नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नैनीताल बैंक के सर्वर को कथित तौर पर हैक कर ₹16 करोड़ से अधिक की रकम siphon off करने वाले साइबर फ्रॉड मामले में आरोपी मोहम्मद शाहवेज की दूसरी जमानत याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने साइबर अपराध को ‘साइलेंट वायरस’ बताते हुए कहा कि यह बेहद गोपनीय और विघटनकारी तरीके से केवल आर्थिक नुकसान ही नहीं करता, बल्कि समाज के भरोसे, सुरक्षा और प्रगति को भी प्रभावित करता है।
यह आदेश न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव ने गौतमबुद्ध नगर के साइबर क्राइम थाने में वर्ष 2024 में दर्ज मामले की सुनवाई के दौरान दिया। शाहवेज पर आरोप है कि वह साइबर अपराध से जुड़े एक कथित सिंडिकेट का हिस्सा था। वह 21 अप्रैल 2025 से जेल में बंद है। उसकी पहली जमानत याचिका हाईकोर्ट ने 27 नवंबर 2025 को खारिज कर दी थी।
तेजी से बढ़ते साइबर अपराध पर कोर्ट की चिंता
हाईकोर्ट ने कहा कि तकनीक के तेजी से विकास और डिजिटल बुनियादी ढांचे के व्यापक इस्तेमाल से साइबर अपराधों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इनमें फिशिंग, रैनसमवेयर हमले, साइबर स्टॉकिंग और डेटा चोरी जैसे अपराध शामिल हैं।
कोर्ट ने कहा कि डिजिटल इंडिया जैसी पहलों ने देश में डिजिटल बदलाव को तेज किया है, लेकिन इसके साथ ऐसी कमजोरियां भी सामने आई हैं जिनका साइबर अपराधी फायदा उठा रहे हैं।
अदालत ने यह भी कहा कि साइबर अपराध किसी विशेष वर्ग तक सीमित नहीं है। इसका असर धर्म, क्षेत्र, शिक्षा या सामाजिक वर्ग की परवाह किए बिना देशभर के लोगों पर पड़ रहा है। ऐसे अपराधों में लोगों की मेहनत की कमाई के साथ-साथ डिजिटल व्यवस्था पर उनका भरोसा और सुरक्षा भी प्रभावित होती है।
म्यूल अकाउंट उपलब्ध कराने का आरोप
जमानत का विरोध करते हुए अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि शाहवेज और अन्य आरोपियों ने मिलकर नैनीताल बैंक के सर्वर को कथित तौर पर हैक किया और ₹16 करोड़ से अधिक की रकम निकाल ली।
अभियोजन के मुताबिक, शाहवेज ने सह-आरोपी उमीलाकेई एमका उर्फ एलेक्स को करीब 2 प्रतिशत कमीशन पर म्यूल बैंक खाते उपलब्ध कराए थे। जांच के दौरान एक अन्य आरोपी डेनिश के बयान में भी शाहवेज का नाम सामने आने की बात कही गई।
राज्य की ओर से यह भी दलील दी गई कि जांच के दौरान तैयार दस्तावेजों से शाहवेज के कथित साइबर फ्रॉड सिंडिकेट में सक्रिय सदस्य होने के संकेत मिले हैं। अभियोजन ने आशंका जताई कि जमानत मिलने पर वह मुकदमे के दौरान उपलब्ध नहीं हो सकता है या अभियोजन के साक्ष्यों को प्रभावित कर सकता है।
बचाव पक्ष ने बताया निर्दोष
शाहवेज के वकील ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उसे झूठे मामले में फंसाया गया है। बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि मुकदमा अभी लंबित है और उसके खिलाफ आरोप भी तय नहीं हुए हैं।
वकील ने यह भी दलील दी कि शाहवेज का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और जमानत मिलने पर उसके फरार होने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने की कोई संभावना नहीं है।
बचाव पक्ष ने समानता के आधार पर भी जमानत की मांग की। दलील दी गई कि इस मामले के सह-आरोपी कुलदीप सिंह और शुभम बंसल को हाईकोर्ट पहले ही अगस्त 2025 में जमानत दे चुका है।
‘सह-आरोपी को जमानत मिलना अकेला आधार नहीं’
हाईकोर्ट ने हालांकि स्पष्ट किया कि सह-आरोपी को मिली जमानत के आधार पर ही किसी अन्य आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती। Sagar बनाम State of U.P. मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि प्रत्येक आरोपी की भूमिका और मामले में उसकी स्थिति अलग-अलग देखी जानी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि जमानत पर फैसला लेते समय आरोपों की प्रकृति, अपराध की गंभीरता, संभावित सजा, आपराधिक इतिहास और आरोपी के खिलाफ प्रथमदृष्टया उपलब्ध सामग्री जैसे पहलुओं पर विचार करना जरूरी है।
दूसरी जमानत याचिका में पेश दस्तावेजों और दलीलों की समीक्षा के बाद अदालत ने पाया कि शाहवेज को जमानत देने के लिए कोई नया ठोस आधार सामने नहीं आया है।
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक से कथित फ्रॉड को बताया गंभीर
अदालत ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक को कथित तौर पर निशाना बनाकर किए गए साइबर फ्रॉड को गंभीर और ‘घृणित प्रकृति’ का अपराध बताया। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के अपराधों को बढ़ावा देना या उन्हें सामान्य मानना समाज के लिए खराब उदाहरण बन सकता है।
अदालत ने यह भी माना कि यदि आरोपी को इस स्तर पर रिहा किया गया तो अभियोजन के साक्ष्यों में हस्तक्षेप की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी के पक्ष में जमानत का मामला नहीं बनता और शाहवेज की दूसरी जमानत याचिका भी खारिज कर दी।
साइबर अपराध में पूरी वित्तीय कड़ी की जांच जरूरी
इस मामले में कोर्ट की टिप्पणियां डिजिटल बैंकिंग के बढ़ते इस्तेमाल के बीच साइबर वित्तीय अपराधों की गंभीरता को रेखांकित करती हैं। ऐसे अपराधों में केवल बैंक या सर्वर को निशाना बनाना ही शामिल नहीं होता, बल्कि पहचान की चोरी, म्यूल अकाउंट, डिजिटल संचार और तेजी से रकम ट्रांसफर करने जैसी कई कड़ियां भी जुड़ी हो सकती हैं।
नैनीताल बैंक मामले में भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा कथित तौर पर निकाली गई रकम की पूरी वित्तीय कड़ी का पता लगाना है। जांच एजेंसियों को यह स्थापित करना होगा कि कथित अपराध में अलग-अलग आरोपियों की क्या भूमिका थी और बैंक से निकाली गई रकम किन खातों और लोगों तक पहुंची।
मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है। शाहवेज और अन्य आरोपियों पर लगाए गए आरोपों की अंतिम पुष्टि अदालत में साक्ष्यों और सुनवाई के आधार पर होगी।
