मात्रा और भविष्य के ब्याज भुगतान को देखते हुए बाजार में इस पर नजर बढ़ गई है। आने वाले महीनों में रुपये की चाल यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगी कि बैंकों की मौजूदा बिना हेजिंग वाली रणनीति कितनी टिकाऊ साबित होती है।
