जालौन। उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में करीब ₹450 करोड़ कीमत की सरकारी जमीन को कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के जरिए निजी संपत्ति में बदलने की कोशिश का मामला सामने आया है। जिला प्रशासन की जांच में उरई के ग्राम लहरिया स्थित करीब 7.26 एकड़ नजूल भूमि से जुड़े पुराने दस्तावेजों और वर्तमान राजस्व अभिलेखों में गंभीर विसंगतियां पाई गई हैं। प्रशासन के मुताबिक, सरकारी रिकॉर्ड में यह जमीन अब भी राज्य सरकार की संपत्ति के रूप में दर्ज है, जबकि कुछ दस्तावेजों के आधार पर इस पर निजी अधिकार जताने और खरीद-फरोख्त का प्रयास किया गया।
मामले में कोतवाली उरई में प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। आरोप है कि कूटरचित दस्तावेजों और कथित फर्जी लीज डीड के आधार पर सरकारी जमीन पर निजी स्वामित्व स्थापित करने, उसे बेचने या हस्तांतरित करने और उससे आर्थिक लाभ हासिल करने की कोशिश की गई।
मामला ग्राम लहरिया की गाटा संख्या 518 से जुड़ी 7.26 एकड़ नजूल भूमि का है। प्रशासनिक जांच में सामने आया कि यह जमीन मूल रूप से नजूल संपत्ति थी। पुराने अभिलेखों के अनुसार, 15 मार्च 1914 को जमीन 99 वर्ष के पट्टे पर दी गई थी। पट्टे की शर्तों में वार्षिक लीज किराया जमा करने और आवासीय मकान स्थापित करने का प्रावधान था। इसके अलावा कलेक्टर की अनुमति के बिना भवन में बदलाव और भूमि या भवन के मूल उपयोग में परिवर्तन पर रोक थी। पुराने रिकॉर्ड में प्रारंभिक पट्टा ए.के. पसन्ना के नाम दर्ज होने का उल्लेख मिलता है।
जांच के दौरान वर्ष 1918 और 1949 के दस्तावेज भी सामने आए। रिकॉर्ड के अनुसार, 1918 में ए.के. पसन्ना की पुत्री एलिस पसन्ना द्वारा बी.सी.एच., पूना के पक्ष में भूमि के विक्रय का उल्लेख मिलता है। इसके बाद बी.सी.एच., पूना के अधिकृत प्रतिनिधि जॉन ई. नॉटन द्वारा 23 सितंबर 1949 को मिस एडेलिन ग्रीगर के पक्ष में जमीन के विक्रय का उल्लेख पुराने दस्तावेजों में पाया गया।
हालांकि प्रशासनिक जांच में यह भी सामने आया कि संबंधित भूमि की 99 वर्ष की लीज अवधि वर्ष 2014 में समाप्त हो चुकी थी। इसके बावजूद जमीन पर निजी अधिकार और उससे संबंधित लेनदेन के दावे किए जाते रहे।
जांच में सबसे महत्वपूर्ण सवाल उस सेल डीड को लेकर उठा, जिसके आधार पर जमीन पर निजी अधिकार और खरीद-फरोख्त का दावा किया जा रहा था। जांच समिति के मुताबिक, इस सेल डीड का उल्लेख न तो कलेक्टर उरई के नजूल रजिस्टर में मिला और न ही नगर पालिका परिषद उरई के संपत्ति रजिस्टर में। सरकारी अभिलेखों में जमीन की स्थिति अब भी राज्य सरकार की संपत्ति के रूप में दर्ज मिली।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिलाधिकारी ने तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की थी। 6 मई और 27 मई 2026 को अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) की अध्यक्षता में गठित समिति को नजूल रजिस्टर, खतौनी, राजस्व अभिलेख, पुराने दस्तावेज और अन्य संबंधित रिकॉर्ड की जांच की जिम्मेदारी दी गई। समिति ने पुराने दस्तावेजों का वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड से मिलान भी किया।
जांच समिति की रिपोर्ट में वर्ष 1953 में मूल आवंटी से अलग व्यक्तियों द्वारा तैयार की गई एक डीड पर भी सवाल उठाए गए। समिति के अनुसार, इस डीड के माध्यम से नजूल भूमि को आर्थिक लाभ के उद्देश्य से कथित तौर पर कूटरचित और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर अवैध रूप से बेचने का प्रयास किया गया। जांच में इन दस्तावेजों के आधार पर ट्रस्ट आदि के गठन का उल्लेख भी सामने आया, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में भूमि की स्थिति राज्य सरकार की संपत्ति के रूप में ही दर्ज रही।
जांच रिपोर्ट और संबंधित राजस्व अभिलेखों के आधार पर नगर पालिका परिषद उरई के अधिशासी अधिकारी रामअचल कुरील ने कोतवाली उरई में प्राथमिकी दर्ज कराई। कार्रवाई के दायरे में वर्तमान कब्जेदार बेथनी क्रिश्चियन होम्स मिशन/बी.सी.एच. मिशन की प्रबंधक किरन के मसीह और संस्था से जुड़े अन्य लोगों के अलावा कथित खरीद-फरोख्त में शामिल व्यक्ति और संस्थाएं भी शामिल हैं।
पुलिस अब दस्तावेजों की वास्तविकता, कथित जमीन लेनदेन और इसमें शामिल लोगों की भूमिका की जांच करेगी। यह भी पता लगाया जाएगा कि कथित फर्जी दस्तावेज कब और किस स्तर पर तैयार किए गए तथा उनके आधार पर जमीन के अधिकार या हस्तांतरण का प्रयास कैसे किया गया।
करीब ₹450 करोड़ मूल्य की सरकारी संपत्ति से जुड़े इस मामले ने पुराने राजस्व और नजूल अभिलेखों के सत्यापन की जरूरत को भी सामने ला दिया है। प्रशासन का कहना है कि सरकारी जमीन से संबंधित रिकॉर्ड में किसी भी तरह की हेराफेरी या फर्जीवाड़े को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
