भोपाल। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बीमा धोखाधड़ी से जुड़े एक मामले में 78 वर्षीय सेवानिवृत्त भारतीय वन सेवा (आईएफएस) अधिकारी गोविंदप्पा जयरामैया को गिरफ्तारी से पहले जमानत देकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति के बैंक खाते में कथित अपराध से जुड़ी रकम जमा होना, अपने आप में यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि वह व्यक्ति जानबूझकर धोखाधड़ी या किसी आपराधिक साजिश में शामिल था। जयरामैया के कर्नाटक स्थित बैंक खाते में कथित बीमा ठगी से जुड़ी ₹15.15 लाख की राशि कई किस्तों में पहुंची थी।
न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकारी ने 18 अगस्त 2026 को गोविंदप्पा जयरामैया बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में आदेश पारित किया। यह मामला टीकमगढ़ जिले के बम्होरी कला थाने में दर्ज अपराध क्रमांक 149/2024 से संबंधित है। प्राथमिकी में भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468 और 471 के साथ धारा 34 के तहत आरोप लगाए गए हैं।
बीमा पॉलिसी के नाम पर ₹26.11 लाख ठगी का आरोप
मामले की शुरुआत मध्य प्रदेश के एक निवासी की शिकायत से हुई। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि कुछ लोगों ने भारतीय स्टेट बैंक लाइफ, भारती एक्सा, कोटक लाइफ और अन्य बीमा संस्थाओं के प्रतिनिधि बनकर उससे संपर्क किया। कथित ठगों ने बीमा पॉलिसी, बोनस, पॉलिसी रद्द कराने और रकम जारी कराने के नाम पर अलग-अलग तरह के झांसे दिए।
पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया और शिकायतकर्ता से अलग-अलग बैंक खातों तथा इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के जरिए रकम जमा कराई। इस तरह उससे कुल ₹26.11 लाख की कथित ठगी की गई। जांच आगे बढ़ने पर पुलिस को जयरामैया के बैंक खाते में हुए लेनदेन का पता चला।
जांच में सामने आया कि ₹15,15,639 की राशि 6 जुलाई से 26 दिसंबर 2023 के बीच कई किस्तों में जयरामैया के कर्नाटक के तुमकुरु स्थित आईसीआईसीआई बैंक खाते में जमा हुई। इसी लेनदेन के आधार पर पुलिस ने उनके खाते को मामले से जोड़ा और उनसे पूछताछ की प्रक्रिया शुरू की।
पूर्व अधिकारी का दावा- वह खुद भी झांसे में आए
जयरामैया ने अदालत में अपने बचाव में कहा कि वह स्वयं भी एक अज्ञात व्यक्ति के झांसे में आए थे। उनके मुताबिक, एक व्यक्ति ने उनसे संपर्क कर बीमा की रकम दिलाने में मदद करने का भरोसा दिया था। इसी दौरान कथित तौर पर उनके बैंक खाते और डेबिट कार्ड से संबंधित जानकारी हासिल कर ली गई।
बाद में जब पुलिस ने उनके खाते में हुए लेनदेन को बीमा ठगी की जांच से जोड़ा तो उन्हें मध्य प्रदेश में गिरफ्तारी की आशंका हुई। उन्होंने पहले कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख किया। वहां से उन्हें तीन सप्ताह के लिए गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा मिली, ताकि वह मध्य प्रदेश में सक्षम अदालत के समक्ष गिरफ्तारी से पहले जमानत की याचिका दाखिल कर सकें।
Proposal for Conducting Cyber Crisis Drill, Tabletop Exercise (TTEx) & CCMP Readiness Exercise
अभियोजन ने कहा- रकम सीधे खाते में पहुंची, जांच जरूरी
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के समक्ष राज्य सरकार ने जमानत याचिका का विरोध किया। अभियोजन की ओर से कहा गया कि जयरामैया के बैंक खाते में सीधे कथित अपराध की रकम पहुंची थी। इसलिए यह पता लगाना जरूरी है कि रकम किस तरीके से उनके खाते में आई, उसका इस्तेमाल या निकासी कैसे हुई और पूरे लेनदेन के पीछे किसकी भूमिका थी।
अभियोजन ने यह भी दलील दी कि बैंक खाते और लेनदेन की जांच के लिए पूछताछ जरूरी है और आवश्यकता पड़ने पर हिरासत में लेकर पूछताछ की जा सकती है। राज्य का कहना था कि मामले में वित्तीय लेनदेन की कड़ियों को पूरी तरह जोड़ना अभी बाकी है।
हाईकोर्ट को नहीं मिला जानबूझकर अपराध में शामिल होने का ठोस आधार
हालांकि, अदालत ने उपलब्ध सामग्री का परीक्षण करने के बाद कहा कि इस स्तर पर ऐसा पर्याप्त प्रथमदृष्टया साक्ष्य सामने नहीं आया है, जिससे यह स्थापित हो कि जयरामैया ने कथित अपराध में जानबूझकर भागीदारी की थी।
अदालत ने यह भी गौर किया कि अभियोजन ने उनके खिलाफ कोई स्पष्ट प्रत्यक्ष भूमिका नहीं बताई। ऐसा कोई प्रथमदृष्टया आधार नहीं था कि उन्होंने शिकायतकर्ता को रकम देने के लिए प्रेरित किया, फर्जी दस्तावेज तैयार किए या उनका इस्तेमाल किया अथवा खुद को किसी बीमा कंपनी का प्रतिनिधि बताकर शिकायतकर्ता से संपर्क किया।
अदालत ने जयरामैया के उस दावे को भी ध्यान में रखा कि एक अज्ञात व्यक्ति ने बीमा की रकम दिलाने के बहाने उनसे संपर्क किया और उनके बैंक तथा डेबिट कार्ड से जुड़ी जानकारी हासिल की थी। अदालत ने माना कि केवल बैंक खाते में रकम का पहुंचना, जब तक जानबूझकर भागीदारी का अन्य ठोस आधार न हो, गिरफ्तारी का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।
बैंक रिकॉर्ड से जांच संभव, हिरासत को जरूरी नहीं माना
हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में लगाए गए आरोप मुख्य रूप से बैंकिंग और इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन से जुड़े हैं। ऐसे मामलों की जांच बैंक रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन के विवरण और अन्य दस्तावेजी साक्ष्यों के जरिए आगे बढ़ाई जा सकती है। इसलिए इस चरण पर जयरामैया को हिरासत में लेकर पूछताछ करना अनिवार्य साबित नहीं हुआ।
अदालत ने उनकी उम्र और पृष्ठभूमि को भी महत्वपूर्ण माना। जयरामैया करीब 78 वर्ष के सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी और पूर्व सैनिक हैं। वह कर्नाटक के स्थायी निवासी हैं और उनके खिलाफ किसी पूर्व आपराधिक मामले का रिकॉर्ड सामने नहीं रखा गया। अदालत को ऐसा कोई आधार भी नहीं मिला, जिससे यह आशंका हो कि वह फरार होंगे, गवाहों को प्रभावित करेंगे या साक्ष्यों से छेड़छाड़ करेंगे।
इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने उन्हें गिरफ्तारी से पहले जमानत दे दी। हालांकि, राहत कुछ शर्तों के साथ दी गई है। उन्हें जांच में सहयोग करना होगा, जरूरत पड़ने पर पूछताछ के लिए उपलब्ध रहना होगा और अदालत की पूर्व अनुमति के बिना भारत से बाहर नहीं जाना होगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश मामले में जयरामैया को दोषमुक्त घोषित नहीं करता। हाईकोर्ट की टिप्पणियां केवल गिरफ्तारी से पहले जमानत के आवेदन तक सीमित हैं। बीमा ठगी, फर्जी दस्तावेजों और बैंक खातों के इस्तेमाल से जुड़े मूल आरोपों की जांच जारी रहेगी।
