चेन्नई। मद्रास हाईकोर्ट ने बुधवार को कहा कि जांच लंबित रहने के दौरान CCTV फुटेज जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं करना अदालत की अवमानना की कार्रवाई का आधार बन सकता है। अदालत ने तमिलनाडु के पुलिस महानिदेशक (DGP) को स्वतः पक्षकार बनाते हुए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के लिए लागू व्यवस्था पर रिपोर्ट मांगी है।
न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायण ने यह टिप्पणी निलंबित उपनिरीक्षक की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याचिकाकर्ता पहले सेलम में सिविल सप्लाइज-सीआईडी से जुड़े थे। उन्होंने अपने और तीन अन्य कर्मचारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी से संबंधित CCTV फुटेज उपलब्ध कराने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि उनके खिलाफ रिश्वत का मामला सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक निदेशालय (DVAC) ने गलत तरीके से दर्ज किया। उन्होंने 15 सितंबर 2025 से 15 अक्टूबर 2025 तक की CCTV रिकॉर्डिंग उपलब्ध कराने की मांग की थी। उनका कहना था कि यह इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य उनके पक्ष को साबित करने के लिए महत्वपूर्ण है।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर. शुनमुगसुंदरम ने अदालत को बताया कि जांच और मुकदमे दोनों में CCTV फुटेज महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने लंबित जांच वाले मामलों में ऐसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को 18 महीने तक सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है।
अधिवक्ता ने यह भी बताया कि मद्रास हाईकोर्ट की एक खंडपीठ पहले ही इसी व्यवस्था को स्वीकार कर चुकी है। उन्होंने कहा कि तत्कालीन महाधिवक्ता ने भी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के संबंध में खंडपीठ के समक्ष आश्वासन दिया था।
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सुनवाई के दौरान DVAC की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक अरुण अनबुमणि ने अदालत को बताया कि संबंधित CCTV फुटेज केवल 15 दिनों तक सुरक्षित रखा गया था।
इस जानकारी पर न्यायमूर्ति लक्ष्मीनारायण ने कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित अवधि से एक मिनट भी कम समय तक CCTV फुटेज सुरक्षित रखना उसके आदेश का उल्लंघन होगा और ऐसी स्थिति में अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है।
अदालत ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था को लेकर चिंता जताते हुए पुलिस नेतृत्व से स्पष्टीकरण मांगा है। तमिलनाडु के DGP को इस संबंध में रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद होगी।
अदालत की टिप्पणी ऐसे मामलों में CCTV फुटेज के संरक्षण की गंभीरता को रेखांकित करती है। जांच के दौरान उपलब्ध रिकॉर्ड बाद में मुकदमे में महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकते हैं। विशेष रूप से जब आरोपी अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को चुनौती देता है, तब संबंधित अवधि की CCTV रिकॉर्डिंग मामले की परिस्थितियों को स्पष्ट करने में अहम भूमिका निभा सकती है।
