मुजफ्फरपुर: बिहार के मुजफ्फरपुर से साइबर ठगी का एक बड़ा और चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां ‘डिजिटल अरेस्ट’ का डर दिखाकर लोगों से पैसे ऐंठने वाले संगठित गिरोह का पर्दाफाश हुआ है। इस नेटवर्क का मास्टरमाइंड एक रिटायर्ड सरकारी अधिकारी निकला, जिसे उसके बेटे के साथ गिरफ्तार किया गया है। जांच में करीब ₹200 करोड़ तक के संदिग्ध लेनदेन के संकेत मिलने से मामला और गंभीर हो गया है।
जांच एजेंसियों के अनुसार, आरोपियों ने खुद को केंद्रीय एजेंसियों, पुलिस और दूरसंचार विभाग के अधिकारी बताकर लोगों को फोन कॉल के जरिए डराया। उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता था कि उनके आधार या मोबाइल नंबर का इस्तेमाल किसी गंभीर अपराध—जैसे मनी लॉन्ड्रिंग या आतंकी गतिविधि—में हुआ है और वे “डिजिटल अरेस्ट” के तहत जांच के दायरे में हैं।
ताजा मामले में काजी मोहम्मदपुर क्षेत्र के एक बुजुर्ग को 12 दिनों तक लगातार कॉल कर मानसिक दबाव बनाया गया। आरोपियों ने उसे गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई का भय दिखाया, जिसके चलते उसने ₹67 लाख की बड़ी रकम अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर कर दी। बाद में जब सच्चाई सामने आई, तब इस पूरे गिरोह का पर्दाफाश हुआ।
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छापेमारी के दौरान आरोपियों के ठिकाने से नकदी, लैपटॉप, मोबाइल फोन, कई बैंक पासबुक, चेकबुक और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज बरामद किए गए। जांच में यह भी सामने आया कि गिरोह फर्जी कंपनियों और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के नाम पर बैंक खाते खोलता था, जिनका इस्तेमाल ठगी की रकम को अलग-अलग स्तरों पर घुमाने के लिए किया जाता था।
वित्तीय विश्लेषण में यह खुलासा हुआ है कि इन खातों में कुल मिलाकर करीब ₹200 करोड़ तक के संदिग्ध लेनदेन हुए हैं। यह रकम कई चरणों में ट्रांसफर की जाती थी, जिससे ट्रैकिंग मुश्किल हो जाए। इस प्रक्रिया को ‘लेयरिंग’ कहा जाता है, जिसमें पैसे को अलग-अलग खातों में भेजकर उसके स्रोत को छिपाया जाता है।
जांच एजेंसियों के अनुसार, यह गिरोह पिछले करीब एक साल से सक्रिय था और देश के कई राज्यों में इसके खिलाफ शिकायतें दर्ज हो चुकी हैं। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, नेटवर्क एक दिन में ₹3 से ₹4 करोड़ तक के ट्रांजेक्शन को अंजाम देने की क्षमता रखता था, जो इसके बड़े पैमाने और संगठित ढांचे की ओर इशारा करता है।
तकनीकी जांच के तहत कॉल डिटेल रिकॉर्ड, बैंकिंग ट्रेल और डिजिटल ट्रांजेक्शन का विश्लेषण कर आरोपियों की लोकेशन ट्रेस की गई। इसके बाद विशेष टीम ने कार्रवाई करते हुए उन्हें पटना से गिरफ्तार किया। फिलहाल उनसे पूछताछ जारी है और इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की तलाश की जा रही है।
इस तरह के मामलों पर टिप्पणी करते हुए प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी Prof. Triveni Singh ने कहा कि “डिजिटल अरेस्ट जैसे फ्रॉड पूरी तरह सोशल इंजीनियरिंग पर आधारित होते हैं। अपराधी डर, अधिकार और तात्कालिकता का माहौल बनाकर पीड़ित को मानसिक रूप से कमजोर कर देते हैं। जब व्यक्ति घबराहट में होता है, तब वह बिना सत्यापन किए पैसे ट्रांसफर कर देता है।”
उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है। कोई भी वैध एजेंसी फोन या वीडियो कॉल के जरिए पैसे ट्रांसफर करने के लिए नहीं कहती और न ही ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी कोई प्रक्रिया होती है।
अधिकारियों ने नागरिकों से अपील की है कि किसी भी संदिग्ध कॉल या मैसेज पर तुरंत भरोसा न करें और ऐसे मामलों की जानकारी तुरंत साइबर हेल्पलाइन 1930 पर दें। साथ ही, बैंकिंग या व्यक्तिगत जानकारी किसी के साथ साझा करने से बचें।
यह मामला एक बार फिर यह दर्शाता है कि साइबर अपराधी लगातार नए-नए तरीके अपनाकर लोगों को निशाना बना रहे हैं। ऐसे में तकनीकी सतर्कता, त्वरित शिकायत और जागरूकता ही इस बढ़ते खतरे से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।
