पटना। पटना साइबर पुलिस ने डिजिटल अरेस्ट, वित्तीय धोखाधड़ी और ऑनलाइन ठगी से जुड़े कथित संगठित साइबर अपराध गिरोह का भंडाफोड़ करते हुए तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, आरोपी कई राज्यों में लोगों को निशाना बनाकर ठगी करते थे और एक बड़े साइबर अपराध नेटवर्क से जुड़े होने के संकेत मिले हैं। कार्रवाई के दौरान पुलिस ने छह मोबाइल फोन, दो लैपटॉप, तीन चेकबुक, दो पासबुक और पांच एटीएम कार्ड समेत कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और बैंकिंग दस्तावेज बरामद किए हैं।
गिरफ्तार आरोपियों की पहचान खगौल-दानापुर की न्यू कॉलोनी निवासी गौरव कुमार, ट्रांसपोर्ट नगर निवासी आदर्श कुमार और कुम्हरार निवासी अमन राज के रूप में हुई है। पुलिस का कहना है कि तीनों कथित तौर पर देश के अलग-अलग हिस्सों में सक्रिय एक संगठित साइबर अपराध नेटवर्क से जुड़े थे। प्रारंभिक जांच में आरोपियों के खिलाफ साइबर ठगी से संबंधित कई शिकायतें भी सामने आई हैं।
पुलिस के अनुसार, राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर आरोपियों से संबंधित कई शिकायतें दर्ज मिलीं। इन शिकायतों और जांच के दौरान जुटाए गए डिजिटल साक्ष्यों के विश्लेषण से पुलिस को संदिग्धों तक पहुंचने और उनके कथित नेटवर्क से संबंध स्थापित करने में मदद मिली।
जांच में तकनीकी निगरानी और डिजिटल साक्ष्यों की अहम भूमिका रही। पुलिस ने संदिग्ध मोबाइल नंबरों, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और अन्य डिजिटल गतिविधियों का विश्लेषण कर आरोपियों की पहचान की। बरामद मोबाइल फोन और लैपटॉप की अब विस्तृत तकनीकी जांच की जा रही है, ताकि दूसरे संदिग्धों, संभावित पीड़ितों और वित्तीय लेनदेन से जुड़ी जानकारी हासिल की जा सके।
पुलिस को आशंका है कि बरामद बैंकिंग दस्तावेजों और खातों का इस्तेमाल साइबर ठगी से हासिल रकम प्राप्त करने और उसे दूसरे खातों में भेजने के लिए किया गया होगा। तीन चेकबुक, दो पासबुक और पांच एटीएम कार्ड की जांच के जरिए पैसों के लेनदेन और कथित रूप से इस्तेमाल किए गए बैंक खातों का पता लगाया जा रहा है। जब्त इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से बातचीत, लेनदेन और अन्य डिजिटल गतिविधियों से संबंधित साक्ष्य भी जुटाए जा रहे हैं।
जांच का एक अहम पहलू यह पता लगाना है कि आरोपी कथित तौर पर डिजिटल अरेस्ट की ठगी किस तरीके से करते थे। ऐसे मामलों में साइबर अपराधी अक्सर खुद को पुलिस, केंद्रीय जांच एजेंसी, बैंक अधिकारी या किसी अन्य सरकारी विभाग का कर्मचारी बताकर लोगों को गिरफ्तारी या कानूनी कार्रवाई का डर दिखाते हैं। इसके बाद फोन या वीडियो कॉल के जरिए पीड़ितों पर लगातार दबाव बनाया जाता है और जांच, सत्यापन या गिरफ्तारी से बचने के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया जाता है।
मामले में पटना साइबर थाना में प्राथमिकी दर्ज की गई है। तीनों आरोपियों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। पुलिस अब बरामद डिजिटल उपकरणों और बैंकिंग रिकॉर्ड की जांच कर आरोपियों की भूमिका स्पष्ट करने के साथ गिरोह से जुड़े अन्य लोगों की पहचान करने में जुटी है।
जांचकर्ताओं का यह भी प्रयास है कि गिरोह ने अब तक कितनी रकम की ठगी की और कितने लोगों को निशाना बनाया। अलग-अलग राज्यों से शिकायतें सामने आने के कारण पुलिस यह पता लगा रही है कि आरोपी स्वतंत्र रूप से काम कर रहे थे या किसी बड़े नेटवर्क का हिस्सा थे, जिसमें अलग-अलग संचालक, बैंक खाते और रकम स्थानांतरित करने वाले माध्यम शामिल थे।
साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट की ठगी में तकनीकी तरीकों के साथ मनोवैज्ञानिक दबाव का इस्तेमाल किया जाता है। अपराधी पीड़ितों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि तत्काल कार्रवाई नहीं करने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा या उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होगी। ऐसे किसी भी दावे की पुष्टि संबंधित विभाग के आधिकारिक माध्यम से करनी चाहिए और फोन या वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी की धमकी मिलने पर कभी भी पैसे ट्रांसफर नहीं करने चाहिए।
पटना साइबर पुलिस ने बताया कि मामले की जांच जारी है। अन्य संदिग्धों की भूमिका सामने आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। पुलिस बरामद डिजिटल और बैंकिंग साक्ष्यों के आधार पर कथित ठगी का वास्तविक पैमाना, रकम का पूरा लेनदेन और गिरोह से जुड़े अन्य आरोपियों तथा संभावित पीड़ितों का पता लगाने में जुटी है।
