नई दिल्ली। दुनियाभर में इंटरनेट के बढ़ते इस्तेमाल के बीच बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता सामने आई है। यूनिसेफ की एक वैश्विक रिपोर्ट के मुताबिक, बीते एक साल में दुनिया के करीब दो करोड़ बच्चों को ऑनलाइन यौन शोषण या दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। 21 देशों में 12 से 17 वर्ष की आयु के बच्चों पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि सर्वे में शामिल हर पांच में से एक से अधिक बच्चे किसी न किसी रूप में ऑनलाइन यौन शोषण या उत्पीड़न का शिकार हुए।
रिपोर्ट के अनुसार करीब डेढ़ करोड़ बच्चों को अनचाहे तौर पर यौन या अश्लील सामग्री दिखाई गई। लाखों बच्चों पर यौन प्रकृति की बातचीत करने का दबाव डाला गया, जबकि कई मामलों में बच्चों की निजी या यौन तस्वीरें उनकी अनुमति के बिना साझा की गईं। विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं अधिक हो सकता है, क्योंकि ऑनलाइन शोषण के कई मामले सामने ही नहीं आते।
डेढ़ करोड़ बच्चे अनचाही अश्लील सामग्री के संपर्क में
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि करीब डेढ़ करोड़ बच्चों को उनकी इच्छा के विरुद्ध यौन या आपत्तिजनक सामग्री दिखाई गई। इसके अलावा करीब 90 लाख बच्चों पर यौन प्रकृति की बातचीत करने के लिए दबाव डाला गया।
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करीब 40 लाख मामलों में बच्चों की निजी या यौन तस्वीरें उनकी अनुमति के बिना साझा किए जाने की बात सामने आई। ऐसी घटनाएं बच्चों को आगे भी उत्पीड़न, धमकी और शोषण के जोखिम में डाल सकती हैं, खासकर तब जब निजी सामग्री कई डिजिटल मंचों पर प्रसारित हो जाए।
रिपोर्ट बताती है कि ऑनलाइन यौन शोषण केवल किसी एक माध्यम तक सीमित नहीं है। निजी संदेश, सामाजिक माध्यम, ऑनलाइन खेल और अन्य डिजिटल संचार मंच इसके लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
कई मामलों में आरोपी बच्चे का परिचित
रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि शोषण करने वाला व्यक्ति अक्सर कोई पूरी तरह अनजान व्यक्ति नहीं था। आधे से अधिक मामलों में आरोपी कथित तौर पर बच्चे का पहले से परिचित था। इनमें दोस्त, रिश्तेदार या साथी शामिल थे।
यह निष्कर्ष इस धारणा को चुनौती देता है कि ऑनलाइन यौन शोषण मुख्य रूप से अजनबियों द्वारा बच्चों को निशाना बनाकर किया जाता है। पहले से मौजूद रिश्तों और भरोसे का इस्तेमाल निजी तस्वीरें हासिल करने, यौन बातचीत के लिए दबाव बनाने या बच्चों को अनुचित गतिविधियों में फंसाने के लिए किया जा सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार करीब 38 प्रतिशत बच्चों ने पहली बार इंटरनेट पर ऐसी आपत्तिजनक या शोषणकारी गतिविधि का सामना किया।
21 देशों के 21 हजार बच्चों से जुटाया गया आंकड़ा
यह अध्ययन वर्ष 2020 से 2025 के बीच 21 देशों के करीब 21 हजार बाल इंटरनेट उपयोगकर्ताओं से जुटाए गए आंकड़ों पर आधारित है। अध्ययन में ब्राजील, पाकिस्तान, केन्या और सर्बिया समेत कई देश शामिल थे, जबकि भारत इस सर्वे का हिस्सा नहीं था।
शोधकर्ताओं ने अलग-अलग डिजिटल मंचों पर बच्चों के अनुभवों का अध्ययन कर यह समझने की कोशिश की कि ऑनलाइन यौन शोषण किन माध्यमों पर अधिक हो रहा है और बच्चे किस तरह इसके संपर्क में आ रहे हैं।
सामाजिक माध्यमों पर सबसे ज्यादा खतरा
रिपोर्ट के अनुसार करीब 60 प्रतिशत घटनाएं सामाजिक माध्यमों से जुड़ी थीं, जबकि लगभग 14 प्रतिशत मामले ऑनलाइन खेल मंचों से संबंधित थे। प्रमुख मंचों में फेसबुक से जुड़े मामलों की हिस्सेदारी करीब 50 प्रतिशत रही। इसके बाद व्हाट्सऐप 29 प्रतिशत, इंस्टाग्राम 24 प्रतिशत, स्नैपचैट 13 प्रतिशत और टिकटॉक 12 प्रतिशत के साथ सामने आए।
मेटा की ओर से कहा गया है कि सर्वे उस अवधि से संबंधित है, जब किशोरों की सुरक्षा के लिए लागू किए जाने वाले कुछ नए उपाय पूरी तरह प्रभावी नहीं हुए थे। कंपनी के अनुसार किशोर खातों को स्वतः निजी बनाने और अनजान वयस्कों के संदेशों पर कड़े तकनीकी प्रतिबंध जैसे सुरक्षा उपाय अब लागू किए गए हैं।
एआई और डीपफेक से बढ़ा नया खतरा
रिपोर्ट में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डीपफेक तकनीक के दुरुपयोग को लेकर भी गंभीर चिंता जताई गई है। नौ देशों में किए गए विस्तृत अध्ययन के अनुसार करीब 11 लाख बच्चों की बिना सहमति के कृत्रिम बुद्धिमत्ता से यौन या आपत्तिजनक तस्वीरें और वीडियो तैयार किए गए।
इस तकनीक ने खतरे को और गंभीर बना दिया है, क्योंकि पीड़ित की वास्तविक तस्वीर या वीडियो का इस्तेमाल किए बिना भी कृत्रिम रूप से आपत्तिजनक सामग्री तैयार की जा सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे मामलों में बच्चों को गंभीर मानसिक तनाव और चिंता का सामना करना पड़ सकता है।
यूनिसेफ के निष्कर्ष सामाजिक माध्यमों, ऑनलाइन खेल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मंचों पर बच्चों की सुरक्षा मजबूत करने की जरूरत को रेखांकित करते हैं। बेहतर शिकायत व्यवस्था, अभिभावकों और शिक्षकों में जागरूकता तथा बच्चों को सुरक्षित डिजिटल व्यवहार की जानकारी देना इस चुनौती से निपटने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
